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‘भड़ास पर सही नहीं छपा है काका-सीकेटी विवाद प्रकरण’

: कानाफूसी : दैनिक जागरण के स्‍टेट हेड रामेश्‍वर पांडेय उर्फ काका और सीजीएम चंद्रकांत त्रिपाठी उर्फ सीकेटी के बीच हुए कथित विवाद का ब्‍योरा जो भड़ास पर छपा है, वह पूरी तरह सही नहीं है. जीवन में कभी काका ने अपमान नहीं सहा तो यहां भला क्यों सहेंगे. काका ने 18 नौकरियां बदली छोड़ी पकड़ी हैं. सिर्फ इसीलिए कि वे अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करते. ऐसे में भला कोई सीकेटी उनका कैसे अपमान कर सकता है और अपमान कोई कर दे तो उस पर काका कहां चुप रहने वाले.

: कानाफूसी : दैनिक जागरण के स्‍टेट हेड रामेश्‍वर पांडेय उर्फ काका और सीजीएम चंद्रकांत त्रिपाठी उर्फ सीकेटी के बीच हुए कथित विवाद का ब्‍योरा जो भड़ास पर छपा है, वह पूरी तरह सही नहीं है. जीवन में कभी काका ने अपमान नहीं सहा तो यहां भला क्यों सहेंगे. काका ने 18 नौकरियां बदली छोड़ी पकड़ी हैं. सिर्फ इसीलिए कि वे अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करते. ऐसे में भला कोई सीकेटी उनका कैसे अपमान कर सकता है और अपमान कोई कर दे तो उस पर काका कहां चुप रहने वाले.

दैनिक जागरण, गोरखपुर की मीटिंग में सिर्फ बहसा-बहसी हुई जो कि आमतौर पर मीटिंग्स में हुआ करती है और अखबार के दफ्तरों की मीटिंग में ऐसा होना स्वाभाविक भी है. दरअसल सीकेटी का राजपाट सिमट गया है तो उनका बौखलाना स्वाभाविक है. उनसे संपादकीय को छीन लिया गया है. संपादकीय में सीकेटी की घुसपैठ रामेश्वर पांडेय किसी कीमत पर नहीं चाहते. जबकि सीकेटी पूरी कोशिश में हैं कि उनका जलवा पहले की तरह कायम रहे और हर जगह उनका शासन चले. यही तकरार का मुद्दा है.

हां, हुई थी वहां तकरार. काका और सीकेटी के बीच. लेकिन यह केवल दोनों की स्‍वाभाविक तेज आवाज तक ही सीमित थी, मगर आपने जो खबर छापी है उससे लग रहा है मानो वहां कोई महाभारत हुआ था. हो सके तो अब जो कहने जा रहा हूं उसका मर्म समझने की कोशिश कीजिएगा यशवंत जी. सीकेटी का लंबे समय तक शासन बरेली यूनिट में रहा. उनको वहां से बेदखल कर दिया गया. अब वे गोरखपुर में हैं पर उनकी इच्छा के मुताबिक उन्हें संपादकीय देखने को नहीं दिया जा रहा है. बरेली छिनने से गुस्साए सीकेटी का गुस्सा गोरखपुर पहुंच कर भी बना रहा.

आखिर क्‍या जरूरत थी सीकेटी को एडीटोरियल मीटिंग में जाने की, जबकि उन्‍हे न्‍यूज से पहले ही हटाया जा चुका है. दरअसल सीकेटी वहां पहुंचे ही इसीलिए ताकि अपने होने का अहसास करा सकें. इसके लिए उन्‍होंने सीधे सम्‍पादकीय मैटर पर हस्‍तक्षेप शुरू कर दिया. काका ने जब उन्‍हें यह अहसास कराने के लिए कि एटीटोरियल पॉलिसी में उनका हस्‍तक्षेप उचित नहीं है, सीकेटी भड़क गये. उन्‍होंने अपनी भड़ास काका पर निकाली. यह हरकत जानबूझकर की गयी थी.

किसी के बड़बड़ाने से यह आशय नहीं निकाला जाना चाहिए कि उसने दूसरे की बेइज्जती कर दी. सड़क पर तमाम लोग बड़बड़ाते मिल जाते हैं, लेकिन इसका मतलब यह तो नहीं कि इस बड़बड़ाने से बगल से गुजरने वाला आदमी का अपमान हो गया. उम्मीद करता हूं कि यह पत्र भी प्रकाशित करेंगे ताकि पूरे प्रकरण का दूसरा पक्ष सामने आ सके.

गोरखपुर से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.


मूल खबर पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें- सीकेटी ने काका को बेइज्जत किया!

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