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भड़ास के एक पाठक का नई दुनिया के संपादक आलोक मेहता से कुछ सवाल

मैं बड़े अदब के साथ नई दुनिया के संपादक आलोक मेहता जी से एक सवाल पूछ रहा हूं कि क्या नई दुनिया में निष्पक्ष पत्रकारिता हो रही है? माफ कीजिएगा छोटी मुंह बड़ी बात, पर मैं यह बात इसलिए आपसे कहना चाहता हूं कि आप भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुए जन आन्दोलन को काँग्रेस के सुर में सुर मिलाकर इसे आरएसएस का रंग देने की कोशिश करते रहे हैं, आपको यह जन आंदोलन कभी दिखा ही नहीं. हमेशा आपने इसे एक राजनीतीक आंदोलन साबित करने की कोशिश की है.

मैं बड़े अदब के साथ नई दुनिया के संपादक आलोक मेहता जी से एक सवाल पूछ रहा हूं कि क्या नई दुनिया में निष्पक्ष पत्रकारिता हो रही है? माफ कीजिएगा छोटी मुंह बड़ी बात, पर मैं यह बात इसलिए आपसे कहना चाहता हूं कि आप भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुए जन आन्दोलन को काँग्रेस के सुर में सुर मिलाकर इसे आरएसएस का रंग देने की कोशिश करते रहे हैं, आपको यह जन आंदोलन कभी दिखा ही नहीं. हमेशा आपने इसे एक राजनीतीक आंदोलन साबित करने की कोशिश की है.

आप जैसे पत्रकार अगर टीवी चैनल या अखबार के माध्यम से जनता को कुछ कहते हैं तो उसे लोग हमेशा सही मानते हैं. नेताओ से ज्यादा आज भी लोग पत्रकारों पर भरोसा करते हैं, अगर आप जैसे पत्रकार इस आंदोलन को सरकार के साथ मिलकर राजनीतिक रंग देकर मुद्दे से भटकाने की कोशिश करेंगे तो कैसे होगा. चलिये मान लीजिए अन्ना हज़ारे की टीम आरएसएस के इशारे पर काम कर रही है तो क्या आरएसएस को ये हक नहीं है कि वो भ्रष्टाचार के खिलाफ कुछ करे (आपने कभी सरकार से ये सवाल क्यूं नहीं पूछा कि आरएसएस पर लगा हुआ बैन काँग्रेस ने क्यों हटाया). आपका जवाब होगा कि फिर टीम अन्ना स्वीकार क्यू नहीं करती की उनका संबंध आरएसएस से है. भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी आंदोलन का इन सब बातों से क्या लेना देना. 

भ्रष्टाचार का कोई दल नहीं होता और न ही कोई जाति या मजहब होता है. हो सकता है भ्रष्टाचार से आपको कोई दिक्कत न हो क्यूंकि आप एक बड़े पत्रकार हैं और सरकार की छत्रछाया भी है आपके ऊपर, लेकिन आपको वाकई लगता है कि रामलीला मैदान में जुटी भीड़ आरएसएस और बीजेपी ने जुटाई थी. हमने उस समय भी आपको कुछ टीवी चैनलों पर डिबेट करते देखा था. उस समय भी आप इस अनशन और अन्ना के खिलाफ ही बोल रहे थे. माना कि आज पत्रकारिता की यही सच्चाई हो गई है कि बगैर पोलिटिकल सपोर्ट के कोई बड़ा पत्रकार नहीं बनता और न ही उसके अखबार या चैनल चल सकते हैं. और सच्चाई को सामने लाना पत्रकारिता का धर्म है और वो आप कर रहे हैं, लेकिन ये धर्म पूरी तरह से निभाना चाहिए. आपको काँग्रेस की रणनीति नहीं दिखाई देती है, उसके खिलाफ दिखाई नहीं देता.

