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भगत सिंह के जन्मदिन पर भारत सरकार ‘युवा दिवस’ क्यों नहीं मनाती?

Manish Sisodia : शहीदे आज़म भगत सिंह की एक और जयंती पर एक सवाल – पूरा देश भगत सिंह का अगाध सम्मान करता है, फिर भी उनके जन्मदिन पर भारत सरकार 'युवा दिवस' क्यों नहीं मनाती. सरकारी युवा दिवस स्वामी विवेकानंद की जन्मतिथि पर मनाया जाता है. इसका कारण क्या हो सकता है? अपूर्वानंद ने एक शानदार लेख जनसत्ता में लिखा है. जो लोग भगत सिंह में थोडी भी आस्था रखते हैं उन्हें यह लेख ज़रूर पढ़ना चाहिए. तमाम तरह के विवाद का खतरा उठाते हुए अपूर्वानंद का कहना है कि 'डिफाल्ट सेटिंग' में हिन्दू मानसिकता का नुकसान भगत सिंह को पहुंचा है. इसीलिए छदम राष्ट्रवादियों की सरकारों के दौर में भी भगत सिंह को वह सम्मान नहीं मिल सका.

Manish Sisodia : शहीदे आज़म भगत सिंह की एक और जयंती पर एक सवाल – पूरा देश भगत सिंह का अगाध सम्मान करता है, फिर भी उनके जन्मदिन पर भारत सरकार 'युवा दिवस' क्यों नहीं मनाती. सरकारी युवा दिवस स्वामी विवेकानंद की जन्मतिथि पर मनाया जाता है. इसका कारण क्या हो सकता है? अपूर्वानंद ने एक शानदार लेख जनसत्ता में लिखा है. जो लोग भगत सिंह में थोडी भी आस्था रखते हैं उन्हें यह लेख ज़रूर पढ़ना चाहिए. तमाम तरह के विवाद का खतरा उठाते हुए अपूर्वानंद का कहना है कि 'डिफाल्ट सेटिंग' में हिन्दू मानसिकता का नुकसान भगत सिंह को पहुंचा है. इसीलिए छदम राष्ट्रवादियों की सरकारों के दौर में भी भगत सिंह को वह सम्मान नहीं मिल सका.

मेरा मानना है कि भगत सिंह का 'शहादत पक्ष' राजनीति के लिए सबसे सुविधाजनक पक्ष रहा है. उनके व्यक्तित्व और उनकी सोच से कांग्रेस को तो कभी सरोकार हो ही नहीं सकता था, छदम राष्ट्रवादियों के लिए भी वह परेशानी बन सकता था क्योंकि मात्र 24 साल के जीवन में अपनी सोच को भगत सिंह ने कार्ल मार्क्स, टैगोर से लेकर टालस्टाय और गोर्की तक को पढकर तपाया था. देश और समाज को लेकर उनके सपने पढ़कर लगा ही नहीं कि यह शख्स मात्र 24 साल जिया था. और उनकी एक बात जो कांग्रेस या इन छदम राष्ट्रवादियों को कभी नहीं सहन हो सकती, वह है उनका नारा. उनका नारा सिर्फ 'इंकलाब-जिंदाबाद' नहीं था, इसकी अगली हुंकार थी – 'साम्राज्यवाद – मुर्दाबाद'…. अब भला लोकतंत्र के नाम पर देश को पुन: देशी-विदेशी कंपनियों की दुकान बना देने वाले दलों को भगत सिंह का यह पक्ष कैसे सहन हो सकता है. इसीलिए भगत सिंह का व्यक्तित्व आज तक जनता के दिल में बसा है और हुक्मरानों के गले में अटका रहता है.

लेखक मनीष सिसोदिया पत्रकार रहे हैं और इन दिनों आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता के रूप में सक्रिय हैं. मनीष दिल्ली के पटपड़गंज विधानसभा चुनाव क्षेत्र से 'आप' के उम्मीदवार हैं.

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