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भड़ास पर भाजपा का विज्ञापन : फेसबुक पर बवाल (पार्ट तीन)

Yashwant Singh : मैं कुछ वरिष्ठ पत्रकारों और मित्रों से जानना चाहूंगा कि क्या किसी पोर्टल पर अगर भाजपा का चुनावी विज्ञापन चल रहा है तो इससे वो पोर्टल और उसका एडिटर विचारधारा के लेवल पर भाजपाई मान लिया जाएगा? आप सभी की प्रतिक्रिया का इंतजार है..

Yashwant Singh : मैं कुछ वरिष्ठ पत्रकारों और मित्रों से जानना चाहूंगा कि क्या किसी पोर्टल पर अगर भाजपा का चुनावी विज्ञापन चल रहा है तो इससे वो पोर्टल और उसका एडिटर विचारधारा के लेवल पर भाजपाई मान लिया जाएगा? आप सभी की प्रतिक्रिया का इंतजार है..

    Sanjay Sharma No..
 
     Yashwant Singh आप दोनों Haseen Rahmani, Pashyanti Shukla ने सवाल खड़े किए हैं.. मैं चाहूंगा कि इस पर बात ठीक से हो… आप दोनों अपनी बात यहां रखिए ताकि इस बहस को बड़े फलक पर ले जाया जा सके…
 
    Yashwant Singh यस या नो की बजाय Sanjay Sharma जी, थोड़े विस्तार से रोशनी डालें..
 
    Sanjay Sharma विज्ञापन से किसी भी संस्थान की विचारधारा का कोई मतलब नहीं ..
   
    Yashwant Singh कोई भी वाम-दक्षिण-मध्य विचार का साथी यहां बात रख सकता है…
    
    Ashendra Singh यशवंत भाई , व्यापार का विचारधारा से कोई सम्बन्ध नहीं है. पोर्टल तो अब व्यापर का एक ज़रिया बन गए हैं ]
     
    Vijay Yadav भाई , जो व्यक्ति इस तरह का सवाल उठा रहा हो , जरा उससे पूछिए कि , तमाम राजनीतिक दलो का विज्ञापन दिखाने वाले चैनल राजनीतिक हो गए है। किसी विज्ञापन को विचारधारा से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए।
    
    Manoj Chhabra sir showing advertisement is normal thing with any media, but presenting advertisement in disguise of news that too all around day 24×7, Hazam nahi hota
     
    Ajeet Verma main bahut warisht mathadeesh to nahi par mitrawat kah raha hoon ki content aur vigyapan alag alag -item hain jo functionally inter dependable hain. ideology se advertismement ka sambandh nahi asthapit kiya ja sakta. Par lagatar ek he paksh ka vigyapan prakishit karne se kisi khaas party ka sympathiser hone ka aarop lag sakta hai.
 
    Pankaj Chaturvedi विज्ञापन अलग बात हे और उसकी सामग्री अलग — कई बार पांचजन्य में सरकारी विज्ञापन छापते हें , हाँ यदि विज्ञापन में मिले धन से प्रभावित हो कर खबरे हो तो फिर भास्कर और उस पोर्टल में भेद नहीं हे
   
    Amardeep Srivastav nahe.
    
    Ravindra Bharti hahahhaa
     
    Yashwant Singh Ashendra Singh जी, हिंदी पोर्टल अभी लाभ का सौदा नहीं बने हैं… इसलिए इसका संचालन अभी कष्टकारी काम है.. बहस अभी पोर्टल व व्यापार का नहीं बल्कि विज्ञापन प्रकाशन से पोर्टल के विचारधारा के प्रभावित होने को लेकर है…
     
    Siddharth Kalhans बिलकुल चल सकता है विज्ञापन। शिलाजीत का मिले तो वो भी चलाओं भाई। आखिर कहां से चलेगी साइट। आपकी रंगदारी मांगने से कब तक चल पाएगी। वो तो चखने का भी जुगाड़ नही कर सकती
     
    Manoj Chhabra advertisement is purely a commercial activity, but hidden ads( in form of news )or surrogate advertising is not ethical.
     
