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बेइमानों को नहीं चाहिए प्रभावी लोकपाल, पर जनता लाल करेगी गाल

मध्य प्रदेश में आरटीओ ऑफिस में तैनात एक चपरासी के घर से चालीस करोड़ से अधिक रुपये की सम्पत्ति बरामद हुई। एक आईएएस दम्पत्ति के पास से कई अरब रुपये की जमीन-जायदाद बरामद हुई। हमारे राजनेताओं की बेशुमार दौलत से जुड़े कई मामलों की जांच सीबीआई कर रही है।

मध्य प्रदेश में आरटीओ ऑफिस में तैनात एक चपरासी के घर से चालीस करोड़ से अधिक रुपये की सम्पत्ति बरामद हुई। एक आईएएस दम्पत्ति के पास से कई अरब रुपये की जमीन-जायदाद बरामद हुई। हमारे राजनेताओं की बेशुमार दौलत से जुड़े कई मामलों की जांच सीबीआई कर रही है।

होना तो यह चाहिए था कि फास्ट ट्रैक कोर्ट की तरह इन मामलों की जांच करके कुछ महीनों में ही यह अफसर और राजनेता जेल के सीखचों के पीछे होते। मगर इस देश में यह संभव नही है और ऐसा इसलिए है कि सीबीआई केन्द्र में तैनात सरकार की चारण हो गयी है। उसके निशाने पर सिर्फ वही लोग होते हैं जो केन्द्र सरकार को पसंद नही। ऐसे में यह आशा करना ही बेमानी है कि दिल्ली सरकार आसानी से कोई ऐसा लोकपाल बना देगी जिसके अधीन सीबीआई भी आ जाय।

चौरासी साल के बुजुर्ग अन्ना कंपकपांती ठंड में मुम्बई में एक बार फिर अनशन पर बैठ रहे हैं। उनकी भूख-प्यास से हमारे नपुंसक नेतृत्व को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। वे तो बेइमानों के सरदार के रूप में काम कर रहे हैं। पूरी सरकार की कोशिश है कि किसी भी तरह अन्ना को भाजपाई या फिर संघी सिद्घ किया जा सके। इस तरह वे धार्मिक आधार पर देश में विभाजन कराकर अपनी बेशर्म मोटी चमड़ी को बचा सकेंगे भले ही देश भ्रष्टाचार के और गर्त में क्यों न चला जाय। पिछले कुछ महीनों से देश में एक नई अंगड़ाई पैदा हुई है। जो लोग सालों से भ्रष्टाचार से त्रस्त थे उन्हें अन्ना के रूप में एक नई रोशनी दिखाई दी। उन्हें लगा कि शायद अन्ना इस भ्रष्ट व्यवस्था में कोई बदलाव ला सकें जिससे आम जन को राहत मिल सके। मगर सरकार पहले दिन से ही अन्ना और उनकी टीम को ही भ्रष्ट साबित करने में तुली हुई है। उसे लगता है कि इस लड़ाई से निपटने का एक ही उपचार है कि सामने से वार कर रहे विपक्षी पर पलटकर पूरी ताकत से हमला किया जाय। पूरी दिल्ली सरकार सिर्फ और सिर्फ इसी योजना पर काम करती नजर आ रही है।

पिछले आंदोलन में भी मनीष तिवारी से लेकर कांग्रेस के सभी राजनेता अन्ना और उनकी टीम को इसी शैली में धमकाते हुए नजर आये। उनको लग रहा था कि इससे अन्ना की टीम भयभीत होगी और उनका काम आसान हो जायेगा। मगर पूरे देश में जिस तरह से अन्ना के पक्ष में लहर उठी उसने इन बेइमान नेताओं की कंपकंपी बढ़ा दी। ये लोग समझ गये कि अगर यह मुहिम जारी रही तो इसके परिणाम गंभीर होंगे। अन्ना के अनशन के आखिरी दौर में देश में क्रान्ति जैसे हालात पैदा हो रहे थे। आखिर में देश के सबसे बड़े सदन ने अन्ना की मांग को मानते हुए लोकपाल बनाने की घोषणा कर दी और अन्ना का अनशन खत्म हुआ। मगर अब जब संसद का शीतकालीन सत्र भी समाप्त हो रहा है तो पूरा देश देख रहा है कि अन्ना के साथ ही नहीं बल्कि पूरे देश के साथ धोखा किया गया है। इस लोकपाल में ऐसी कोई बात नहीं रखी गयी है, जिससे भ्रष्टाचार पर काबू पाया जा सके। साथ ही जब पूरा देश सीबीआई को लोकपाल के अधीन लाने की मांग कर रहा है तब लोग समझ नहीं पा रहे कि सरकार को इससे क्या आपत्ति है।

