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भारतीय मुसलमानों को किसी के सामने राष्ट्र प्रेम परिभाषित करने की ज़रूरत नहीं

Ayesha Zaidi : भारतीय मुसलमानों को किसी के सामने अपने राष्ट्र प्रेम को दिखाने या परिभाषित करने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि सन 1857 से लेकर अब तक जब भी इस देश को ज़रूरत पड़ी है मुसलमानों ने इसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया है. चाहे वो 1857 की क्रांति हो (जिसमें मौलाना फ़ज़ले हक खैरा बादी, मोलवी लियाक़त अली, अह्मदुल्लाह शाह और हाजी इमदादुल्लाह आदि ने अँग्रेज़ों के दाँत खट्टे कर दिए थे. और ये भी बताने की ज़रूरत नहीं है कि ये जंग बहादुर शाह ज़फर की अगुआई में लड़ा गया था.) या उसके बाद देश की आज़ादी की लड़ाई (जिसमें मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, अब्बास तैयाबजी, रफ़ी अहमद किदवई, मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना हिफज़ुररहमान आदि) और देश की आज़ादी के बाद की लड़ाइयाँ जो चीन और पाकिस्तान से लड़ी गयीं (उस में वीर अब्दुल हमीद, ब्रिगडियर उस्मान, ग्रेनिडियर अमिरूद्दीन, रिज़वान अली त्यागी, अब्दुल ख़ालिक़ आदि ने अपने प्राणों की आहुति दे दी).

Ayesha Zaidi : भारतीय मुसलमानों को किसी के सामने अपने राष्ट्र प्रेम को दिखाने या परिभाषित करने की ज़रूरत नहीं है क्योंकि सन 1857 से लेकर अब तक जब भी इस देश को ज़रूरत पड़ी है मुसलमानों ने इसमें बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया है. चाहे वो 1857 की क्रांति हो (जिसमें मौलाना फ़ज़ले हक खैरा बादी, मोलवी लियाक़त अली, अह्मदुल्लाह शाह और हाजी इमदादुल्लाह आदि ने अँग्रेज़ों के दाँत खट्टे कर दिए थे. और ये भी बताने की ज़रूरत नहीं है कि ये जंग बहादुर शाह ज़फर की अगुआई में लड़ा गया था.) या उसके बाद देश की आज़ादी की लड़ाई (जिसमें मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, अब्बास तैयाबजी, रफ़ी अहमद किदवई, मौलाना हुसैन अहमद मदनी, मौलाना हिफज़ुररहमान आदि) और देश की आज़ादी के बाद की लड़ाइयाँ जो चीन और पाकिस्तान से लड़ी गयीं (उस में वीर अब्दुल हमीद, ब्रिगडियर उस्मान, ग्रेनिडियर अमिरूद्दीन, रिज़वान अली त्यागी, अब्दुल ख़ालिक़ आदि ने अपने प्राणों की आहुति दे दी).

ये सिर्फ़ कुछ नाम हैं जो में गिना रहा हूँ नहीं तो 1857 में सिर्फ़ एक शहर मेरठ में 10,000 मुसलमानों को फाँसी दी गयी. इतना सब के बाद भी मुसलमानों को भारत में आतंकवादी कहना कहाँ तक उचित है. दूसरी बात ये कि ज़्यादातर मुसलमान जो आतंकवादी कह कर पुलिस द्वारा पकड़े जाते हैं जेल में 8-10 साल गुजरने के बाद सबूतों के अभाव में छोड़ दिए जाते हैं लेकिन छूटने के बाद समाज में अपने आप को पुनः स्थापित करना इनके लिए कितना दुष्कर होता होगा किसी ने सोचा है. ऐसी एक दो नही सैकड़ों मिसालें हैं जिनमें पुलिस के पास कोई सबूत नहीं था लेकिन दर्जनों मुसलमान नौजवानों को सालों जेल में बिताना पड़ा. जहाँ कहीं एक बम क्या पटाखा फूटा वहाँ आस पास रहने वाले सैकड़ों मुसलमान जेल में ठूंस दिए जाते हैं फिर तारीखों पर तारीख और आख़िर में सालों बाद छुटकारा लेकिन उन सालों का क्या जो उन्हों ने जेल में बिताए. उसकी ज़िम्मेदारी किसकी है. सिर्फ़ यही नहीं देश की तरक्की में भी मुसलमानों ने बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया है चाहे वो ए पी जे अबुलकलाम हों या अज़ीम प्रेमजी.इसके बाद भी मुसलमानों को आतंकवादी कहना कहाँ तक उचित है? रही बात कुछ मुसलमानों के खिलाफ ये साबित होना कि वो देश विरुद्ध कार्यों में लिप्त थे तो ये सिर्फ़ मुसलमानों के साथ ही नहीं है अन्य धर्मों के लोग भी ऐसी गतिविधियों में लिप्त पाए गये हैं और उनके खिलाफ भी पक्के सबूत हैं तो फिर क्या उस धर्म को आतंकवादी घोषित कर देना चाहिए या उस धर्म के सभी मानने वालों को. ये फ़ैसला आपको करना है.

आयेशा जैदी के फेसबुक वॉल से.

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