मैं केवल लिखता था, पर पत्रकारिता क्या होती है, यह माथुर साहब से ही सीखा। हालांकि लेखन पत्रकारिता और कविता एवं व्यंग्य में मेरा कोई गॉड फादर नहीं है। दादरी जैसे पिछड़े इलाके में हो भी कौन सकता था। हमारे लिए तो हिंदी का अघ्यापक ही हिंदी का विद्वान होता था। माथुर साहब के सानिध्य में यह जाना कि पत्रकारिता क्या होती है। लेखन अपनी जगह है और पत्रकरिता अपनी जगह। माथुर साहब कहा करते थे कि हर लेखन पत्रकारिता नहीं होता।
पत्रकारिता के लिए आप का दृष्टिकोण वैज्ञानिक होना आवश्यक है। इसके अतिरिक्त किसी विषय पर लिखने से पहले आपका तरीका भी वैज्ञानिक होना चाहिए। फिर स्वयं ही समझाते, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और तरीके से मतलब है कि आप तथ्यों की पूरी पड़ताल करें और उस के बाद अपना फैसला दे सकते हैं। अगर ऐसा होगा तो आप के लिखे पर कोई उंगली नहीं उठाएगा। माथुर साहब का कहना था कि एक पत्रकार को अध्ययनशील होना चाहिए। इससे भाषा में निखार तथा विचारों में परिपक्वता आती है।
आतंक और दंगों से जुड़ी खबरें मैंने काफी लिखी थीं। ऐसे अवसरों पर मैं माथुर साहब से सलाह जब भी करता तो उन्होंने कभी कोई उपदेश या भाषण नहीं दिया। खबर के बारे में पूरा विवरण सुन कर बस केवल एक बात कहते- ठीक है, संयत हो कर लिख दो। कभी जब मैं खबरों के बारे में बात करता तो कहते- ''संयत हो कर लिखें, जो भी लिखो अपने अवलोकन के आधार पर लिखें, अपने मन से लिखें और कभी किसी के बहकावे या उकसावे में आ कर कुछ न लिखें।'' माथुर साहब के ये सूत्र वाक्य हमेशा मार्गदर्शन करते रहे जिसका नतीजा यह हुआ कि 20 साल के अखबारी जीवन में किसी खबर या लेख के लिए कभी शर्मिंदा नहीं होना पड़ा और न ही किसी को जवाबदेह होना पड़ा। मैं अक्सर नेताओं और अफसरों के खिलाफ खबरें लिखता रहता था। एक दिन ऐसे ही बातों बातों में माथुर साहब ने कहा- ये नेता और अफसर बुत हैं और आप के हाथ में कूंची है, आप इनके चेहरों पर कूंची फिराते हुए आगे बढ जाते हैं ओर आपको पता नहीं रहता कि आपने कितने लोगों का मुंह काला कर दिया। इस प्रकार माथुर साहब ने मुझ से बहुत बड़ी बात कह दी जिस पर आगे मैं संभल कर ही लिखता।
एक बात और। तीखी रिपोर्टिंग कई लोगों को चुभ जाती तो वह सीधे माथुर साहब से शिकायत करने आ धमकते। माथुर साहब से आग्रह करते कि रिपोर्टर को बुलाया जाए मगर माथुर साहब ने मुझे ही नहीं, कभी किसी रिपोर्टर को नही बुलाया। एक बात वह शिकायतकर्ता से अवश्य पूछते कि रिपोर्टर ने गलत क्या लिखा है। अब गलत हो तो कोई बताए। इतने पर भी अगर समय होता तो शिकायतकर्ता को चाय पिला कर ही रवाना करते। माथुर साहब अपने अधीनस्थों का कितना ध्यान रखते थे, इस बारे में यहां दो घटनाओं का उल्लेख करना जरूरी लगता है।
पहली घटना बुलंदशहर की है- लोक अदालतों का चलन तब आरंभ ही हुआ था। बुलंदशहर में लोक अदालत का आयोजन किया गया था जो बुलंदशहर में न कर के वहां से दूर नरौरा में किया गया था। नरौरा में गंगा तट पर अच्छा पिकनिक स्पाट है। नरौरा के लिए बसों का प्रबंध एक टांसपोर्ट माफिया ने किया था। बसों में अधिकारियों के परिवार भी पिकनिक मनाने गए थे। इनके खान पान का प्रबंध भी इसी माफिया ने किया था। लोक अदालत में अवैध हथियार, शराब तस्करी, मादक पदार्थ आदि के अपराधिक मामले भी निपटाए गए थे। मैंने इसकी रिपोर्टिंग की, जिसमें अधिकारियों के परिवार की पिकनिक और और अपराधिक मामलों का हवाला भी दिया गया।
