भारतीय ज्यू यानी यहूदी खुश हैं। सताईस सौ साल बाद स्वदेश लौट रहे हैं। इजराइल में इनके स्वागत की तैयारी जोरों पर है। साल के अंत तक दो सौ भारतीय यहूदियों का जत्था इजराइल विस्थापित होगा। इजराइल पहुंच रहे भारतीय यहूदी “बनाई मिनाशी” जनजाति के हैं। मिजोरम और मणिपुर में मिली “बनाई मिनाशी” जनजाति के लोग यहूदियों की उन दस जनजातियों में शामिल है जो लुप्त मान ली गई थीं। इनके महत्व को समझते हुए तल अवीव ने इनके लौटने की मंजूरी दे दी है।
इन भारतीय यहूदियों का इजरायल जाना वैसा ही सुखन है जैसे अन्य भारतीयों को शक, हून, मंगोल, रोम, यूनान, मलय अथवा सिंधु घाटी से आदिपुरूष आएं। सगे होने का अहसास कराएं और साथ ले जाएं। अफसोस कि यहूदियों की तरह आर्य-अनार्य के विवाद में उलझे ज्यादातर भारतीयों को मौलिक जड़ का ठोस पता नहीं है।
सिर्फ चंद सौ साल पुराने इतिहास के संदर्भ में बात करें तो यह वैसा ही सुखन है जैसे त्रिनिदाद, मारिशस,फिजी,बाली आदि मुल्कों से भारतीय मूल के लोगों को भारत लाकर बसाने की स्वागत तैयारी शुरू हो जाए। झारखंड के मैकलुस्कीगंज या अन्य हिस्सों में मौजूद एंग्लो इंडियंस को ग्रेट ब्रिटेन में बसाने का काम हो जाए। शाहरूख या सलमान खान जैसे कई पठान को उनके मुल्क काबुल- कंधार लौट पुरखों की मिट्टी की खुशबू में जीने का हक मिल जाए। सम्पन्न सउदी अरब दुनिया के तमाम बहाबियों को अरब जगत में ले जा बसने और अरबी नागरिक होने का हक दे दें।
विभाजन की त्रासदी झेलने वालों की मौजूदा पीढ़ी को वापस रावलपिंडी, करांची या लाहौर में जाकर बसने का मौका मिल जाए। पाकिस्तान में परेशान चल रहे जनरल परवेज मुशर्रफ को उनकी दिल्ली की कोठी में जगह मिल जाए। पाकिस्तान के राष्ट्रपति मनमून हुसैन आगरा चले आएं। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह को पाकिस्तान के पंजाब में गाह गांव की जमीन पर बसाने का इंतजाम हो जाए। लालकृष्ण आडवाणी को करांची और सोनिया गांधी के लिए इटली का पैतृक आवास लौटाने का इंतजाम हो। पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली के वंशज मुजफ्फरनगर लौट आएं।
किसी के लिए जड़ की ओर सहजता से लौटने की सोचना दिवास्वप्न है। यहूदी कौम लाजवाब हैं। वो न सिर्फ ऐसा सोचते हैं बल्कि व्यवहार में कर दिखाने का माद्दा भी रखते हैं। उनमें अतीत की गलतियों को सुधारने की होड़ है। 1948 में इजराइल बनने के बाद से बिछड़ों को समेटने की अजीबोगरीब सरकारी नीति बनी है। इस क्रम में दुनिया भर में फैले यहूदियों की पहचान का काम पूरा कर लिया गया है। अब 2005 से उनको लौटाने का काम जारी है। यह खासियत यहूदी को दुनिया में अलहदा कौम में शुमार करती है।
जीने की कठोर जिजीविषा की वजह से यहूदियों को चालाक,चपल और काबिल माना जाता रहा है। ये निरंतर दक्षता को निखारने में लगे रहते हैं। बेमिसाल जिद्दी होते हैं। जिद ने यहूदियों को पराक्रमी बना दिया। इंसान को कमांडो बनाने और आतंकवाद से लडने भिड़ने में बेजोड़ होते हैं। नित नए तरीकों का इजाद करना इनकी शगल है। साथ ही गजब का जिम्मेदारी बोध है। कहते हैं यहूदियों में जिम्मेदारी संस्कार के जरिए भरा जाता है।
इनके परिवार में बच्चा जब थईया – थईया कर चलना शुरू करता है, तो बाल संस्कार का एक समाजिक उत्सव होता है। बड़े हॉल में बच्चे को अकेला छोड़ा जाता है। दरवाजे पर छिपकर परिजन आवाज लगाते हैं। लुढकते-गिरते बच्चे को चलकर दरवाजे तक खुद पहुंचना पड़ता है। इससे बच्चे में हर होनी-अनहोनी के लिए वह खुद को जिम्मेदार ठहराने का बोध भरा जाता है।
हमारी तरह गिरे-पड़े बच्चे को उठाकर धरती पर ठोकर मारने और धरती माता पर इल्जाम मढने का रिवाज उनके यहां नहीं है। इसलिए हार के कारक की तलाश में अथवा जिम्मेदारी किसी और पर थोपने में समय बिताने के बजाय खुद को गुनहगार ठहराना यहूदियों को अच्छी तरह से आता है। इस गुनाह को दूर करने के उपक्रम में ताउम्र लगे रहते हैं। वो अस्मिता के लिए जान तक कुर्बान करने को तत्पर रहते हैं। नतीजा है कि यहूदियों की खुफिया एजेंसी मोसाद का खौफ है। यहूदियों का लोहा "अलकायदा" और "हमास" जैसे दुर्दांत आतंकी संगठन मानते हैं। "ही मैन" अथवा "स्पाइडर मैन" बन जाने की अवधारणा यहूदियों के बीच मान्य है। यहूदी "करत करत अभ्यात ते जडमति होत सुजान" में अकल्पनीय ढंग से यकीन करते हैं।
