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‘भड़ास पर गलत खबर छपी, सिपाही ने मेरे बेटे को थप्पड़ मारे थे’

यशवंत जी, जिस भी पत्रकार मित्र ने यह खबर भड़ास पर डाली है मैं उसको बधाई देता हूं. वह केवल अकेले ऐसे पत्रकार नहीं हैं जिन्होंने यह खबर लिखी है. देवरिया में ऐसे कई और भी पत्रकार मित्र हैं जिन्होंने यह साहसिक कारनामा किया है. मैं उनको भी बधाई देता हूँ. बधाई इस चीज की कि उनको कलम पकड़नी आ गयी. पहले चौराहे पर घूमकर पान और पौव्‍वा के लिए पैसा मांगते थे अब पत्रकार कहलाते हैं. इस प्रमोशन की बधाई. बधाई इस चीज की भी कि पुलिस वालों के पैर छूकर डीसी कालम की खबर पा जाने की कला आ गयी है और जोश इतना कि खबर किसी पुलिस वाले की जुबानी सुनकर घर बैठे ही आँखों देखा हाल लिख देते हैं.

यशवंत जी, जिस भी पत्रकार मित्र ने यह खबर भड़ास पर डाली है मैं उसको बधाई देता हूं. वह केवल अकेले ऐसे पत्रकार नहीं हैं जिन्होंने यह खबर लिखी है. देवरिया में ऐसे कई और भी पत्रकार मित्र हैं जिन्होंने यह साहसिक कारनामा किया है. मैं उनको भी बधाई देता हूँ. बधाई इस चीज की कि उनको कलम पकड़नी आ गयी. पहले चौराहे पर घूमकर पान और पौव्‍वा के लिए पैसा मांगते थे अब पत्रकार कहलाते हैं. इस प्रमोशन की बधाई. बधाई इस चीज की भी कि पुलिस वालों के पैर छूकर डीसी कालम की खबर पा जाने की कला आ गयी है और जोश इतना कि खबर किसी पुलिस वाले की जुबानी सुनकर घर बैठे ही आँखों देखा हाल लिख देते हैं.

पर पाठक न तो बेवक़ूफ़ है और न ही अँधा, जो घटना उसकी आँखों के सामने घटी और उसको पुलिस वाले की जुबानी पढ़ने को मिले तो वह गाली ही देता है. और दे भी रहा है. यकीन न हो तो मेरे प्यारे साथियों जाओ जरा जाकर उस परशुराम मणि तिराहे और उसके आस पास रहने वाले लोगो की जुबानी अपनी प्रशंशा सुन लो और बताओ कि तुम्ही वो महान पत्रकार हो, जिसने घर बैठे यह सीधा प्रसारण लिखा है, फिर शायद संस्कृत के श्लोक के अलावा जूतों का हार भी आपके सम्मान में लोग पेश कर दें.

भड़ास के सुधि पाठकों मेरी कतई कोई मंशा नहीं है कि मैं किसी के ऊपर व्‍यंग्‍य कसूं, पर जब यह खबर देखी तो पत्रकारिता का यह रूप देखकर यह भड़ास बरबस ही निकल गया. घटना क्रम के बारे में आपको बता दूं कि परशुराम मणि तिराहे के पास मेरे एक परिचित रहते हैं, जिनकी बाइक मैं अपने काम से लेकर गया था. मैं कवरेज से लौटा तो मुझे धूप लग गयी थी इसलिए मेरे लड़के ने कहा कि पापा अंकल की गाड़ी मैं ले जाकर दे देता हूं. वह गाड़ी लेकर पैदल ही तिराहा पार कर रहा था तभी वहां खड़े सिपाही रामसकल यादव ने उसको गाली देकर गाड़ी रोक ली और उसके पाकेट से चाबी निकाल ली. 

