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बेगाने की शादी में अब्‍दुला दीवाना बना जागरण समूह

जागरण एक तरफ तो अपने तमाम राज्‍यों के संस्करणों से कर्मचारियों की छंटनी कर रहा है, दूसरी तरफ अपने नए खरीदे गए अखबार नईदुनिया का ६५वां स्थापना दिवस 'जश्न ए मालवा' मनाने की तैयारी मै लगा है, जिसे मनाने का उसे कोई नैतिक अधिकार नहीं बनता। विश्वास की जिस परंपरा का इन दिनों ढिंढोरा पीटा जा रहा है, उससे तो जागरण समूह का कोई लेना-देना ही नहीं है। १ से ५ जून तक होने वाले  आयोजन 'जश्न ए मालवा' के कार्यक्रम भी घोषित हो गये हैं, जो जनता को भरमाने से ज्यादा कुछ नहीं है।

जागरण एक तरफ तो अपने तमाम राज्‍यों के संस्करणों से कर्मचारियों की छंटनी कर रहा है, दूसरी तरफ अपने नए खरीदे गए अखबार नईदुनिया का ६५वां स्थापना दिवस 'जश्न ए मालवा' मनाने की तैयारी मै लगा है, जिसे मनाने का उसे कोई नैतिक अधिकार नहीं बनता। विश्वास की जिस परंपरा का इन दिनों ढिंढोरा पीटा जा रहा है, उससे तो जागरण समूह का कोई लेना-देना ही नहीं है। १ से ५ जून तक होने वाले  आयोजन 'जश्न ए मालवा' के कार्यक्रम भी घोषित हो गये हैं, जो जनता को भरमाने से ज्यादा कुछ नहीं है।

इंदौर नईदुनिया के पाठक और लोग इस बात से आश्चर्य कर रहे हैं कि आखिर जागरण प्रबंधन नईदुनिया का स्थापना दिवस क्यों मना रहा है? नईदुनिया के संस्‍थापक/प्रकाशकों में से आज कोई भी जागरण के साथ नहीं है। जागरण ने इस साल १ अप्रैल से नईदुनिया की कमान संभाली थी. जिस ६५ साल की गौरवशाली परंपरा के आयोजन का विज्ञापनों मे जिक्र किया जा रहा है, उससे आज के नईदुनिया के मालिकों का कोई लेना देना नहीं है। जहां तक विनय छजलानी के नाम की बात है तो वो नईदुनिया और जागरण की डील से जुड़ा मामला है और अभी तो विनय छजलानी भी विदेश में हैं। ऐसे में जागरण का नईदुनिया के ६५ साल के स्थापना दिवस को मानना किसी के गले नहीं उतर रहा। जागरण प्रबंधन जिस हंगामे के साथ ये आयोजन कर रहा है, उतना जोश तो कभी नईदुनिया के मूल मालिकों ने भी नहीं दिखाया।

बताते है कि जागरण के हाथों में आने के बाद नईदुनिया के बारे में इंदौर में माहौल ख़राब हो गया है, इसलिए उसे बैलेंस करने के लिए 'जश्न ए मालवा' का आयोजन किया जा रहा है। जागरण प्रबंधन को ये आयोजन करने का हक़ इसलिए भी नहीं है कि न तो नईदुनिया के मूल संस्थापक आज हैं, न उस तरह के लोग। इस समय सिर्फ तीन पुराने लोग नईदुनिया में बचे हैं। इनमे दो रिटायर हो चुके हैं। एक हैं बहादुर सिंह गहलोत, दूसरे सुरेश ताम्रकार हैं। तीसरे पुराने पत्रकार हैं दिलीप ठाकुर। इन तीन लोगों को छोड़ दिया जाये तो नईदुनिया में कोई भी ऐसा नहीं है, जिसे नईदुनिया की परंपरा का पत्रकार कहा जा सकता है।

सच ये भी है कि अप्रैल महीने मे नईदुनिया के प्रसार और विज्ञापन में कमी आई है, शायद यह भी एक कारण होगा कि जागरण प्रबंधन नईदुनियाका आयोजन 'जश्न ए मालवा' मना रहा है। लोगों का यह भी कहना है कि जागरण उधार का सिन्दूर अपने मांग में सजा रहा है, जिसका उसे कोई हक़ नहीं है। उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, हरियाणा, उत्‍तराखंड, पंजाब आदि राज्‍यों में कई पत्रकारों को बेरोजगार करने वाले जागरण समूह को इंदौर मै जश्न मनाने का अधिकार नहीं है।

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित. 

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