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भड़ास ने मीडिया को नई राह दिखाई : प्रो. निशीथ राय

भड़ास4मीडिया के चौथे स्थापना दिवस पर पहले तो यशवंत को बहुत-बहुत बधाई। इस अवसर को अपनी बेपरवाही या अनौपचारिकता में, या फिर बहुत गहरे अपनापे के कारण इसके सूत्रधार और संचालक यशवंत ने बर्थडे कहा है, लेकिन यह सच है कि एकला चलो की जिद पर निकली यह राह चार साल के दरम्यान न केवल एक मुहिम या अभियान बन चुकी है, बल्कि आजकल जिसे वैकल्पिक मीडिया कहा जा रहा है, उसकी मजबूत भूमिका भी भड़ास4मीडिया के जरिए ही बनी है। अभिव्यक्ति का मुक्त मंच बनकर भड़ास ने ढेर सारी वर्जनाएं तोड़ी हैं। तथाकथित महिमाओं के मुखौटे उतारे हैं। ऐसे लोगों की आवाज को जगह दी है जो स्तुति के समूहगान में सुर से सुर नहीं मिलाते और जिसकी वजह से उनकी कहीं सुनी नहीं जाती।

भड़ास4मीडिया के चौथे स्थापना दिवस पर पहले तो यशवंत को बहुत-बहुत बधाई। इस अवसर को अपनी बेपरवाही या अनौपचारिकता में, या फिर बहुत गहरे अपनापे के कारण इसके सूत्रधार और संचालक यशवंत ने बर्थडे कहा है, लेकिन यह सच है कि एकला चलो की जिद पर निकली यह राह चार साल के दरम्यान न केवल एक मुहिम या अभियान बन चुकी है, बल्कि आजकल जिसे वैकल्पिक मीडिया कहा जा रहा है, उसकी मजबूत भूमिका भी भड़ास4मीडिया के जरिए ही बनी है। अभिव्यक्ति का मुक्त मंच बनकर भड़ास ने ढेर सारी वर्जनाएं तोड़ी हैं। तथाकथित महिमाओं के मुखौटे उतारे हैं। ऐसे लोगों की आवाज को जगह दी है जो स्तुति के समूहगान में सुर से सुर नहीं मिलाते और जिसकी वजह से उनकी कहीं सुनी नहीं जाती।

भड़ास लेकिन सिर्फ खंडन-मंडन का मंच रहा होता तो महज इकहरा और प्रतिक्रियावादी बनकर रह जाता और तब चार साल का यह सफर कई भटकावों में उलझकर रह गया होता। ऐसा अगर नहीं हुआ तो इसकी एक वजह तो यही लगती है कि यशवंत के मन में कोई दुराग्रह या पूर्वाग्रह नहीं है। यहां तक कि खुद के प्रति भी वे निर्मम हैं और आत्म-आलोचक के रूप में जैसे हैं-वैसे हैं की स्वीकारोक्ति को सार्वजनिक करते रहने का उनमें दुर्लभ साहस है। कोई अगर अपनी कुंठा से भरी गागर उड़ेलना चाहे तो भड़ास पर उसको आसानी से जगह मिल जाती है, यहां तक कि उसमें लथपथ हो जाना पड़े, तब भी यशवंत को कोई परहेज नहीं। दूसरी ओर विष से भरे कलश के मुंह पर रखे अमृत-ढक्कन को खोल देने का काम यशवंत बखूबी करते रहते हैं। इन बातों ने भड़ास को विश्वसनीयता दी है और बगैर लाग-लपेट के सच्चाई सामने रख देने का अपने पाठकों में भरोसा जगाया है।

लेकिन इतना भर ही नहीं है भड़ास4मीडिया। इसने उलटी धारा में तैरकर पत्रकारिता की समानांतर संभावनाओं की खिड़कियां खोली हैं और आज की मुख्यधारा की सांस्थानिक व कॉरपोरेट पत्रकारिता में आए विचलन की पतन गाथाओं के जरिए बहुतों के चमकदार चेहरे के पीछे के अंधेरे को सामने रखकर बार-बार आगाह किया है कि वाकई अंधेरा कितना गहरा है और इससे निरंतर लड़ते जाने की जरूरत है। यशवंत का भड़ास हर जेनुइन लड़ाई का बढ़-चढ़कर साथ देता आया है- लड़ाई चाहे व्यवस्थाजन्य, शासन-प्रशासन के स्तर पर मीडिया के विरुद्ध किसी साजिश के तहत की गई कार्यवाही के खिलाफ हो, किसी पत्रकार की अपने शोषण-उत्पीडऩ के खिलाफ निजी लड़ाई हो, नागरिक अधिकार और मानवाधिकार की लड़ाई हो, व्यवस्था के चक्रव्यूह में घिरे किसी निहत्थे अभिमन्यु की लड़ाई हो, उसे धार देकर पुरजोर तरीके से लडऩे के भड़ास के जज्बे का आज हर कोई कायल है।

पत्रकारिता के भीतर और बाहर की दुनिया पर बराबर फोकस बनाए रखकर वैकल्पिक पत्रकारिता को बहुआयामी बनाने में भड़ास4मीडिया का, कम से कम हिंदी क्षेत्र में, बड़ा हाथ है। कई मुद्दों पर बहस चलाने, कई मुद्दों को बहसतलब बनाने में पहल करने, उन्हें अभियान का रूप देने का श्रेय भड़ास को जाता है। ताजा उदाहरण कथित निर्मल बाबा की हास्यास्पद किरपा का ही है। जब कई प्रमुख टीवी चैनल निर्मल बाबा के किरपा-व्यापार में हिस्सेदार बनकर उसके अंधविश्वास की अधर्म-धुजा उठाए हुए हैं, तब निर्मल के मलिन कृत्य को उजागर करने की पहल बड़ी शिद्दत से भड़ास पर ही देखने को मिली। भड़ास की बदौलत ही हजारों लोग निर्मलजीत सिंह नरूला की असलियत जान सके।

भड़ास का एक बेहद महत्वपूर्ण पहलू है पत्रकारों व साहित्यकारों के आत्मकथ्य और साक्षात्कार के माध्यम से गंभीर विमर्श चलाना, सांप्रतिक रचनाशीलता को सामने लाना और शास्त्रीय व लोकसंगीत की असाधारण उपलब्धियों को आज के बाजारू संगीत-शोर से निकाल कर लोगों के लिए पेश करना। चार साल के छोटे-से समय में भड़ास4मीडिया ने कई ऐसी कथाकृतियां जारी की हैं, जो भड़ास पर बहुपठित और बहुचर्चित होने के बाद पुस्तक के रूप में छपकर आईं। इसे भी भड़ास की समानांतर भूमिका ही कहेंगे। भड़ासी यशवंत को एक बार फिर बहुत-बहुत बधाई, कि दिल्ली के तिलिस्म में अपने को फंसने नहीं दिया और गाजीपुर के गांव की पगडंडी को हमेशा याद रखे हुए है। दरअसल, जिन्हें पगडंडी पर चलने का अभ्यास होता है, उनके पांव कभी नहीं डगमगाते। चलने से ही पगडंडी बनती है, जो राह भटकने नहीं देती।

लेखक प्रो. निशीथ राय लखनऊ और इलाहाबाद से प्रकाशित राष्ट्रीय हिंदी दैनिक डेली न्यूज़ ऐक्टिविस्ट के चेयरमैन हैं.


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