शंभूनाथ शुक्ल : इसी दिल्ली में भी एक आदमी है Yashwant Singh जो वह लड़ाई लड़ रहा है जिसे बड़े-बड़े धुरंधर और तीसमार खाँ पत्रकार भी नहीं लड़ पाते। बड़े-बड़े घोटालों का पर्दाफाश करने वाले, अत्याचारों की पोल खोलने वाले पत्रकार अपनी पगार तक नहीं मांग पाते। यह आदमी उन लोगों की भी लड़ाई लड़ रहा है बिना किसी से कुछ मांगे। अपनी धुन का पक्का। लेकिन पत्रकार तो किसी के भी साथी नहीं होते। आज किसी ने एक पोस्ट फेसबुक पर लिख डाली कि कामरेड की बात करने से क्या होता है अपने पोर्टल पर छापते तो आप भी भाजपा के विज्ञापन हो।
जरा कोई बताएगा कि अगर आप कोई अखबार निकाल रहे हो, भले वह आनलाइन हो या प्रिंट या विजुअल, आप किसी विज्ञापन को किस आधार पर रोक सकते हो? क्या भाजपा गैरकानूनी पार्टी है? क्या चुनाव आयोग ने भाजपा को प्रतिबंधित कर दिया है तो भाई उसका विज्ञापन कैसे रोका जा सकता है। मैं अपने कार्यकाल में विज्ञापन को लेकर बहुत सतर्क रहा और विज्ञापन के प्रबंधक या महाप्रबंधक सब मुझे कोई भी राजनीतिक विज्ञापन दिखाकर ही छापते रहे हैं, मैंने कभी भी किसी पार्टी का विज्ञापन अथवा खबर नहीं रोकी। हमारी राजनैतिक विचारधारा अलग हो सकती है पर भैया अखबार हमारे घर की खेती नहीं है। अखबार के लिए हम पब्लिक के प्रति जिम्मेदार होते हैं। हम कोई खबर या विज्ञापन रोककर पब्लिक के अधिकार का हनन करते हैं और यह अलोकतांत्रिक है।
Yashwant Singh अरे सर इन दिनों चौतरफा घिरा हुआ हूं.. दिल्ली और मुंबई से साइबर क्राइम की दी जांचों को झेल रहा हूं.. वो तो भला हो Madan Tiwary का जो जवाब देने में कानूनी भाषा व भाषण तैयार कर दे रहे हैं.. बिलकुल फ्री में… और, हां आज तो लखनऊ की एक महिला पत्रकार के पति ने वो गालियां सुनाईं की क्या कहूं… जबकि उनकी पत्नी का वर्जन प्रकाशित कर दिया था.. पर जब लिया लुकाठा हाथ तो कभी कभी लाठी अपने पर भी पड़ती ही रहती है… और, यही आनंद है… ये सब न हो तो भड़ास चलाना बेहद नीरस काम होगा
शंभूनाथ शुक्ल इसके बिना भी क्या जीना। जब एक मकसद है तो फिर क्या दबना। इस रास्ते में साथी भी मिलेंगे और दुश्मन भी।
Roy Tapan Bharati यशवंत सिंह जी के साहस को सलाम, दिल से या मित्र मंडली में कई बार किया मगर सामने मिलने पर कुछ न कह सका। संकोची स्वभाव के कारण। मीडिया कंपनियां थियेटर जैसी हैं जहां रोज नौटंकी हो रही है…दूसरो की नौटंकी पर तो नजर है मगर अपनी नौटंकी छुपाने के लिए रोज तिकड़में भिड़ाई जाती हैं…मगरमच्छ जैसे मीडिया मालिकों से लोहा लेते हुए भड़ास वेबसाइट के जरिए श्रमजीवी पत्रकारों का साथ देना आसान नहीं है। एक बार यशवंत जी की वेबसाइट के लिए दिल खोलकर लिखूंगा..शायद कुछ की धड़कनें बढ़ जाएं…इंतजार कीजिए…
Sanjaya Kumar Singh आपने सही कहा। मामला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का भी है। हम अखबार निकालते हैं या पोर्टल चलाते हैं किसी के भी खिलाफ धुंआधार लिख रहे हैं, तथ्य हैं तो वह मुकदमा नहीं कर सकता, उसकी बात हम नहीं छाप रहे – वह क्या करेगा। विज्ञापन देगा अब आप कहो विज्ञापन भी नहीं छापूंगा – यह तो अनैतिक हो गया। तमाम ऐसे उदाहरण मिलेंगे जब किसी अखबार में छपी खबर के खिलाफ उसी अखबार में या दूसरे में भी विज्ञापन छपवाकर दूसरा पक्ष अपनी बात कहता है। आप चाहते हो कि मुझे तो लिखने बोलने की पूरी आजादी मिले। दूसरे के पास अखबार नहीं है तो तो सिर्फ सुने। यह कैसे संभव है कि आपकी आजादी के लिए दूसरे के मुंह पर पट्टी बांध दी जाए। अगर यशवंत भाजपा के खिलाफ लिखते हैं और भाजपा का पक्ष नहीं छापते (जो उनका संपादकीय अधिकार है) तो भाजपा अदालत जा सकती है वह उसका कानूनी अधिकार है पर विज्ञापन छपवाकर अगर वह अपनी बात कहना चाहती है तो यशंवत या कोई भी उसे कैसे रोक सकता है (लेवल प्लेइंग फील्ड भी कोई जरूरत होती है) और वैसे भी विज्ञापन छापने के लिए तो कई दूसरे लार टपकाते रहते हैं तो यशंवत उनकी सेवा में अपना विज्ञापन भी छोड़ दें। हद है अपेक्षा करने की भी, तर्क और दलील के उपयोग करने की भी।
Sandeep Verma विज्ञापन रोक कर पब्लिक के अधिकार का हनन कैसे हो गया ..कुछ समझा नही . विज्ञापन की औकात तो अनपढ़ पाठक तक समझता है . विज्ञापन मजबूरी हो सकता है ,मगर जनता या विज्ञापन दाता ला अधिकार तो नही .