सिपाही ने गाली देते हुए गाड़ी का कागज मँगा तो उसने कहा कि कागज कहाँ है मैं पापा से पूछ लेता हूं, तो सिपाही ने अपशब्दों की बौछार करते हुए कहा कि नेतागिरी करते हो और उस सिपाही ने मेरे बेटे को कई थप्पड़ जड़ दिए. जब वहां खड़े लोगों ने इसका विरोध किया तो नशे में धुत्त उस सिपाही ने लोगों को भी गालियां दी. जब एक व्‍यक्ति के जरिये मुझे सूचना मिली तो मैंने एसपी साहिबा का नंबर मिलाया पर उनका मोबाइल नहीं उठा, फिर मैंने शहर कोतवाल का नंबर मिलाया और उन्हें मामले की जानकारी दी. शहर कोतवाल सारनाथ सिंह तुरंत ही मौके पर पहुंचे और तभी मैं भी पहुंच गया. उस वक्त तक पुलिस के इस कृत्य के विरोध में दो हजार की भीड़ जुट चुकी थी और भीड़ पब्लिक जस्टिस करने को आतुर थी, जिसे देखकर वहां मौजूद पुलिस कर्मी मिर्गी के मरीज की तरह कांपने लगे, पर मैंने कुछ लोगों के सहयोग से सबको शांत कर वापस जाने को कहा, जिस बात के गवाह शहर कोतवाल और भुजौली चौकी इंचार्ज राम मूरत यादव हैं.

तब तक पुलिस कर्मियों को पता चल गया था कि जिस लड़के की उन्होंने पिटाई की है, वह एक पत्रकार का लड़का है, तो उन्होंने थप्पड़ मारने की कहानी तैयार कर ली. उनके इस बात की तसदीक जब शहर कोतवाल ने वहां मौजूद लोगों और दुकानदारों से की तो पता चला कि थप्पड़ मारने वाली कहानी बिलकुल ही झूठी है. फिर शहर कोतवाल ने आरोपी सिपाहियों को फटकार लगाते हुए मामले को ख़तम करने के लिए कहा. फिर मैंने उनकी बात का विरोध नहीं किया और जिस गाड़ी का चालान उन्होंने कर दिया था, उसका जुर्माना भरवाकर गाड़ी वापस कर दी. पर छपास के कुछ दलाल पत्रकारों को यह बात हजम नहीं हुई और रात दस बजे के बाद उन्होंने आरोपी सिपाही से मिलकर उसकी बनाई कहानी पुलिस कप्तान को सुनाई और बार-बार कार्रवाई के बारे में पूछने लगे. किसी के दबाव में न आने वाली बोल्ड कप्तान को यह प्लांट स्टोरी सुनाकर और बहका कर मेरे लड़के पर मुक़दमा कायम कराया गया.

न तो मेरे लड़के से किसी छपास पत्रकार ने पूछा कि उसके साथ क्या हुआ न ही वहां के स्थानीय लोगों या दुकानदारों से इस बात की जानकारी ली कि वहां क्या हुआ है. बस अपने रिश्तेदार बलमा सिपहिया की बात सुनी और चल दिए. किसी ने यह भी पूछने की जहमत नहीं उठाई कि एक सिपाही को गाड़ी रोकने और चेक करने का अधिकार किसने दे दिया. यह भी नहीं जाना कि सिपाही को गाली देने और मारने का अधिकार कहाँ से मिला. एमवी एक्ट के कौन से आर्टिकिल में यह प्रावधान है, दुकानदारों की बेंच और मेज उठवाकर पुलिस ने सड़क पर अदालत लगाने का अधिकार कहाँ से हासिल किया? यह सब सड़क छाप पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों को नहीं मालूम कि खबर में वर्जन और काउन्टर वर्जन लिया जाना एकदम जरूरी है, पर कभी पत्रकारिता की हो तो जाने, दलाली जिंदाबाद है पत्रकारिता जाए भाड़ में.

मैं देवरिया जिले के दलाल पत्रकारों को चैलेन्ज करता हूं कि जब तक मेरा कैमरा चलता रहेगा तब तक दलालों की मोनोपोली नहीं चलेगी, चाहे जितना लिखना है लिखो, चाहे जितना छापना है छापो, पर एक बात पर जरूर गौर कर लेना सतही पत्रकारिता करने वाले पत्रकारों की ऐसे खबरों के प्रकाशन के लिए जबाब देही जरूर तय कराऊंगा.

अवनीश मणि त्रिपाठी

पत्रकार, देवरिया

[email protected]


मूल खबर पढ़ने के लिए इस लिंक पर क्लिक कर सकते हैं – पत्रकार पुत्र ने सिपाही को थप्‍पड़ मारा, मामला दर्ज

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