Chanchal Bhu : यह खुस्खत अपने पुराने लड़ाकू समाजवादी मित्र बिपेंद्र जी को चुपचाप अकेले में दे रहा हूँ. (एक पीढ़ी ऐसी भी है जो न तो आपात काल जानती है न जेपी को, यह इस चुनाव के दौरान जाना, तो उन्हें कौन समझाए कि एक पत्रिका दिनमान भी थी. इसलिए चुपचाप अकेले कहा). तो जनाबे आली! हस्बे जैल अर्ज कर दूँ कि येहां हम यानी चंचल वल्द जनाब राय चंद्र भान साकीना गाँव पूरालाल थाना, तहसील – बदलापुर जिला जौनपुर अपनेको उस दौर का सफर कराने ले जा हूँ जहां से हम गुजरे है लेकिन अकेले नहीं , पूरी एक जमात साथ रही है उस कायनात में अलग- अलग तरह के ,मुख्तलिफ अंदाज के दरवेस रहे है पर एक सलीका ऐसा था जिसमे सब एक से थे वह था -दीवानगी उसे बाज दफे पागलपन तक कहा गया …. जो भी हो किस्सा सुने.. बिपेंद्र जी ..
मैं BHU में fine arts का विद्यार्थी था .७५ में बाहर जाने का सुअवसर प्राप्त हो गया .२ साल बाद लौटा तो मेरी दोस्त पढाई पूरी करके उसी विभाग में टीचर बनीमिली .उस्कामुह पूरब कि तरफ हम सबका पश्चिम… हमारी खुदी को चोट लगी किसी तरह इम्तहान देकर पास हुआ .और चला गया पत्रकारिता पढ़ने, पढाई के आखीर में ट्रेनिंग पर दिनमान मिला . अब ज़रा दिनमान की सूरतेहाल देखिये .तिवारी जी (चपरासी) एक कुर्सी पर आराम से बैठे हैं. बाकी पूरा विभाग गायब, ३ घंटे की जद्दोजेहद में कई सिगरेट पीया, घूमा टहला, २ लोग किसी बात पर ठहाका लगाते नमूदार हुए. जवाहर लाल कौल और महेश्वर दयाल गंगवार. सिगरेट सुलगाये आ रहे हैं नेत्र सिंह रावत. संपादक रघुवीर सहाय आये और अपने केबिन में चले गए. मैंने तिवारी जी के मार्फ़त संपादक से रुबरु होने की कोशिश की और कामयाब हो गया. (सहायजी, सक्सेनाजी, प्रयाग शुक्ला जी, सुषमा जी ये सब पहले से परचित रहे) मैं अंदर बुलाया गया. बिपेंद्र जी मेरे साथ क्या हुआ? कल बताउंगा…
xxx
आगे का वाकया यूँ है –
मैं सहाय जी के सामने बैठा हूँ, उन्होंने घंटी दबाई… तिवारी जी अंदर आये. सहाय जी ने बड़े अदब और सलीके से तिवारी के साथ 'जी' लगाया. दिनमान का यह पहला सबक था. दूसरा चुभनेवाला है. सहाय जी दो चाय के लिए बोल चुके थे, तिवारी जी जा चुके थे. इस बीच मैंने ट्रेनी होने की चिट्ठी उनके सामने रख दिया. सहाय जी ने चिट्ठी पढ़ा फिर धीरे से बोले- चंचल जी! आप हम सबके अच्छे दोस्त हैं, इसलिए हम आपको ट्रेनी की हैसियत से रख लेते हैं…. उस चिट्ठी पर उन्होंने लिखा "सर्वेश्वर जी कृपया देखें". उस चिट्ठी को मेरी तरफ बढाते हुए तकरीबन ४० पेज का पुलिंदा भी टिका दिए और बोले- चंचल जी! आप दिनमान से वाकिफ हैं इस रपट को एक पेज में ले आना है. तब तक तिवारी जी दो कप लिए नमूदार हुए. सहाय जी ने तुरत बगैर देर किये नया आदेश दिया, तिवारी जी बस एक चाय मेरी दे दीजिए. अब आज से चंचल जी यही हमारे साथ रहने आये हैं. कागज़ थामे बाहर आया. यहा और बड़ा हादसा हुआ, सर्वेश्वर जी की टेबल पर… दुआ बंदगी के बाद मैं सर्वेश्वर के सामने बैठा ही था कि सर्वेश्वर जी ने पूरे दम के साथ चीखा- स र माँ ////////////. यह मेरे लिए चौंकाने वाली बात थी. क्योंकि जिस शर्मा को पुकारा जा रहा था वे सबसे उम्रदराज, गंभीर दिखने वाले पत्रकार श्यामलाल शर्मा जी थे. चपरासी के साथ जी और पत्रकार के साथ… बाद में पता चला दोनों की दोस्ती कमाल की रही. सर्वेश्वर जी अपने कालम "चरचे और चरखे" में जिस शर्मा का जिक्र करते हैं वह यही श्याम लाल शर्मा है… उस पुलिंदे का क्या हुआ, पूछिए मत, याद आते ही रूह कांप जाती है…. बाकी कल
xxx
बिपेंद्र जी सुनिए उस ४० पन्ने के पुलिंदे ने मेरे साथ क्या नहीं किया.