    Abdul Noor Shibli main aisa nahin manta. advt to kisi ka koi bhi laga sakta hai
     
    Pradeep Sharma व्यापार से बिचार का क्या सम्बन्ध कोई मुझे ये तो बताए भाई दोनों अलग अलग है ।
     
    Sanjaya Kumar Singh नहीं, बिल्कुल नहीं. जो माने सो …..। एडिटर तो लिखेगा, करेगा उससे उसकी विचारधारा मालूम होगी। एडिटर की विचारधारा भाजपाई या कांग्रेसी नहीं होती – दब्बू, डरपोक, चमचा आदि उसके लिए ज्यादा उपयुक्त हैं
     
    Pashyanti Shukla Yashwant Singh मैने तो बस ऐसे ही सवाल उठाया था…. लेकिन मुझे इसमें कुछ गलत नहीं लगता as we cn not ignore the financial aspects. इस बात को दो तरीके से देख सकते हैं –
    1- जैसे हमने देखी और लोग देख रहे हैं कि केजरीवाल का गुणगान करने वाले और मोदी देश के प्रॅधानमंत्री न बने और अगर ऐसा हो तो ये देश का सौभाग्य हो ये बताने वाले यशवंत भाई खुद की वेबसाइट पर बीजेपी का प्रचार कर रहै हैं…माफ कीजिएगा प्रचार तो प्रचार ही है चाहें विज्ञापन के ज़रिए हो या पेड मीडिया के ज़रिए..
    2- लेकिन दूसरा पहलू भी तो है जिस पर हममें से बहुत कम का ध्यान ही शायद गया होगा..
    कि बिना इस बात से डरे या सोचे कि अगर मै बीजेपी या कांग्रेस के खिलाफ आग उगलूंगा तो मुझे इन पार्टियों का विज्ञापन नहीं मिलेगा यशवंत जी इनके खिलाफ लिखते रहे हैं और शायद आगे भी लिखते रहेंगे….
    और वो उस समय जब मीडिया के पास इन विज्ञापनों के ज़रिए पैसा कमाने का सबसे बेहतरीन समय है चुनाव…
    एक पार्टी का ad न मिल पाने की कीमत ज़रा बीट रिपोर्टर से पूछो…
    और यहां भड़ास पर बीजेपी एड दे रही है..वो भी तब जब उसका सर्वेसर्वा हमेशा उनके ही खिलाफ आग उगलता रहा है
     
    शंभूनाथ शुक्ल Yashwant Singh: विज्ञापन छापने अथवा नहीं छापने या नहीं प्रसारित करने के अपने कुछ नैतिक मूल्य और कानून हैं। अगर उस विज्ञापन से समाज में कोई विध्वंसक माहौल नहीं बन रहा या समाज में घृणा नहीं फैल रही तो उसे छापना या दिखाना गलत नहीं है। किसी पार्टी के प्रचार से संबंधित विज्ञापन रोकने का संपादक को कोई अधिकार नहीं है। आप निजी तौर पर किसी भी विचारधारा या राजनैतिक दल से जुड़े हो सकते हैं पर खबर में आप यह प्रतिबद्धता नहीं दिखा सकते। यहां तक कि पार्टी पेपर भी। यह अलग बात है कि अपने संपादकीय में आप अपनी विचारधारा के मुताबिक अपने विचार रखें।
   
    Kuldeep Singh Sisodia Agreed with shambhunath shukla sir
    
    Ashendra Singh विज्ञापन फ्री में कहाँ प्रकाशित होता है.., संपादक जब से प्रबंध संपादक बने हैं तब से सम्पादकीय लिखने के जिम्मेदारी भी ८००० रूपए पाने वाले स्टाफ पर आ गयी hai.
     