आपने अन्ना और नानाजी के रिश्तों की सच्चाई को जितनी प्रमुखता से उठाया है, उतनी ही प्रमुखता से आप दिग्विजय सिंह और आरएसएस के रिश्तों को क्यूं नहीं उठाया (जो दिग्विजय सिंह हमेशा आरएसएस के खिलाफ बोलते हैं), आप ये तर्क तो दे नहीं सकते कि आपके पास उनकी खबर या तस्वीर नहीं थी. जब आप जैसे सम्मानित पत्रकार इस तरह के उदाहरण पेश करेगा तो मुझे चिंता है कि आने वाली पत्रकारों की पीढ़ी कैसी होगी. मैं ना तो टीम अन्ना का पक्षधर हूं और नहीं सरकार का. लोग हमे यही कहेंगे कि तुम अभी नए हो पत्रकारिता में, अभी अभी आए हो और आपके जैसे पत्रकार के ऊपर कुछ कैसे कह सकता हूं, लेकिन माफ कीजिएगा हमने उस आंदोलन के समय पूरी मीडिया को फॉलो किया था और अभी भी करता हूं, लेकिन हमे आपके अखबार और आपके अलावा कहीं और इतनी पक्षपात नहीं दिखी.

इस देश में और भी कई सम्मानित पत्रकार हैं, जो अपनी अहम भूमिका इस समाज और इस देश के लिए अदा कर रहे हैं, अगर गलत नहीं हूं तो. मेरा इरादा कतई आपको गलत साबित करने का नहीं है और न ही कभी मैं ऐसा सोच सकता हूं. भले आप हमें न जानते हों लेकिन मैं आपको जनता हूं इसलिए मैं आपकी बहुत इज्जत करता हूं. काँग्रेस का आरोप लगाना सही है, टीम अन्ना पर सवाल उठाना सही है, क्यूंकि वो राजनीतीक पार्टी है. अन्ना काँग्रेस के खिलाफ है इसलिए ये उनकी बात है. आपने संघ के साथ रिश्तों की जो बात उजागर की है, वो सही है, लेकिन साथ में आप ये भी कहते कि इस रिश्ते से भ्रष्टाचार की लड़ाई का कोई लेना-देना नहीं है. काँग्रेस तो चुनाव सामने देखकर ऐसी बातों को रोज उजागर करेगी पर नई दुनिया का काँग्रेस के साथ मिलकर जन आन्दोलन को राजनीतिक लड़ाई बनाना कितना सही है? काँग्रेस की चाल देश के बाकी सारे पत्रकारों को नजर आ रही है कि वो इस मुद्दे को 2014 तक नहीं ले जाना चाहती. वो अभी ही इसी विधानसभा चुनाव में निपटना चाहती है. जाहिर है आपको भी ये बात समझ में आती होगी, फिर क्या कारण है जो आप इस बात को उजागर नहीं कर रहे हैं.

काँग्रेस के नेताओं को आजकल टीवी चैनलों पर भागते हुए देखा जा रहा है. वो किसी की बात सुनना नहीं चाहते तो क्या आप उनकी बात को सामने रखना चाहते हैं. आप रामलीला मैदान में अन्ना हज़ारे के अनशन के समय जिसे भीड़ बता रहे थे, वो भीड़ नहीं थी. अगर भीड़ मान भी लिया जाए तो वो भीड़ किसी अन्ना के कहने पर इकट्ठी नहीं हुई थी, वो भीड़ थी एक मुद्दे को लेकर और आप उस मुद्दे से लोगों का ध्यान हटाने में काँग्रेस की मदद कर रहे हैं. मैं अन्ना हज़ारे या उनकी टीम को भी सही नहीं मानता, उनमें भी कोई दूध का धुला हुआ नहीं है. सबके ऊपर कोई न कोई दाग है और उनकी सच्चाई भी लोगों के सामने आना चाहिए लेकिन सरकार के रणनीतियों का भी खुलासा होना चाहिए. आपको सरकार या पॉलिटिकल पार्टियों की मंशा और रणनीति के बारे में भी लिखना चाहिए. टीम अन्ना और सरकार की रणनीति दोनों के बारे में लिखना गलत नहीं है लेकिन आपका सबसे पहला कर्तव्य एक पत्रकार के नाते इस समाज और देश के प्रति है, अगर कुछ गलत कहा हो तो छोटा समझकर माफ कीजिएगा और सही कहा हो तो विचार कीजिएगा.

एसके चौधरी (सोनू)

पत्रकार 

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