मुस्लिम और इसाई की तरह ही जेरूसेलम यहूदियों के लिए पाकीज शहर है। जेरूसेलम में ईशा मसीह का जन्म हुआ था। अब यह स्थल इजराइल के कब्जे में है। इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी यहूदियों पर है। यहूदियों के “बनाई मिनाशी” जनजाति के भारतीयों को जेरुसेलम के पास बसाने की तैयारी हो रही है। पहुंचाए जा रहे भारतीय यहूदी विलुप्तप्राय "बनाई मिनाशी" जनजाति के हैं। इनकी पूर्वोत्तर भारत के मिजोरम और मणिपुर में मौजूदगी का पता लगा। अबतक इनमें से सैकड़ों की आबादी इजरायल पहुंच चुकी है। अब महज 899 लोग बचे है।
इनको बारी बारी से इजराइल पहुंचाने का खाका तैयार है। यहूदी मान्यता के मुताबिक "बनाई मिनाशी" उन दस गुम यहूदी कबिलाओं में से हैं, जिनको सत्ताइस हजार साल पहले असीरियाई राज में विस्थापन के लिए मजबूर किया गया। "बनाई मिनाशी" का शाब्दिक अर्थ मिनाशी का पुत्र है। अब इन भारतीय यहूदियों को उनके पाकीज शहर ले जाने की तैयारी है।
"शावई इजराइल" नाम स्वंयसेवी संस्था गुम यहूदियों की पहचान करने और क्रमवार तरीके से उनको इजराइल पहुंचाने के काम में लगी है। "शावई इजराइल" की मदद से सैकड़ों "बनाई मिनाशी" यहूदी पहले से इजराइल में रह रहे हैं। संस्था के प्रमुख माइकल फ्रेउंड के मुताबिक भारत में मौजूद दो सौ बनाई मिनाशी यहूदियों को इस साल के अंत तक 400 को 2014 तक और शेष सभी को 2015 तक इजराइल ले जाने का अभियान पूरा करना है।
दुनिया भर में बिखरे यहूदियों को इजराइल पहुंचाने का काम 2005 से मुख्य सेफार्डिक रब्बी के फैसले के अनुसार चल रहा है। इस असहज काम को कर लेना यहूदियों के सक्षमता की मिसाल है। इसे लेकर अन्य सक्षम कौम में इजराइयलियों से इर्ष्या स्वाभाविक है। इतिहास में तानाशाह हिटलर यहूदियों का सबसे बड़ा दुश्मन था। उसने यहुदियों के सफाए की योजना बनाई और हिटलर के कार्यकाल में श्रृष्टि का सबसे बड़ा नरसंहार किया गया। बच गए यहूदी "जाको राखे साईंयां" की अद्भूत मिसाल हैं। हिटलर की खुदकशी के बाद यहूदियों ने खोई जमीन हासिल कर ली। प्रतिष्ठा बहाल की औऱ विश्व राजनीति को अपने हक में मोड़ लिया।
दुनिया के मानचित्र पर चिंदी भर दिखने वाला ही सही पर अलग मुल्क इजराइल बनवा लिया। उसपर संयुक्त राष्ट्र की मंजूरी का ठप्पा लगवा लिया। बेमिसाल ताकत के इस्तेमाल से इसाई और इस्लाम के सबसे पवित्र शहर जेरूसेलम पर कब्जा कर लिया। दिल्ली से भी छोटे आकार में पसरा यह मुल्क सेटलाइट तकनीक में काफी आगे है। रक्षा सामग्री का सबसे बड़ा निर्यातक है। बुलेटप्रूफ, एंटी लैंटमैन वाहन, टैंक और लड़ाकू विमानों के बड़े उत्पादक और निर्यातक हैं।
मरहूम यासिर अराफात की पीएलओ और दुर्दान्त आतंकवादी संगठन हमास का वजूद ही येरूशेलम को यहूदियों से मुक्ति के लिए है। विपरीत परिस्थिति में बने इजराइल को बनाए रखने के लिए भीषण संघर्ष चलता रहता है। यहूदियों ने इस चुनौती को नियति मान लिया। इसके बड़े फायदे हैं। इसकी वजह से आम यहूदी इंसान के बाकी कौमों से ज्यादा श्रमशील होता है। खुद की रक्षा के चौकस होता है। इसके लिए कमांडो ट्रेनिंग लेना अनिवार्य है। इजराइल को लेकर रोचक तथ्य है कि विस्थापन के क्रम में यहूदी दुनिया के चाहे किसी मुल्क में पहुंच गए हों, पर उनको इजराइल की नागरिकता का अवसर हासिल है। जिन मुल्कों में दोहरी नागरिकता रखने का प्रावधान है, वहां के यहूदी एकसाथ इजराइल और रहने वाले दो देशों की नागरिकता रखते हैं। दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क अमेरिका की प्रशासन पर यहूदियों का व्यापक असर है। मजबूत आधार की वजह से संयुक्त राष्ट्र के कामकाज में यहूदियों के मौजूदगी की छाप महसूस की जा सकती है।
लेखक आलोक कुमार कई अखबारों और न्यूज चैनलों में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं. झारखंड के पहले मुख्यमंत्री के दिल्ली में मीडिया सलाहकार रहे. कुल तेरह-चौदह नौकरियां करने के बाद आलोक काफी समय से समाज सेवा, पर्यावरण सक्रियता, मुक्त पत्रकारिता की राह पर हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है. इनके लिखे अन्य लेखों / विश्लेषणों / रिपोर्टों को पढ़ने के लिए क्लिक करें: भड़ास पर आलोक कुमार






