Haseen Rahmani : देखो भाई… कॉमरेड होना अलग बात है और एक वेबसाइट चलाना एक अलग बात…. और ये जो दिमाग में जनसरोकारी की बाते भरी पड़ी उसे निकाल दो. 2014 तक। एक साल तक अच्छा मौका है। लूट लो जितना चाहो…चुनाव के बाद करेंगे झण्डा बुलंद. खूब चिल्लाएंगे.. शेम शेम, डाउन डाउन …. पूंजीवाद के खिलाफ… राष्ट्रवाद के खिलाफ..

Yashwant Singh जिन साथियों राष्ट्रवादियों भाजपाइयों संघियों कम्युनिस्टों को विज्ञापन और विचार के बीच का फर्क नहीं पता, उनसे बहस करना बेकार… उन्हें उनके मेंटल लेवल का संज्ञान लेकर दूर से ही करना चाहिए प्रणाम… हां, जो भी ऐसी बहस उठा रहे हैं, उनकी बात को मैं अपने वॉल पर सम्मान के साथ जगह दे रहा हूं ताकि उनकी 'मंशा' पूरी हो जाए… जय हो..
Haseen Rahmani Yashwant जी 'विज्ञापन और विचार के बीच का फर्क' आप ही बता दीजिए, हम मूर्खो के लिए सहूलियत रहेगी…
Yashwant Singh हसीन रहमानी भाई… कुछ काम खुद भी करिए… कब तक बैसाखियों के सहारे चलेंगे … मैं इतना भर आपको समझा सकता हूं कि कोई भी अखबार या चैनल या वेबसाइट, विज्ञापन किसी भी पोलिटिकल पार्टी या आइडियोलाजी का चला सकता है… और इस विज्ञापन चलाने से उसके अपने विचार, विजन, तेवर पर कोई फरक नहीं पड़ता. विज्ञापन एक अलग डिपार्टमेंट होता है और कंटेंट अलग. दोनों में घालमेल नहीं होना चाहिए, यही पत्रकारिता की नैतिकता है.
Haseen Rahmani खैर यह सचमुच मूर्खो के लिए बड़ी जानकारी है..और आप जैसे धंधेबाजों के लिए एक तर्क भी जिनके लिए विज्ञापन का श्रोत उनकी प्रतिबद्धता को प्रभावित नहीं करता…
Yashwant Singh Haseen Rahmani साहब शुक्रिया. सही पहचाना. अपन धंधेबाज हैं. क्योंकि जो कोई भी अपना काम यानि अपना धंधा करता है, वह धंधेबाज ही तो हुआ… रही बात प्रतिबद्धता की तो इसको साबित करने के लिए बोलने बताने की जरूरत नहीं पड़ती, यह कर्म से दिखना पता चलना चाहिए… वैसे, ये सवाल सिर्फ आपने ही नहीं उठाया है, एक भाजपा समर्थक महिला साथी ने भी उठाया है…
Haseen Rahmani वह तो दिखाई पड़ ही रहा है…(इमेज प्रस्तुत स्टेटस के साथ संलग्न है)
Yashwant Singh हां तो भाई उसी को देखते रहिए… 🙂
Haseen Rahmani मुस्कराइएं कि आप भाजपाई हैं और पत्रकारिता में है…
Yashwant Singh जी, आपका फतवा कुबूल है साहेब.. देखें, मुस्करा रहा हूं 🙂
Haseen Rahmani आप के इस 'फतवा' शब्द ने तो तोगड़िया की याद दिला दी। और आप को इस पर तीन बार नहीं हजार बार मुस्कराने की जरूरत है। मुस्कराते हो, लेकिन बकौल गालिब शर्म तुमको मगर नहीं आती…
Yashwant Singh Haseen Rahmani साहब, बेशर्मों से काहे बहस करते हो भाई.. और, जब किसी के भाजपाई होने का सर्टिफिकेट जारी करोगे तो इसे और क्या कहा जाएगा.. फतवा ही तो.. बाकी, तोगड़िया के बारे में आपको ज्यादा पता होगा, मुझे नहीं क्योंकि मैं उनका ध्यान नहीं रखता जो ध्यान रखने लायक लोग नहीं हैं… और, ग़ालिब शब्द लिखते हुए ग के नीचे नुक्ता लगा लेते तो चचा ग़ालिब का पूरा सम्मान हो जाता…
Yashwant Singh साथ ही, किसी का मुस्कराना और रोना, आपके हाथ में नहीं इसलिए जबरदस्ती कट्टरपंथी पना इस क्षेत्र में भी काहे दिखाते हो… जिसे मुस्कराना होगा वो मुस्कराएगा ही, बेहद विपरीत हालात के बावजूद… वो आप न रोक सकोगे…
Haseen Rahmani बेशर्मी बरकरार है. वैसे आजकल नुक्ता चलता नहीं है फिर भी नुक्ताचीनी की आदत गई नहीं…विपरीत हालात में मुस्कराते रहिए और मुस्कराते हुए भाजपाइयो से विज्ञापन जुटाते रहिए..धंधे का यही उसूल है..