    Shailendra Mishra विज्ञापन अलग चीज़ है । उसका विचारधारा से ज़्यादा सम्बंध नही ।
     
    Mayank Saxena ये बात शायद परसों की ही है, मैंने ये विज्ञापन देखा…देखते ही सोचा कि देखो एक-आध दिन में इस पर कोई कुछ बोलेगा…साथ बैठे एक मित्र ने कहा भी…देखो बीजेपी का विज्ञापन है…मोदी का भी फोटो है रमन सिंह के साथ…मैंने पलट कर तुरंत कहा…भाई सहब बगल में ओपेन मैगज़ीन वाली एंटी मोदी ख़बर भी है…और जब मोदी के खिलाफ स्टिंग करने वाली तहलका में बीजेपी का विज्ञापन छपता है…या आउटलुक में स्पॉटलाइट फीचर चलता है…तब क्यों आप सब रेवेन्यू मॉडल का रोना रोते हैं…प्रो मोदी स्टोरी छापने और बीजेपी का विज्ञापन लेने में बड़ा अंतर है…सबसे बड़ी बात ये कि यहां साफ लिखा था ADVT तमाम टीवी चैनल जबदिन भर पैसा लेकर मोदी की रैली का लाइव करते हैं वो तो साफ पेड न्यूज़ है…जहां ADVT लिखा भी नहीं है…दूरदर्शन भी सारे दलों का विज्ञापन चलाता है…कानून भी ये कहता है…बाकी हां, संभवतः विज्ञापन छत्तीसगढ़ सरकार का है…अब बीजेपी का ब्रांड लोगो मोदी हैं, तो वो तो छपेंगे ही…
    हां, जिनको ज़्यादा आपत्ति है, वो उस विज्ञापन शुल्क के बराबर का पैसा दे दें…विज्ञापन हटा दिया जाएगा…और हर माह देते भी रहें…मतलब मदद करने कोई आगे नहीं आएगा…ख़ुद लोग कारपोरेट की नौकरी करते रहेंगे…और गाली खूब देंगे….
    हां, सीपीएम या एम एल भी विज्ञापन दे तो यशवंत भाई छापिएगा ज़रूर (अगर दें तो)
 
    Naveen Naveen Bilkul nahi …lekin bigyapan pata chalna chahiye alag se wo webisite ke content ka part na dikhe or usase bhi jyada wanha agar website ke add ki rate list ka link kanhi aas pass de di jaye to bahut acchi bat
   
    Kuldeep Singh Sisodia Vigyapan prasarit karne se koi vishesh party ka samarthak nahi kaha ja sakta …. jaise kirane ki dukaan lagane wala her shaksh baniya nahi ho sakta
     
    Alka Bhartiya गर विचारधारा अलग हैं तो उस पार्टी से जुदा विज्ञापन प्रसारित करना सिद्धांत तो सही नहीं… जैसी विचारधारा से इतर पोर्टल का एडिटर हैं तो उस विचार धारा को पैसे के खातिर प्रमोट भी कर रहा हैं तो ऐसे में पढ़ने वाले क्या समझे, इसे भी क्लियर करें.. फिर तो किस स्टेटमेंट की सहयता से एडिटर महाशय का कर्तव्य हैं विचार क्लियर करना
     
    Masaud Akhtar व्यर्थ का प्रलाप है ये…… लोग और कुछ नहीं तो कह पाए तो अब यही उनके हाथ लगा …. इससे अपनी ऊर्जा व्यर्थ करना ही पूरी तरह व्यर्थ है. इन बातों पर ध्यान देना ही बंद करें
    
    Anurag Mishra विज्ञापन का मसला अपनी जगह पर है और ख़बरों का मसला अपनी जगह पर है विज्ञापन से किसी भी संपादक या न्यूज पोर्टल की विचारधारा को नहीं आंका जा सकता। लेकिन Yashwant Sir एक बात कहना चाहूंग कि जिसने भी अपने पोर्टल का पेज डावनलोड करके लगाया है उसने भी कुछ गलत नहीं किया उसने वही किया जो वो आज के दौर में वो देख रहा है। आज के समय में अमूमन ये देखा जाता है कि मिडिया संसथान उस संसथान के खिलाफ खबर नहीं लिखते जहाँ से उन्हें विज्ञापन मिल रहा हो भले ही वो संस्थान कितना ही गलत क्यों न कर रहा हो, अलबत्ता वो उन्हें छिपाने और बचाने का काम करते है। इसलिए एक बहस इस विषय पर भी होनी चाहिए की आखिर मीडिया में ऐसी प्रवृत्ति फ़ैल क्यों रही है ? वरना ऐसे आरोप तो मीडिया संस्थान और उसके संपादको पर लगते रहेंगे।
     
    Prabhakar Kumar Rai tab to akhbar me bhi advt nahi chhape aur tv par bhi nahi chalna chahiye …. ye to bhada mjak hai…
     
    Pushya Mitra भाई, जिन्हें परेशानी हो वे कांग्रेस का ला दें, मामला बैलेंस हो जायेगा…

    Shams 'Adnan' Alavi No…

    Vinay Maurya Yashwant भईया विज्ञापन तो पोर्टल /एडिटर के आय का स्रोत होता उससे किसी की विचारधारा से जोड़कर नहीं देखा जा सकता ।

    Bhupender Singh apke uppar aarop laga kya?? kal dekha tha bhadas par bjp ke add.

