श्रीलाल शुक्ल का संपूर्ण लेखन समाज और साहित्य दोनों में हर तरह ‘हम्बग’ यानी ढकोसले, पाखंड और छल-छद्म के खिलाफ एक सर्जनात्मक अभियान है। प्रकारांतर से यही बात श्रीलाल जी ने अपने समानधर्मा साहित्यकार हरिशंकर परसाई के हवाले से भी कही है। परसाई का एक लेख है- ‘साधना का फौजदारी अंत’। दरअसल यह लेख एक अपर डिवीजन क्लर्क यानी एक यूडीसी की कहानी है, जो किसी आश्रमभोगी ठग अर्थात गुरु के चक्कर में पड़कर सत्य की खोज का व्रत ले लेता है। अब परसाई और उस क्लर्क की बातचीत का एक टुकड़ा – पहले वह क्लर्क, फिर परसाई!
‘मैं जानता हूं कि आप भी सत्य की खोज करते हैं। आप जो लिखते हैं, उससे यही मालूम होता है।’ ‘यह तुम्हारा गलत ख्याल है। मैं तो हमेशा झूठ की तलाश में रहता हूं, कोने-कोने में झूठ को ढूंढ़ता हूं। झूठ मिल जाता है तो बहुत खुश होता हूं।’ इसके बाद हरिशंकर परसाईजी यहां अपनी टिप्पणी करते हैं, ‘न वह समझा, न उसे विश्वास हुआ। वह मुझे अपनी ही तरह सत्यान्वेषी समझता रहा।’ और अंत में श्रीलाल जी की अपनी टिप्पणी : ‘यहां परसाई ने व्यंग्य की एक विशिष्ट प्रवृत्ति का संकेत दिया है। स्पष्ट है कि वे जान-बूझ कर कोई सिद्धांत निरूपण नहीं कर रहे हैं, पर उन्होंने जो कहा है वह प्रसंगत: व्यंग्य को एक विशेष अर्थ में
परिभाषित करता है : व्यंग्य सत्य की खोज नहीं, झूठ की खोज है। यही उसका पेंचदार रास्ता है। झूठ की खोज के सहारे, या उसके बहाने ही यहां सत्य को पहचानने की प्रक्रिया चलती है।’
इसका निष्कर्ष यह कि ‘व्यंग्य के टेढ़े-मेढ़े रास्ते से गुजर कर हम उन मूल्यों तक पहुंचते हैं जो मूलत: उत्कृष्ट साहित्य का अंतिम लक्ष्य रहे हैं।’ कहना न होगा कि ‘रागदरबारी’ से लेकर ‘विश्रामपुर का संत’ तक श्रीलाल जी इसी झूठ की खोज करते हुए टेढ़े-मेढ़े रास्ते से सत्य को पहचानने की कोशिश करते रहे हैं और लोग इसे सिर्फ ‘व्यंग्य’ कहकर हाशिए पर डालते रहे हैं। याद करें तो रघुवीर सहाय ने भी श्रीलाल शुक्ल की छोटी-सी पुस्तक ‘यहां और वहां’ के ‘परिचय’ में इसी बात को इन शब्दों में व्यक्त किया है कि ‘उनका व्यक्तित्व विकृति की सृष्टि नहीं, विकृति की खोज करता है।’
यह ‘विकृति’ कहीं-न-कहीं श्रीलाल जी के ‘पेंचदार रास्तों’ और ‘टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता’ की ओर इशारा करती दिखाई पड़ती है। एक तरह से यह टेढ़ी अंगुली से घी निकालने वाली बात है, क्योंकि अक्सर घी सीधी अंगुली से नहीं निकलता। कभी आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने भी कहा था कि ‘प्रच्छन्नता का उद्घाटन कवि-कर्म का एक मुख्य अंग है’ क्योंकि ‘ज्यों-ज्यों हमारी वृत्तियों पर सभ्यता के नए-नए आवरण चढ़ते जाएंगे, त्यों-त्यों कवि-कर्म कठिन होता जाएगा।’
कहना न होगा कि सभ्यता के तथाकथित विकास के साथ-साथ छल-छद्म भी घना होता जा रहा है। उसे भेदना भी कठिन से कठिनतर हो रहा है। जिसे श्रीलाल जी ने ‘टेढ़ा-मेढ़ा रास्ता’ कहा है, वह लेखक के लिए टेढ़ी मेढ़ी ‘भाष’ ही है और उसी का नाम व्यंग्य है।
संस्कृत के प्राचीन काव्यशास्त्र में इसी को ‘वक्रोक्ति’ कहा जाता था। आचार्य कुंतक ने ‘वक्रोक्ति’ को ‘वैदध्य-भंगी-भणिति’ के नाम से परिभाषित किया है। जब लेखक विदग्ध होगा : उसका हृदय विशेष रूप से दग्ध होगा, अत्यंत जला हुआ और संतप्त होगा तो उसकी जबान भी टेढ़े-मेढ़े ही चलेगी और उसकी भाषा में विशेष प्रकार की भंगिमा होगी। यह आकस्मिक नहीं है कि श्रीलाल जी बार-बार जोर देकर व्यंग्य को भंगिमा कहते हैं। फिर भी श्रीलाल शुक्ल की भाषा की प्रशंसा करने वाले भूल जाते हैं उस अंदर के कोठे को, जहां से स्वर निकलते हैं।
वे व्यंग्य के छिटपुट स्फुलिंग या फुलझड़ियां नहीं छोड़ते, बल्कि उनकी आद्यन्त भंगिमा ही ऐसी है। ऐसी भंगिमा के बूते पर वे ‘रागदरबारी’ के लगभग पांच सौ पृष्ठों तक व्यंगोक्ति को निभा ले जाते हैं, जो किसी भी रचनाकार के लिए वास्तव में एक बहुत बड़ी चुनौती है। सच तो यह है कि जिस ‘हम्बग’, ढकोसला, छल-छद्म को वे तार-तार करके उघाड़ना चाहते हैं, उसके लिए सबसे कारगर हथियार यह वक्र और बांकी भाषा ही है। विकल्प में या तो आक्रोश की भाषा है या फिर गाली-गलौज। लेकिन इस विकल्प के साथ दिक्कत यह है कि इससे क्रुद्ध लेखक कुछ देर के लिए अपने आपको भले ही हल्का कर ले, सामान्य पाठक खाली-का-खाली ही रहता है।
इस स्थिति में निश्चित रूप से श्रीलाल शुक्ल की वक्रता कहीं अधिक सहृदय है, जिसे पढ़ने में न सिर्फ मजा आता है, बल्कि जिसे बार-बार पढ़ने को जी चाहता है और कहना न होगा कि किसी साहित्यिक कृति के अस्तित्व की यह पहली शर्त है, जो दिन-पर-दिन लगातार दुर्लभ होती जा रही है।
नामवर सिंह का यह लिखा ‘श्रीलाल शुक्ल : जीवन ही जीवन’ से साभार लेकर प्रकाशित किया गया है.






