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भड़ास पर एकतरफा खबरें छपने से दुख भी हुआ

यशवंत जी…भड़ास4मीडिया के चार साल पूरे होने पर ढेर सारी बधाइयाँ… इन चार सालों के दरम्‍यान मैंने भड़ास को उम्मीदों की कसौटी पर हरदम खरा पाया… खबरनवीसों की ख़बरों को जिस बेबाकी और दृढ़ता से छापा गया उसी का नतीजा था कि बहुत ही कम वक़्त में इसने लोकप्रियता हासिल कर ली… कई बार कई मुद्दों पर एकतरफ़ा खबर छपने से दिल में दुःख भी हुआ… मगर पत्रकारों की आवाज एक मंच से उठने की ख़ुशी ज्यादा हुई…क्यों कि एक पत्रकार वो निरीह प्राणी है जो देश दुनिया समाज में हो रही गलत बातों को प्रकाशित करता है, रोकता है, आवाज उठता है, मगर अफ़सोस अपने साथ हो रहे शोषण के खिलाफ कभी आवाज नहीं उठा पाता.

यशवंत जी…भड़ास4मीडिया के चार साल पूरे होने पर ढेर सारी बधाइयाँ… इन चार सालों के दरम्‍यान मैंने भड़ास को उम्मीदों की कसौटी पर हरदम खरा पाया… खबरनवीसों की ख़बरों को जिस बेबाकी और दृढ़ता से छापा गया उसी का नतीजा था कि बहुत ही कम वक़्त में इसने लोकप्रियता हासिल कर ली… कई बार कई मुद्दों पर एकतरफ़ा खबर छपने से दिल में दुःख भी हुआ… मगर पत्रकारों की आवाज एक मंच से उठने की ख़ुशी ज्यादा हुई…क्यों कि एक पत्रकार वो निरीह प्राणी है जो देश दुनिया समाज में हो रही गलत बातों को प्रकाशित करता है, रोकता है, आवाज उठता है, मगर अफ़सोस अपने साथ हो रहे शोषण के खिलाफ कभी आवाज नहीं उठा पाता.

ऐसे में पत्रकारों की ख़बरों के लिए अगुआ या यूँ कहें कि एक मसीहा बनकर आया भड़ास4मीडिया…अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है यशवंत जी…खैर…परिवर्तन एक दम से नहीं होता… उसकी एक बयार चलती है… और फिर सब कुछ बदल जाता है… अब देखिये न… मायावती के राज में यशवंत जी को कैसी कैसी परेशानियाँ झेलनी पड़ी… उनके परिवार की चाची और कई लोगों को पुलिस ने थाने में बैठाये रखा… हैरत की बात तो ये थी कि औरों के लिए न्याय की आवाज़ उठाने वाले यशवंत भी माया और उनके अधिकारियों से फरियाद लगाते नजर आये… मगर मजाल है कि अफसरों के कानों पर जूं रेंगे… बमुश्किल १८ घंटे थाने में गुजरने के बाद अपनी माँ और चाची को छुड़ा पाए… लेकिन इस पत्रकार के दिल में चाणक्य की तरह आग लग चुकी थी, चोटी में नंदवंश के नाश करने की तरह माया शासन को भी उखाड़ फेंकने का संकल्प किया.

खैर, उत्तर प्रदेश की जनता भी बसपा की शासन से उकता गई थी…परिवर्तन हुआ…और माया उत्तर प्रदेश से गायब हो गई…मुझे आज भी याद है कि यशवंत की चाची को जब थाने में बैठाया गया था… और करीब १८ घंटे उनको छुड़ाने में लगे थे… तब यही दिल में आया था कि गर कभी मेरी माँ को किसी साजिश के तहत बिठा लिया गया तो शायद पता नहीं छुड़ा पाऊंगा या नहीं… और बस उसी समय अब पत्रकार नहीं बनूँगा शीर्षक से एक कविता लिखी थी… खैर बुरा वक़्त चला गया… अब कुछ अच्छा करने के दिन है.. .यशवंत की जीत के साथ और चार साल पूरा होने से दिल जोश से भर गया… रोम रोम में ताजगी और स्फूर्ति भर गई… और पत्रकारिता के लिए कुछ करने का जज्बा फिर से आ गया… सो नित नई-नई ऊंचाइयों को हासिल कीजिये… और पत्रकारों के लिए आवाज उठाते रहिये…धन्यवाद भड़ास.

कृष्ण कुमार द्विवेदी

छात्र

माखनलाल राष्ट्रिय पत्रकारिता विश्वविद्यालय

भोपाल 


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