एक सज्जन को भड़ास के पांचवें स्थापना दिवस के कार्यक्रम में आने के लिए आमंत्रित किया तो उन्होंने कहा- ''पक्का तो नहीं कह सकता, लेकिन आने की कोशिश करूंगा. उस दिन असल में दोपहर की शिफ्ट है, इसिलए दो बजे आ पाना मुश्किल लग रहा है.''
मैंने उन्हें कहा कि आप अपनी शिफ्ट पूरे इत्मीनान से कर लीजिए, भड़ास जैसों के आयोजन तो होते रहते हैं. आखिर आप पक्की सी लगने वाली अपनी नौकरी पर क्यों खतरा मोल लें. लेकिन दूसरा पक्ष यह कि वे इसके पहले जिस नौकरी में थे, वहां उनके साथ मैनेजमेंट ने बड़ा बुरा बर्ताव किया. उनकी सेलरी रोक ली गई. उनको तरह तरह से प्रताड़ित किया गया. उन पर कई तरह के आरोप लगे.
तब उन दिनों उन सज्जन ने भड़ास का भरपूर साथ लिया. खुद का नाम न आए, इसका पूरा ध्यान रखा और मुझसे रखवाया, मैनेजमेंट की ऐसी तैसी करने वाली खबरें भड़ास पर प्रकाशित कराई. मैनेजमेंट ने दबाव में आकर उन्हें उनका पूरा पैसा दे दिया. जिस दिन से पैसा मिला, उस दिन से ये साथी भड़ास के पास पलट कर भी नहीं आए.
मतलब ये कि आप अपनी सुविधा के हिसाब से भड़ास का इस्तेमाल करें. और जब भड़ास को आपकी जरूरत पड़े तो आप नौकरी की मजबूरी बता कर पोलो ले लें. इस परम स्वार्थी दुनिया में हम लोगों ने भड़ास की शुरुआत इस उम्मीद से तो कतई नहीं की थी कि इस भड़ास के कारण क्रांतिकारियों की पूरी फौज तैयार हो जाएगी.
कायरों और अवसरवादियों की इस दुनिया में हम लोग शुरू से जानते थे कि हम लोगों पर जब मुसीबत पड़ेगी, तब कोई नहीं साथ आएगा. हम लोगों को पहले से पता था कि जब भड़ास को किसी के साथ की जरूरत पड़ेगी तो वह तरह तरह के बहाने बनाकर दाएं बाएं हो लेगा. लोग भड़ास की तारीफ करते नहीं थकते, भड़ास के तेवर को सराहते नहीं थकते, भड़ास के योगदान को रेखांकित करने नहीं रुकते… पर भड़ास के साथ कंधे से कंधा खड़ा होकर चलने में डरते घबराते हैं क्योंकि उन्हें नौकरी करनी है और जो नौकरी देता है, वह प्रबंधन भड़ास को नापसंद करता है क्योंकि उसी प्रबंधन को उसकी औकात बताता रहता है भड़ास…
इसलिए हे नौकरीबाज मित्रों, आप नौकरियां करें, हम आपकी लड़ाई लड़ें… आप के संकट में हम आपका कंधा बनें, हमारी जरूरत में आप अगल बगल भी न दिखें…. इन्हीं विरोधाभाषों के बीच जिंदा रहना, हंसना और आगे बढ़ जाना जिंदगी है दोस्तों… 17 मई को शाम दो से छह बजे तक भड़ास के पांचवें बर्थडे यानि भड़ास की रंगबाजी के पांच साला जलसे में आप निमंत्रित हैं. इसमें सिर्फ वही आएं जो भड़ास को पंसद और प्यार करते हैं. उन लोगों की बिलकुल जरूरत नहीं जो अपनी नौकरियों को अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी उपलब्धि और सबसे बड़ी मजबूरी मानते हैं…

दुनिया कायरों, नौकरीबाजों और अवसरवादियों से नहीं सजती, संवरती, चलती है… दुनिया हमेशा दिलेर और दंबग लोगों के चरणों में सिर नवाती है. कायरों-नौकरीबाजों की नियति है रोते-कांखते-डरते-छिपते जीवन जीना क्योंकि नौकरियां उनकी आत्मा पर राख डाल दिया करती हैं.. ऐसे लोग आखिर में यह सोचकर पछताते हैं कि… मुक्तिबोध के शब्दों में…
ओ मेरे आदर्शवादी मन,
ओ मेरे सिद्धान्तवादी मन,
अब तक क्या किया ?
जीवन क्या जिया !!
उदरम्भरि बन अनात्म बन गये,
भूतों की शादी में कनात से तन गये,
किसी व्यभिचारी के बन गये बिस्तर,
दु:खों के दाग़ों को तमग़े सा पहना,
अपने ही ख़यालों में दिन-रात रहना,
असंग बुद्धि व अकेले में सहना,
ज़िन्दगी निष्क्रिय बन गयी तलघर,
अब तक क्य किया,
जीवन क्या जिया!!
…
भावना के कर्तव्य त्याग दिये,
हॄदय के मन्तव्य मर डाले!
बुद्धि का भाल ही फोड़ दिया,
तर्कों के हाथ ही उखाड़ दिये,
जम गये, जाम हुए फंस गये,
अपने ही कीचड़ में धंस गये !!
विवेक बघार डाला स्वार्थों के तेल में,
आदर्श खा गये.
अब तक क्या किया,
जीवन क्या जिया !!
बहुत-बहुत ज़्यादा लिया,दिया बहुत-बहुत कम
मर गया देश, अरे, जीवित रह गये तुम!
भड़ास4मीडिया के संस्थापक यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.