    Nizam Patel nahin. .. hargiz nahin.. lekin khatakta hai

   Madan Arora wah

   शक्ति प्रताप सिंह विशेन Agar ad "Al-Khangress" ka ho to "secular certificate" pakka…!!!

    Sunil Bajpai कोई कुछ भी माने लेकिन विचारधारा तभी बदली जा सकती है, जब प्रमाण और सटीक तर्क से उसे मन स्वीकार करे। किसी भी तरह के आरोपों या फिर लोगों के कहने की चिंता इस लिए भी नहीं की जानी चाहिए क्योंकि जो समाज हमें नये जूते दे नहीं सकता, फिर हम इस बात की चिंता क्यों करें कि फटे जूते पहने देखकर लोग हमें क्या कहेंगे?
कहते हैं तो कह जाने दो,
अंतर्मन से बह जाने दो।
निन्दा रस है मार्ग प्रदर्शक
खुद पीओ, पीते जाने दो

       Anita Gautam विज्ञापन शुद्ध व्यवसाय है, इसका किसी के विचार और विचारधारा से कोई लेना देना नहीं हमारी समझ से यशवंत जी।

     Pervaiz Alam NO.

     Sant Kaushik no no no no

      Anil Singh विचारधारा को इन हरामखोरों के अंदर डालिए.. इन्‍हें जब आप मुश्किल में होते हैं.. तब विचारधारा की मदद करने की आवश्‍यकता समझ में नहीं आती.. लेकिन जब विज्ञापन दिखा तो इनको विचारधारा याद आ गई… अपने साले घर में दुबके रहते हैं जरूरत पर.. किसी की मदद करने नहीं आते लेकिन जब दिखता है कि दो पैसे मिल रहे हैं तो विचारधारा को आगे कर देते हैं… कुत्‍तों को भौंकने दीजिए.. ये साले हमेशा से भौंकते रहे हैं और भौकते रहेंगे..

     Dhananjay Singh ये नादानों वाले सवाल आप क्यों ले बैठे पार्टनर ?प्रधानमंत्री कैंडिडेट घोषित होने के बहुत पहले से ही गुजरात के मुख्यमंत्री कहाँ गए, किससे मिले, क्या बोले चल रहा था वो भी बगैर 'Advt' लिखे. बाकी देश में कितने और मुख्यमंत्री भी हैं, ये कम्पटीशन देने वाले बताएं.

    Sanjaya Kumar Singh भाजपाइयों को लक्ष्य करके कोई विज्ञापन देना हो तो पांचजन्य सबसे अच्छा रहेगा। अब अगर कांग्रेस या कोई कांग्रेसी उसमें विज्ञापन दे (उसके पैसे दे) तो पांचजन्य की विचारधारा बदल जाएगी , पैसे देने वाले की या कांग्रेसी की – वाकई बकवास आरोप है। अनिल सिंह ने भड़ास निकालने वाली शैली में लिख दिया है पर बात वही सही है।

    Rishiraj Rahi dhandha hai usse kaise samjhota hota

   Vinod Bhardwaj विज्ञापन पोर्टल को दिया जा रहा हो या किसी अखबार/चैनल को इसका ये मतलब तो कतई नहीं निकाला जा सकता कि उसका संचालक भी उससे इत्तेफाक रखता है या फिर उस पक्ष विशेष की विचारधारा से प्रेरित/प्रभावित है| वैसे भी जब Advt. शब्द का प्रयोग कर स्थिति स्पष्ट कर दी गयी हो तो ऐसे में यहाँ बहस का कोई मुद्दा बनता ही नहीं है| पोर्टल/अखबार/न्यूज चैनलों के सञ्चालन के लिए आवश्यकता होती है धन की और इसे पूरा करने का मुख्य स्त्रोत होते हैं विज्ञापन|

Kamaluddin Siddiqui katayee nahin !