मामला जज साहेबान से सम्बंधित था इसलिए किसी मामले पर कोई कमेंट न कर सधे हुए शब्दों में सब लिख दिया था। जिस दिन रिपोर्ट छपी उसी दिन दोपहर बाद पांच जज साहेबान कार्यालय आ धमके। माथुर साहब से मिले। अंदर क्या बात हुई, मुझे पता नहीं मगर मैं बहुत डर रहा था कि आज डांट जरूर पड़ेगी। कुछ देर बाद वे लोग चले गए। माथुर साहब ने उन्हें चाय पिलाई और अपने कक्ष से बाहर छोड़ने भी आए। मैं सोच रहा था कि अब बुलावा आएगा मगर शाम होने तक बुलावा नहीं आया। माथुर साहब घर चले गए तो मैंने राहत की सांस ली। तीसरे दिन बुलंदशहर जाना हुआ तो पता चला कि माथुर साहब ने उनसे पूछा था कि अगर संवाददाता ने कुछ गलत लिखा है तो बताएं, उस के खिलाफ एक्शन लिया जाएगा मगर वह कुछ गलत लिखा नहीं बता सके थे। कुछ दिन बाद मैंने ही माथुर साहब से जज साहेबान के आने के बारे में पूछ लिया तो माथुर साहब हंस कर बोले, आपके आरोपों का उनके पास कोई जवाब ही नहीं था।
दूसरी घटना दिल्ली के एक सहकारी बैंक की है। इस बारे में मैंने एक समाचार लिखा जो अगले दिन भी जारी होना था। बैंक से सम्बंधित सज्जन माथुर साहब के परिचित थे। वह माथुर साहब से इस बारे में मिल कर गए थे। उनके बाद माथुर साहब ने मुझे बुलाया और बताया कि ये लोग मेरे परिचित हैं इस बारे में देख लेना। में उनकी बात सुन कर बाहर आ गया। थोड़ी देर बाद उन्होंने फिर बुलाया और बोले- ''यार इस पर तो जारी लिखा है, अब अगर इसे रोका गया तो लोग आरोप लगाएंगे कि
सौदा कर लिया, इसलिए अगली किस्त जाने दो।''
ये दोनों घटनाएं इस बात का सबूत हैं कि माथुर साहब अपने अधीनस्थों को कितना सम्मान देते थे। बाद में तो ऐसे सम्पादक भी देखे जो संवाददाता को आकर बताने लगे थे कि किस के बारे में क्या लिखना है या किस खबर को कैसे लिखना है, मगर माथुर साहब ने कभी किसी को ऐसा कोई निर्देश नही दिया। अब तो सम्पादक ही नहीं मैनेजर भी संवाददाताओं को निर्देश देने लगे हैं। माथुर साहब के जमाने में किसी मैनेजर में इतना साहस नहीं था कि वह किसी पत्रकार को निर्देश दे सके। ब्रांड मैनेजर का तब नया पद सृजित किया था। ब्रांड मैनेजर तब माथुर साहब के पी. ए. से उनसे मिलने का समय लेता था और इंतजार भी करता था मगर बाद में ऐसे सम्पादक भी आए जो ब्रांड मैनेजर के कमरे में स्वयं जाने लगे। बाद में तो हालत यह हुई कि ब्रांड मैनेजर पत्रकारों को ही नही सम्पादकों को भी निर्देश देने लगे। इस प्रकार माथुर साहब के जाने के बाद सम्पादक नाम की संस्था का जो अवमूल्यन हुआ उसका नतीजा है कि अब बस नाम के सम्पादक रह गए हैं।
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लेखक डॉ. महर उद्दीन खां वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. रिटायरमेंट के बाद इन दिनों दादरी (गौतमबुद्ध नगर) स्थित अपने घर पर रहकर आजाद पत्रकार के बतौर लेखन करते हैं. उनसे संपर्क 09312076949 या [email protected] के जरिए किया जा सकता है. डॉ. महर उद्दीन खां का एड्रेस है: सैफी हास्पिटल रेलवे रोड, दादरी जी.बी. नगर-203207
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