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भारत में परेशान हैं खेल पत्रकार

आईपीएल को छोड़ दिया जाए, तो भारत में खेलों का हाल छिपा नहीं. ओलंपिक समिति ने भारत को बाहर कर दिया है, मुक्केबाजी में भी धब्बा जैसा दिख रहा है. खिलाड़ी परेशान हैं और खेलों के बुरे हाल की वजह से खेल पत्रकार भी परेशान हैं.

आईपीएल को छोड़ दिया जाए, तो भारत में खेलों का हाल छिपा नहीं. ओलंपिक समिति ने भारत को बाहर कर दिया है, मुक्केबाजी में भी धब्बा जैसा दिख रहा है. खिलाड़ी परेशान हैं और खेलों के बुरे हाल की वजह से खेल पत्रकार भी परेशान हैं.

पिछले दो तीन साल में खेल पत्रकारों का ज्यादा वक्त मैदान की जगह अधिकारियों के कमरे में बीता, जहां वे खेल की राजनीति पर बातचीत करने के लिए जमा होते हैं. खेल पत्रकार इन दिनों मैचों की रिपोर्टिंग से ज्यादा खेल से जुड़ी राजनीति पर रिपोर्ट कर रहे हैं. भारत के ज्यादातर खेल अधिकारियों पर भ्रष्ट होने के आरोप लगते आए हैं, जिसका खामियाजा खेल को भी भुगतना पड़ता है. लेकिन मौजूदा हालात के लिए खेल मंत्री और खेल मंत्रालय भी कम जिम्मेदार नहीं.

ढाई साल पहले 2010 के कॉमनवेल्थ खेलों में मंत्री एमएस गिल और खेल संघों के बीच खूब ठनी. मंत्री इन संघों पर लगाम लगाना चाहते थे और संघ अपनी मर्जी से काम करना चाहते थे. गिल ने उम्र का हवाला देते हुए संघों के अधिकारियों को नियंत्रित करना चाहा और कुछ नियम भी बनाए, लेकिन संघों ने इन नियमों को नहीं माना. कई खेल संघ में गिल के साथी नेता ही अधिकारी हैं, लेकिन उन्होंने भी बात नहीं मानी.

गिल के बाद अजय माकन ने भी खेल से जुड़ा बिल पास कराने की कोशिश की, जिसमें नियम कायदों का जिक्र है. लेकिन उनकी लाख कोशिशों के बाद भी यह बिल संसद में पास नहीं हो पाया. सरकार के आला नेता खेल संघों पर कब्जा जमाए हैं और वे गद्दी नहीं छोड़ना चाहते. माकन ने दो साल के अपने कार्यकाल में इस काम को करने की भरपूर कोशिश की लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली. हालांकि इस दौरान भारतीय टीम ने लंदन ओलंपिक में ठीक ठाक प्रदर्शन किया. ओलंपिक से लौटते ही माकन से मंत्रालय ले लिया गया.

माकन के बाद जीतेंद्र सिंह ने खेल मंत्रालय की बागडोर संभाली. उन्होंने भी पहले मंत्रियों जैसा ही करना चाहा और खेलों की आचार संहिता के लिए अदालत का दरवाजा भी खटखटाया. इसके बाद अदालत ने भारतीय ओलंपिक संघ को सरकार के आदेश के तहत चुनाव कराने को कहा, जिसे अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने नामंजूर कर दिया और भारत की सदस्यता ही खत्म कर दी.

इसके बाद खेल मंत्रालय ने भी ओलंपिक समिति को नजरअंदाज करना शुरू कर दिया. नतीजा हुआ कि भारतीय ओलंपिक संघ दो चक्कों के बीच फंस गई. उसे समझ नहीं आ रहा है कि वह अंतरराष्ट्रीय समिति की माने या अपनी सरकार की. भारतीय संघ को आज न तो भारत सरकार की ओर से वित्तीय मदद मिल रही है और न ही अंतरराष्ट्रीय समिति से.

कुछ ऐसी ही हालत 1970 के दशक में थी, जब इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री थीं. उन्होंने भी खेल संघों को सबक सिखाने की ठानी थी. लेकिन उस वक्त के भारतीय ओलंपिक संघ के अध्यक्ष अश्विनी कुमार ने हाथ जोड़ कर गांधी से कहा था कि वह ऐसा न करें. इंदिरा गांधी ने उनकी बात मान ली.

आज फर्क यह है कि कोई किसी की बात मानने को तैयार नहीं. मंत्रालय और भारतीय ओलंपिक संघ को अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति से मिलना है. अंतरराष्ट्रीय एजेंसी की अपनी परेशानी है. उसके अध्यक्ष याक रोगे का कार्यकाल जुलाई में खत्म होने वाला है. वह नहीं चाहेंगे कि अंतिम वक्त में किसी पक्ष को नाराज किया जाए और उनके रिटायरमेंट के बाद उनके दामन पर इस बात का दाग लगे. भारत में जिस तरह मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं, किसी भी मंत्री के साथ कुछ भी हो सकता है और ऐसे में खिलाड़ियों की कौन पूछे… (डीडब्‍ल्‍यू)

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