Shailendra Kumar Nimbalkar This is business

Pradeep Upadhyay Bilkul Naheen
 
Ramesh Sarraf kyon?
 
Santosh Manav NO NEVER
 
Ram Dayal Rajpurohit हाँ कोंग्रेस तो मान ही लेगी
 
Prem Arora bjp ka kar rahe ho ya modi ji ka yeh depend karta hai agar modi ji ka hai to theek hi hai prantu agar BJP ka hai to modi hai hi
 
Jagdish Yadav kuchh to behude kahenge , unka kam hai kahna
 
Arun Singh nahi , kadapi nahi ..
 
Devang Rathore नहीं भाई जी!
 
Rajiv Srivastava विज्ञापनपोर्टल को चलाने के लिए बिजनेस का हिस्सा है इसे पोर्टल की विचारधारा से जोड़ना ठीक नही है।
 
Shravan Kumar Shukla Bakwas hai…. usme saf advt likha hai.. aur jo akhbaro men ad chhapte hain to klya unhe sarkari mukhpatra maan liya jaae? aisa jo sochte hain.. wah faltu ke log hain.. mujhe nahi lagta aise logon ki aapatti ko tool dena chahie…
 
Samir Gupteshwar Singh सवाल निष्पक्षता का है अगर पोर्टल निष्पक्षता के साथ सभी तरह के विषय उठा रहा है बिना भेदभाव के सभी तरह के समाचार दे रहा है तो कोई भी विज्ञापन दिखा सकता है जो राष्ट्र व समाज के खिलाफ न हो किंतु पोर्टल एक ही विचारधारा का पोषक हो और विज्ञापन दूसरी विचारधारा का दिखाए तो वह अवसरवादी ढोंगी व पाखंडी है ।
 
Kripa Krishna छपे विज्ञापन और छापने वाले की विचारधारा का आपसी स्‍वस्‍थ सम्‍बन्‍ध सिर्फ व्‍यावसायिक होता है…..
 
Sanjaya Kumar Singh समीर गुप्तेश्वर सिंह जी – विज्ञापन तो पैसे लेकर ही चलाए जाएंगे और पैसे देने वाला यूं ही नहीं देगा। उसे लाभ मिलेगा तभी वह खर्च करेगा। ऐसे में लेने वाले को कहां कुछ तय करना है। अनैतिक, अश्लील, आदि की बात अलग है।
 
Gopal Rai bilkul nahi,vigyapan aur vichardhara ka apas me koi mel nahi
 
Ankit Muttrija सर,वैसे तो तमाम वरिष्ठ पत्रकारों,विद्वानों ने अपने विचार रख दिए हैं।लेकिन,मैं अपनी बात लिखूं तो मेरे मतानुसार विज्ञापन एक अलग मसला हैं।आप विज्ञापन खींच-खींच कर ख़बरों को भी प्रभावित होने दें तो ये ग़लत होगा लेकिन विज्ञापन का असर आपकी ख़बरों पर न पड़े तब तो ये कहीं से भी अनुचित नहीं लगता।छत्तिसगढ़ के एक अख़बार ने मुख्यमंत्री रमन सिंह से दिवाली पर कुछ उपहार लेने से इनकार कर दिया था जिसके बाद विज्ञापन बंद तो बंद बल्कि राज्य सरकार की तरफ़ से कोई मंत्री अख़बार से बात करने को राज़ी नहीं हुआ।देखते ही देखते अख़बार बंद करने की नौबत आन पड़ी।यहां,विज्ञापन लेने के बाद भी निष्पक्षता बरकरार हैं तो इससें बेहतर क्या हो सकता हैं भला।
 
Imran Zaheer नहीं
 
Ashok Chaudhary ये किसी जमाने में हुआ करता था कि विज्ञापन लेते हुए खबरों में निष्‍पक्ष रहा जाय। अब यह नहीं होता। इसके काफी कटु अनुभव अखबार में नौकरी करते हुए हुआ है। आज के दौर में विज्ञापनदाता उम्‍मीद करता है कि खबरें भी उसके पक्ष में लिखी जाय। या फिर विरोध में तो कतई न लिखी जाय। इसलिए यदि अखबार का तेवर बनाए रखना है तो ऐसे विज्ञापनों से बचना ही ठीक होगा।
 
