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‘भड़ासजी’, अच्छा लिखा आपने, किताब का नाम ‘रोमांस विथ जेल’ भी रखा जा सकता था

कल जैसे ही घर पहुंचा, स्नेपडील के मार्फत तशरीफ ला चुकी ‘जानेमल जेल’ मेरा इंतजार कर रही थी. शाम के तकरीबन पांच या सवा पांच बज रहे होंगे. पैकेट खोला और पुस्तक को पलटा तो सबसे पहले ‘भड़ास जी’ का संक्षिप्त जीवन परिचय पढ़ने लगा. हालांकि कई बातों की जानकारी पहले से थी. नीचे नंबर भी लिखा था.

कल जैसे ही घर पहुंचा, स्नेपडील के मार्फत तशरीफ ला चुकी ‘जानेमल जेल’ मेरा इंतजार कर रही थी. शाम के तकरीबन पांच या सवा पांच बज रहे होंगे. पैकेट खोला और पुस्तक को पलटा तो सबसे पहले ‘भड़ास जी’ का संक्षिप्त जीवन परिचय पढ़ने लगा. हालांकि कई बातों की जानकारी पहले से थी. नीचे नंबर भी लिखा था.

यशवंत जी को मोबाइल लगाकर पुस्तक लिखने और प्रकाशित होने की बधाई भी दे डाली. दूसरी तरफ से भड़ास जी ने भी दोबारा आभार व्यक्त किया. हालांकि पुस्तक के पहले पेज में यशवंत जी ने लिखित तौर मेरे नाम के साथ आभार व्यक्त किया था. बहरहाल जानेमल जेल को पढ़ना शुरू करता हूं और 112 पेज की जेल-य़ात्रा को लगभग साढ़े तीन घंटे के भीतर खत्म भी कर देता हूं.

अब बात ‘जानेमन जेल’ की…

‘जानेमन जेल’ शायद चौथे पेज के नीचे यशवंत जी अपनी पुस्तक को दो प्रबुद्ध लोगों को समर्पित करते हैं. ये दो लोग यशवंत की जेल यात्रा के प्रायोजक रहे हैं. किताब की शुरुआत ही इसे दिलचस्प बना देती है और लगने लगता है कि ये संस्मरण तटस्थ भाव से ही लिखे गए हैं. किताब की सबसे खास बात ये है कि किताब सरल शब्दों में है और जेल के अनुभवों को अलग तरीके से प्रस्तुत करने में सक्षम रही है. ये भी कहा जा सकता है कि यशवंत के व्यक्तित्व परिवर्तन की यात्रा को भी इस पुस्तक के माध्यम से समझा जा सकता है.

संस्मरण में यशवंत खुद को ओशो के प्रभाव, दर्शन से बचा नहीं पाते. ऐसा लगता है कि जेल के भीतर भड़ासजी के भीतर आत्मज्ञान का संचार हो चुका है. लेखऩी में फकीरी और बेपरवाही भी दिखती है, लेकिन फिर भी पूरी किताब में एक लय है. संस्मरण में कुछ अच्छी किताबों का जिक्र आया है, जिसे पढ़ने की ख्वाहिश है. ‘जानेमन जेल’ का एक नाम ‘रोमांस विथ जेल’ भी रखा जा सकता था. जेल के किरदारों में सॉफ्टवेयर इंजीनियर मिश्रा, लाइब्रेरी इंजार्च और एक छोटे बच्चे का किरदार प्रभावित करता है.

जानेमल जेल अपनी तीन चौथाई हिस्सों में भड़ास जी की जेल यात्रा का दिलचस्प वर्णन करती है, लेकिन इसके साथ ही किताब के अंतिम में आखिरकार लेखक का धैर्य टूटता भी नजर आता है, जब वो दैनिक जागऱण के संदर्भ में अपने विचार प्रस्तुत करते है. बहरहाल जिस साफगोई से भड़ासजी ने अपनी यादों को समेटा है वो काबिलेतारिफ है, लेकिन बतौर पाठक ऐसा लगता है कि किताब में कई घटनाओं को विस्तार से लिखा जा सकता था. जानेमल जेल दस्तावेज भी है, जो पत्रकार की पीड़ा, ठसक, लापरवाही को चित्रित करता है.

वोदका प्रकरण, कोर्ट परिसर का मूत्रमय बंदी-गृह का चित्रण और जेल की भीतर चलने वाली शब्दावली का उल्लेख प्रभावित करती है. पूरी पुस्तक के पढ़ने के बाद ऐसा लगा कि यशवंत जी ने अपने जिंदगी के 68 दिन किसी जेल में नहीं बल्कि किसी आश्रम में बिताएं हैं और इस बात को यशवंत जी स्वीकार करते है कि वो भड़ास आश्रम की कल्पना भी ऐसे ही करते हैं जहां पढ़ने की आजादी, खाने-पीने की आजादी और मोबाइल, लैपटॉप से मुक्ति की व्यवस्था हो. कुल मिलाकर जानेमल जेल के एक ऐसे आदमी के संस्मरण हैं जो किसी भी परिस्थिति में हार नहीं मानता. पूरी पुस्तक कि सबसे अच्छी बात ये है कि ये पुस्तक घटनाओं का ईमानदारी से विश्लेषण करती है.

भड़ासजी को बधाई.

सुमीत ठाकुर का विश्लेषण. संपर्क: 07836855546


इनकी समीक्षाएं भी पढ़ सकते हैं…

चंदन श्रीवास्तव का विश्लेषण

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