Sanjay Kumar Singh : पश्यंति शुक्ल ने जो सवाल उठाए हैं वो निराधार और यूं ही खारिज कर दिए जाने योग्य नहीं हैं और विरोध की अथवा प्रतिकूल आवाज को न दबाया जाना चाहिए और न नजरअंदाज किया जाना चाहिए। आपने राय मांगी है तो वह इस प्रकार है –
1. यशवंत अपनी साइट पर बीजेपी का प्रचार नहीं कर रहे हैं बल्कि बीजेपी को प्रचार करने दे रहे हैं. जिसके लिए उन्हें पैसे मिल रहे हैं और ये पैसे साइट को चलाते रहने के लिए फिलहाल जरूरी हैं। अगर यशवंत इसके पैसे नहीं लेते तो यशवंत प्रचार कर रहे होते। अगर यशवंत बीजेपी के प्रचार का पैसा दें (कहीं और छपवाने के लिए या अपने यहां मुफ्त में छापें), किसी सुविधा के लिए या पूर्व के किसी लाभ अथवा भविष्य के लाभ के लिए तो वह पेड होगा। स्थिति ऐसी नहीं है।
2. ये तो देखने का नजरिया है, बीजेपी भड़ास को ऐड दे रही है क्योंकि भड़ास के पाठकों के पास पहुंचने का उसके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं है। भड़ास ले रहा क्योंकि उसे अपना काम करते रहने के लिए इन पैसों की जरूरत है।
3. चुनाव का समय पैसे कमाकर (सही ढंग से) पांच साल भड़ास निकालते रहने के लिए निश्चित हो जाने का भी समय है। इसमें कोई बुराई नहीं है। अगर सभी दलों के खिलाफ आग उगलने से सभी दल विज्ञापन देने लगें तो सबों से लेने में भी बुराई नहीं है। ये देने वाले का सिरदर्द है कि उसे लाभ मिलेगा कि नहीं।
4. एक पार्टी का ऐड न मिल पाने की कीमत ज़रा बीट रिपोर्टर से पूछो… इसकी कोई कीमत नहीं हो सकती। मंजूर हो तो नौकरी करे नहीं तो छोड़ दे। कायदे से ऐड लेने का काम रिपोर्टर का है ही नहीं।
5. अगर यशवंत की नीयत में खोट हो तो वह कुछ ही दिन में मालूम हो जाता, मैं इंतजार करके सुनिश्चित हो लेना पसंद करता। यह तो साफ ही था कि टोकने का मतलब होगा विज्ञापन हट जाएगा।
जनसत्ता अखबार में लंबे समय से कार्यरत रहे और इन दिनों अनुवाद का काम संगठित तौर पर कर रहे संजय कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.
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