Madan Tiwary अखबार या पोर्टल के संपादक की विचारधारा उसके संपादकीय मे झलकती है। आप चाहे सहमत हो या न हो, आप दुसरे के विचारो को भी लिखते है क्योंकि मामला निष्पक्षता का है। अखबार कोई परचा नही है, हां कुछ दल विशेष अपना अखबार निकालते है लेकिन मैं उसे अखबार नही मानता । रही विग्यापन की बात तो जबतक विग्यापन हमारे यहां बने पीबी एक्ट और ड्रग एंड मैज्क रिमेडी एक्ट के तहत गलत नहि है, उसे छापने को गलत नही कहा जा साकता। किसी चमत्कारि ताबिज, दवा वगैरह का विग्यापन गलत है। दिक्कत यह है कि साम्यवादी और भाजपावादी दोनो असहिश्णु है। किसी भी चीज की अति पर चले३ जाते है और सोमनाथ जैसे व्यक्ति को पार्टी से निकाल देते है क्योकि वह संविधान और देश की जनता का विश्वास तोडने से इंकार कर देते है। जो व्यक्ति आपका भाजपा का विग्यापन छापने के कारण आलोचना कर रहे हो उन बंधू से कहे कि पहले अपने परिवार, रिश्तेदार मे से उन लोगो से संबंध तोड ले जो भाजपा समर्थक है।
 
Madan Tiwary Haseen Rahmani Pashyanti Shukla आप दोनो का लिखा पढकर के हंसी आई। भाइ आप किस विचारधारा के समर्थक है मुझे नही पता लेकिन भाजपा के विग्यापन पर रोक की मांग करने वाले या आपति करने वालो को मैं हिटलर की श्रेणी मे रखता हूं और फ़ासिस्ट मानसिकता का व्यक्ति मानता हूं। एक छोटा सा निवेदन है , जितना लिखे कम से कम उसका आधा समय पढने पर भी दे ( कामिक्स नही ) तो आप दोनो के लिये बेहतर होगा। आपदोनो का कमेंट देखकर मुझे स्टेला जेम्स के ब्लाग का वह कथन याद आ गया जो उसने गांधी जी को कोट करते हुये लिखा है, " मै जोरदार तर्क दे सकता हूं लेकिन मेरे पास सभी तर्को से जोरदार कुछ है, अनुभव। " आप दोनो की उम्र कम है सिखे । मैं किसी की विचारधारा से सहमत नही हूं तो क्या मित्रता तोड लूंगा ? मैं वकील हूं तो क्या उसका केस लडना छोड दूंगा ?
 
Harish Bhardwaj Mere khyal se kisi vigyapan ka sampadak ki vichardhara se koi lene dena nahi hota, Vigyapan alag cheej hai-samachar alag. han ye jarur hona chahia ki vigyapan samacharnuma na ho!
 
Kamal Sharma नहीं।
 
Rajesh Ranjan Bilkul nahi
 
Smita Mishra mere khyal se LTTE ka vigyapan mile to wo bhi le lena chahiye…
 
Chandra Shekhar Shaastri ऐसी सोच वाले लोग संकीर्ण विचारधारा से ग्रस्त हैं, जो किसी पार्टी के विज्ञापन पर समाचार स्रोत को ही उसका अंग मान लें। यदि यह किसी अन्य पार्टी का होता तो शायद ऐसा कम होता क्योंकि छद्मनिरपेक्षता का कीड़ा काटता बहुत तेज है….
 
Sunil Verma jiske yahan congress ka vigyapan hoga to us par congressi ka thappa lagega
 
Arun Pratap no,idealogoly differnt this is marketing
 
Nitin Mukesh Sinha koi galat nahi..add le rahe rishwat to nai..nai lege to salary kaha se di jayegi..
 