Sandeep Verma विज्ञापन पर आपत्ति जताना समझदारी की बात बिलकुल नही है . इमानदारी की लिखी एक लाईन भी फुल-पेज विज्ञापन के असर को जीरो बना सकती है ..बशर्ते लाईन लिखी भी जाए .
Shravan Kumar Shukla Bakwas hai…. usme saf advt likha hai.. aur jo akhbaro men ad chhapte hain to klya unhe sarkari mukhpatra maan liya jaae? aisa jo sochte hain.. wah faltu ke log hain.. mujhe nahi lagta aise logon ki aapatti ko tool dena chahie…
Rajiv Ranjan katai nahi
Ravindra Ranjan बिल्कुल नहीं
Vikas Kumar As a reader i will say….u have very less advertisement…u should have more..nothing wrong in it….
Madan Tiwary अखबार या पोर्टल के संपादक की विचारधारा उसके संपादकीय मे झलकती है। आप चाहे सहमत हो या न हो, आप दुसरे के विचारो को भी लिखते है क्योंकि मामला निष्पक्षता का है। अखबार कोई परचा नही है, हां कुछ दल विशेष अपना अखबार निकालते है लेकिन मैं उसे अखबार नही मानता । रही विग्यापन की बात तो जबतक विग्यापन हमारे यहां बने पीबी एक्ट और ड्रग एंड मैज्क रिमेडी एक्ट के तहत गलत नहि है, उसे छापने को गलत नही कहा जा साकता। किसी चमत्कारि ताबिज, दवा वगैरह का विग्यापन गलत है। दिक्कत यह है कि साम्यवादी और भाजपावादी दोनो असहिश्णु है। किसी भी चीज की अति पर चले३ जाते है और सोमनाथ जैसे व्यक्ति को पार्टी से निकाल देते है क्योकि वह संविधान और देश की जनता का विश्वास तोडने से इंकार कर देते है। जो व्यक्ति आपका भाजपा का विग्यापन छापने के कारण आलोचना कर रहे हो उन बंधू से कहे कि पहले अपने परिवार, रिश्तेदार मे से उन लोगो से संबंध तोड ले जो भाजपा समर्थक है।
Amit Ahluwalia सर विज्ञापन के विषय में एक निवेदन तो है – समाचारपत्र खासतौर पर प्रिन्ट मीडिया उस पर भी हिन्दी के अखबारो में तमाम तांत्रिक मौलाना अधोरी आदि के ढेरो विज्ञापन छपते है और कर्इ मर्तबा उसी अखबार में सामने के पूष्ठ पर खबर होती है कि फलाने फर्जी ढोंगी तांत्रिक ने जाल में फसा कर बलात्कार किया , बच्चे की बलि देने का कुकृत्य कराया और भी कर्इ प्रकार की ठगी आदि के समाचार होते है।
यह विरोधाभास क्यो ? यह कैसी मजबूरी है ?
Pashyanti Shukla इस बहस को मैने उठाया…सही या गलत नहीं कह सकती लेकिन.. ये मुद्दा कुछ होता ही नहीं अगर यशवंत जी केवल एक वो पत्रकार होते जो हर मुद्दे पर अपनी बुलंद आवाज़ उठाते रहे हैं…
और मुद्दा अभी भी नहीं है सिर्फ एक विचार है…. जो इसलिए बना क्योंकि य़शवंत जी का लेखन अब कई बार स्वतंत्र नहीं लगता बल्कि आम आदमी पार्टी के प्रति उनका झुकाव उनके लेखन में साफ नज़र आता है जो कि एक पत्रकार के PROFESSION को कतई सूट नहीं करता…
और मुद्दा तब बनता है जब इस लेखन के लिए वो केवल अपनी पर्सनल फेसबुक वॉल का ही नहीं बल्कि भड़ास के प्लेटफार्म का भी इस्तेमाल करते हैं…
मेरा झुकाव भाजपा की ओर है लेकिन ये किसी को तब पता नहीं लगा जब मै सीधे मीडिया से जुडी थी..
Babu Ram हमने प्रजातान्त्रिक व्यवस्था अंगीकार की है इसमें सबको अपने विचार प्रकट करने की संवैधानिक व्यवस्था उपलब्ध है .भाजपा अपना द्रस्तिकोंन रखती है इसमें विचारो की स्वंत्रता व्यक्त होती है .यह विवाद का बिषय नही है .
वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ला के फेसबुक वॉल से.
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