Yashwant Singh आजकल नुक्ता कहां चलता है साहेब… आजकल तो फतवा गिरी और कट्टरपंथी पना चलता है… चलाते रहिए… अपन लोगों के यहां अगर भाजपाइयों क्या, संघियों और मुस्लिम कट्टरपंथियों के भी विज्ञापन चलकर अपने पैरों से आएंगे तो छपेंगे, बशर्ते वो लोकतांत्रिक मर्यादा के दायरे में हों और विज्ञापन में कोई ऐसी चीज न हो जो गैरकानूनी व असंवैधानिक हो… ये पहले भी करते रहे हैं, आज भी करेंगे और आगे भी करेंगे… आप बशर्मी से बहसियाते रहिए…
Haseen Rahmani हार गया साहिब…लग रहा है मोदी को लाकर ही मानोगे… मार ही डालोगे
Yashwant Singh अरे नहीं साहब, हम काहें मोदी को लाकर रहेंगे… हमारा तो विचार स्पष्ट है… लेकिन मोदी के चुनावी विज्ञापन लगाने को कहे जाएंगे तो हम इससे इनकार नहीं करेंगे क्योंकि फिर कह रहा हूं कि विचार और विज्ञापन दोनों अलग चीजें हैं.. विज्ञापन के कारण किसी मीडिया माध्यम के अपने विचार तेवर सरोकार प्रभावित या नष्ट नहीं होते… अन्यथा अगर ऐसा होता तो अभी तक सारे भाजपाई अखबार कांग्रेसी हो चुके होते और सारे कांग्रेसी अखबार भाजपाई… क्योंकि दोनों तरह के अखबार दोनों ही पार्टिोयं के विज्ञापन छापते हैं… पर आप से बहस मैं क्यों कर रहा हूं क्योंकि आपने तो फतवा जारी कर दिया है … सो, आप कहते रहिए कि भड़ास भाजपाई हो गया और यशवंत प्रखर राष्ट्रवादी… 🙂
Haseen Rahmani भड़ास भाजपाई हो गया और यशवंत प्रखर राष्ट्रवादी… (स्माइली लगाने की जरूरत नहीं थी)
DrBhupendra Singh वैसे फतवा शब्द सुनकर तोगङिया से पहले निकृष्ट मौलवीयों की याद आती है… नहीं ?
Haseen Rahmani आज के बाद मुझे फतवा शब्द सुनकर निकृष्ट DrBhupendra Singh की ही याद आयेगी…
DrBhupendra Singh चलिये इसी बहाने आपकी यादो में शामिल हो गये….
Yashwant Singh आप स्माइली हटाकर ही लिखिए, फैलाइए और मन में रखिए… मुझे कोई फरक नहीं पड़ता..
DrBhupendra Singh बस प्यार बरकरार रखिये सपनो में भी आयेंगे… वन्दे मातरम्….
Yashwant Singh अरे डाक्टर भूपेंद्र जी… आप काहें परेशान हो रहे हैं.. सपना बस सपना ही रह जाएगा भाई… यथार्थ के धरातल पर रहिए…
शशांक शेखर Hahaha विज्ञापनों से परहेज है इन सबको…खैर जो जोन चीज़ देखना चाहता है वही दिखाई देगा….
DrBhupendra Singh लो जी मै धरातल पर लौट आया 🙂
भाजपा विरोधी हसीन रहमानी के फेसबुक वॉल से.
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