सर्वेश्वर जी ने सहाय जी का लिखा पढ़ा, बोले मुंशी के पास गए थे? … उन्होंने कलम निकाला और उस पर लिखा -गंगवार जी देखें. गंगवार जी ने देखा. उन्होंने प्रयाग जी के पास भेजा. कहने का मतलब ये कि कोई नहीं बचा, सिवाय सुषमा जगमोहन के. सुषमा के पास मैं खुद गया. वह पूर्व परिचित थीं (उनकी ट्रेनिंग धर्मयुग में हुई थी और इन्हें बार बार ये ताना सुनना पड़ता था- यह धर्म युग नहीं है, दिनमान है.) सुषमा ने कहा, चलो सर्वेश्वर के पास. तब सर्वेश्वर जी ने जोर की आवाज लगाई- थानीजी, चंचल जी आप के अंडर में ट्रेनिग लेंगे इनको समझाइये. और, थानी जी ने समझा दिया -प्यारे! इस लेख को पढ़ जावो, इसका जिस्ट समझ लो वही, लिख डालो. एक बात का ख़याल रहे, उसकी भाषा को, उसकी शैली को, मत छेड़ना, बस काम हो गया. यकीन मानिए, बात बन गयी. मैं थानी साहेब का दोस्त हो गया. लगे हाथ थानी जी के बारे में एक वाकया भी सुन लीजिए जिसे श्यामलाल शर्मा ने सुनाया, भरी महफ़िल में- चंचल तुम बहुत खुश नशीब हो, तुम्हारा उस्ताद थानी है, यह अकेला पत्रकार जिसके पास वो हुनर है कि यह अज्ञेय को भी एडिट कर सकता है. और फिर शर्मा जी ने वह कहानी सुनाई. अज्ञेय जी संपादक थे और थानी जी उनके टाइपिस्ट. दिनमान का सम्पादकीय एक पेज का होता था. अज्ञेय जी ने सम्पादकीय लिखा और लिख कर चले गए, इस हिदायत के साथ कि जब कम्पोज हो जाए तो मुझे फोन कर देना. थानी ने टाइप किया कम्पोज हो कर आ गया. लेख एक पेज से ज्यादा था. मैटर हर हाल आज ही छापना था. थानी जी परेशान अब क्या करें. थानी जी ने मनोहर श्याम जोशी, जो उन दिनों दिनमान में ही थे, से पूछा, जोशी जी ने गंभीरता से बता दिया- पूरा पेज मेकप कर लो, नीचे जो बचता है, उसे काट कर बाहर फेक दो.. बस, और थानी जी ने वही किया. पेज छपने चला गया. थानी जी ने इतना जरूर किया कि अज्ञेय जी को आश्वस्त के लिए लिए फोन कर दिया कि- आप आराम से सोइए, मैंने पेज मेकप कर दिया है, नीचे जो बढ़ रहा था उसे काट दिया है. अज्ञेय जी कुछ बोले नहीं, भागे भागे दफ्तर आये, पेज एडिट किये और चले गए… जनाब दूसरे दिन क्या हुआ… ? कल.
xxx
अज्ञेय जी का लिखा, उनका टाइपिस्ट एडिट करे …..
दूसरे दिन अज्ञेय जी के आने के पहले ही सब पहुच चुके थे. एक छत के नीचे समूचा हिन्दी घराना साँस ले रहा था, हँसी, मजाक… कमाल के दिन थे. मनोहर श्याम जोशी जो निहायत ही विनोदी थे. उन्होंने थानी का किस्सा सबको सुनाने के बाद थानी को बाकायदा एक कुर्सी पर बैठाया. कहा गया कि थानी साहब यह आपकी जिंदगी का सबसे बड़ा दिन है, पार्टी हो जानी चाहिए.. और पार्टी शुरू हो गई.. इसी बीच संपादक अज्ञेय जी नमूदार हुए. पूरे गुस्से में. हाल में आते ही जब इहाँ का नजारा देखा तो उन्हें कुछ समझ में नहीं आया. उन्होंने पूछा ये सब क्या हो रहा है? सर्वेश्वर जी ने बताया कि आज योगराज थानी साहब पार्टी दे रहे हैं, इस खुशी में कि अज्ञेय को कोई एडिट कर सकता है तो वह थानी है.. कहकहों के बीच अज्ञेय जी भी मुस्कुरा पड़े और वे भी उस पार्टी में शामिल हुए. पार्टी के बाद उठते समय अज्ञेय जी ने थानीजी से कहा- संपादक जी, ये कुछ पेपर हैं, इसे एडिट नहीं करना है, केवल टाइप करना है.. उस दिन अज्ञेय का कहा वह एक जुमला "संपादक जी" एक दिन साकार हो गया जब टाइम्स घराने ने अपने खेल पत्रिका के संपादन की जिम्मेवारी योगराज थानी को सौंपी. (यह मेर रहते हुए हुआ) और शर्माजी? कल …..
…जारी…

चंचल
चंचल से संपर्क 09935149867 के जरिए किया जा सकता है. फेसबुक पर उन्हें पकड़ने के लिए http://www.facebook.com/profile.php?id=100002282413866 पर क्लिक करें.