अब तो सीबीआई का नामकरण भी कांग्रेस ब्यूरो आफ इनवेस्टिगेशन लगने लगा है। जब जब सरकार की स्थिति कमजोर होती है तब-तब सीबीआई संकट मोचक के रूप में सरकार के साथ खड़ी नजर आती है। जो मुलायम सिंह और मायावती सीबीआई को किसी समय में सबसे बड़े अपराधी नजर आते है वही दिल्ली सरकार को समर्थन देते ही दूध के धुले हो जाते हैं। तब सीबीआई इस बात की तनिक भी चिंता नहीं करती कि उसका काम अपराधियों को दंडित कराना है न कि सरकार के इशारों पर नाचना। मगर अपने काम के विपरीत सीबीआई सिर्फ दिल्ली दरबार की कठपुतली बनी रहती है। दिल्ली दरबार के लोगों को यह भी समझ नहीं आता कि इस देश के लोगों का सब्र का पैमाना छलक रहा है। वह अब और भ्रष्टाचार सहने को तैयार नहीं है और यह स्थितियां भी यूं ही नहीं बनीं। जब देश का एक-एक मंत्री एक लाख छियत्तर हजार करोड़ का घोटाला करता हुआ नजर आए और दिल्ली सरकार उसे बचाने की कोशिश करने में अपना सर्वस्व अर्पण कर दे तो फिर आम आदमी आखिर करे भी तो क्या करे। उसके सीमित संसाधनों में रोज कमी होती नजर आ रही हो। महंगाई सुरसा के मुंह की तरह रोज बढ़ती जा रही हो। ऐसी स्थिति में अब व्यक्ति को हताशा और गुस्सा न आये तो फिर क्या आये।

दिल्ली दरबार के लोगों को यह समझ ही नहीं आ रहा कि आखिर अन्ना में ऐसा क्या है कि पूरा देश उनके पीछे एक सुर में सुर मिलाता नजर आ रहा है। जो लोग अपनी आत्मा तक बेच चुके हैं, वे ईमानदारी के आत्म बल को महसूस भी नहीं कर सकते। अन्ना की ईमानदारी और उनकी सादगी ने इस देश को महात्मा गांधी की याद दिला दी। ऐसे में अगर भ्रष्ट मंत्री उनके बारे में कुछ कहें तो स्वभाविक है कि किसी को भी बुरा लगेगा। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह अपने पूरे कार्यकाल में इस बात को साबित करने के लिए दिन रात एक कर रहे हैं कि वे बहुत ईमानदार हैं और किसी भी बेईमानी के कारोबार से उनका कोई मतलब नही है। मगर अब ऐसी बातों से देश को गुमराह नहीं किया जा सकता लोगों का कहना है कि जब नेतृत्व इतना दीन हीन हो जाए कि वे अपने अधीनस्थ काम कर रहे लोगों को खुलेआम बेईमानी की छूट दे दे तो ऐसे नेतृत्व से तो बिना नेतृत्व के ही देश ठीक है।

यह बात सही हो भी सकती है कि मनमोहन सिंह ईमानदार व्यक्ति हैं मगर यह बात भी उतनी ही सही है कि उनके अधीनस्थ बेईमान गठबंधनों और नापाक इरादों वाले लोगों का गठजोड़ इकट्ठा हो गया है, जो इस देश को बेचने पर उतारू है। देश का काला धन विदेशों में इकट्ठा हो रहा है और हमारी सरकार अपनी मजबूरी दिखा रही है कि हम इन चोरों का नाम उजागर नहीं कर सकते। होना तो यह चाहिए था कि इस देश की पूंजी विदेश में जमा करने वाले लोगों को सरेआम चौराहों पर खम्भे से लटका देना चाहिए और साफ तौर पर उन्हें संदेश देना चाहिए कि इस देश की आजादी चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, अशफाक उल्ला खां और गांधी जी जैसे लोगों के बलिदान से मिली है, उसे इन जैसे बेईमानों के हाथों गिरवी नहीं रखा जा सकता। मगर ये इसलिए नहीं हो सकता क्योंकि इस लिस्ट में हमारे महान राजनेता और आदर्श अफसरों के नाम थोक की संख्या में है। लिहाजा वे न तो इस लिस्ट को जारी होने देंगे और न ही प्रभावी लोकपाल बनने देंगे। मगर समय बलवान है और अगर शरद पवार का गाल इस परिवर्तन का साक्षी बन सकता है तो अभी कुछ और लोग भी लाईन में शामिल हैं, जिनका इलाज जल्दी जनता ही कर देगी।

लेखक संजय शर्मा वीकएंड टाइम्‍स के संपादक एवं लखनऊ के वरिष्‍ठ पत्रकार हैं.

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