Mukesh Kejariwal मैं न वरिष्ठ पत्रकार हूं और न उस तरह से आपका मित्र होने का दवा कर सकता हूं। मगर चुप रहने की बजाय कहना चाहूंगा- कतई नहीं…
 
Mohammad Anas No…
 
Asar Ahmed No., not necessarily……only client
 
Deepak Sharma Not at all because thats what advt is meant for
 
Pradumn Kaushik nhi…….
 
Ravi Prakash मुझे तो नहीं लगता। विज्ञापन, कंटेंट और व्यक्तिगत विचारधारा तीनों का अलग-अलग अस्तित्व हैं।
 
Pashyanti Shukla इस बहस को मैने उठाया…सही या गलत नहीं कह सकती लेकिन..
ये मुद्दा कुछ होता ही नहीं अगर यशवंत जी केवल एक वो पत्रकार होते जो हर मुद्दे पर अपनी बुलंद आवाज़ उठाते रहे हैं…

और मुद्दा अभी भी नहीं है सिर्फ एक विचार है…. जो इसलिए बना क्योंकि य़शवंत जी का लेखन अब कई बार स्वतंत्र नहीं लगता बल्कि आम आदमी पार्टी के प्रति उनका झुकाव उनके लेखन में साफ नज़र आता है जो कि एक पत्रकार के PROFESSION को कतई सूट नहीं करता…
और मुद्दा तब बनता है जब इस लेखन के लिए वो केवल अपनी पर्सनल फेसबुक वॉल का ही नहीं बल्कि भड़ास के प्लेटफार्म का भी इस्तेमाल करते हैं…

मेरा झुकाव भाजपा की ओर है लेकिन ये किसी को तब पता नहीं लगा जब मै सीधेमीडिया से जुडी थी.
 
Shubhabrata Sengupta इस लिहाज से … हर चैनेल जो आशाराम की बुराई करता हो वो मिशनरी का चैनेल होना चाहिए….
 
Jitendra Choubey Hargiz nahi..
 
Sanjaya Kumar Singh यशवंत आप का समर्थन करते हैं यह घोषित है, उसके सदस्य भी बन चुके हैं। समस्या तब होती जब वे आप के खिलाफ न लिखें, न छापें या आप के खिलाफ लिखने – बोलने वाले मेरे जैसे लोगों का ब्रेन वाश करने की कोशिश करें। एक पत्रकार की अपनी राय तो होगी ही, निष्पक्ष होना चाहिए पर होना कितना मुश्किल है यह भी समझना चाहिए. समस्या तब होती है जब लोग बताते नहीं है। या अपनी लाइन को ही ठीक बतातेत हैं। तमाम बड़े संपादकों की लाइन औऱ झुकाव स्पष्ट है। कई पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ चुके हैं। यहां भी यशवंत आप का सदस्य होने के बावजूद भाजपा का विज्ञापन चला रहे थे।

Haresh Shingala सब कोइ व्यकती या मीडीया के लोग मौका मीलने पर "नीराराडीया" का रोल अदा कर ही देते हे..
 
Shitanshu Pati Tripathi no……….
 
Pankaj Mishra congras ke mutabik yes

Masaud Akhtar यह तो वही बात हो गयी कि आप नशेड़ी हैं क्योंकि आपकी दवा की दूकान है और ड्रग बेचते हैं…
और जहां तक बात निष्पक्षता की है तो इसका कहीं अस्तित्व ही नहीं है. आपकी अपनी कोई राय होगी ही … निष्पक्षता सिर्फ इसी अर्थ में हो सकती है कि आप कितने पारदर्शी अपने विचारों व खबरों के साथ हैं. और जिसे सच समझते हैं उसे सच कहने का हौसला रखते हैं और इसपर अभीतक तो मैंने आपको खरा ही पाया है … आगरा आपके वेब पोर्टल की जो भी विज्ञापन नीति है उसके खिलाफ जाकर यदि कोई विज्ञापन दिखाते या न दिखाने का फैसला लेते हैं तब वो गलत होगा …. अगर आपके विज्ञापन नीति में किसी राजनीतिक पार्टी के विज्ञापन पर प्रतिबन्ध नहीं है तो आप किसी भी पार्टी व व्यक्ति का विज्ञापन दिखाने के लिए स्वतंत्र हैं और इसपर सवाल उठाना अधकचरापन या दूषित मानसिकता ही हो सकता है.

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.


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