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भास्कर डाट काम वाले शांत हो चुके मुजफ्फरनगर दंगे से हिट्स बटोरने में जुटे!

मीडिया का धंधा कितना गंदा है, इसे जब गहराई से समझेंगे तो उबकाई आने लगेगी. मुजफ्फरनगर में दंगा शांत हो चुका है. लोग अपने सामान्य जीवन की तरफ लौट चुके हैं. पर मीडिया का एक हिस्सा इसे जिलाए हुए है. कई वजहों से बदनाम भास्कर डाट काम वालों ने मुजफ्फरनगर के स्थानीय अखबारों की रिपोर्टिंग की कतरनों को इकट्ठा कर उसे पिक्चर स्लाइड बना चुके हैं और भड़कीले शीर्षकों से पाठकों के सामने परोस चुके हैं. इन शीर्षकों और स्थानीय अखबारों में छपी खबरों को पढ़कर मन अशांत हो जाता है.

मीडिया का धंधा कितना गंदा है, इसे जब गहराई से समझेंगे तो उबकाई आने लगेगी. मुजफ्फरनगर में दंगा शांत हो चुका है. लोग अपने सामान्य जीवन की तरफ लौट चुके हैं. पर मीडिया का एक हिस्सा इसे जिलाए हुए है. कई वजहों से बदनाम भास्कर डाट काम वालों ने मुजफ्फरनगर के स्थानीय अखबारों की रिपोर्टिंग की कतरनों को इकट्ठा कर उसे पिक्चर स्लाइड बना चुके हैं और भड़कीले शीर्षकों से पाठकों के सामने परोस चुके हैं. इन शीर्षकों और स्थानीय अखबारों में छपी खबरों को पढ़कर मन अशांत हो जाता है.

जिन कई अखबारों पर दंगा भड़काने वाली रिपोर्टिंग और खबरें छापने का आरोप है, उन्हीं अखबारों की खबरों को भास्कर डाट काम परोस रहा है. इस घटिया और हिट्स बटोरने के लिए पत्रकारीय नैतिकता को तार-तार करने वाली मानसिकता की जितनी निंदा की जाए उतनी कम है.

भास्कर वालों ने दंगे से संबंधित स्थानीय अखबारों की रिपोर्टिंग के कुल 42 फोटो स्लाइड बनाए हैं. हर स्लाइड में दो तीन खबरों की कतरन जोड़ी गई हैं. आखिर इन कतरनों को दिखाकर भास्कर क्या बताना चाहता है, और किस तरह की पत्रकारिता को बढ़ावा देना चाहता है? यह तो सरासर टीआरपीबाजी का प्रयोग है, जिसका आम पाठक के दिल-ओ-दिमाग पर बुरा असर पड़ता है और सूख रहे घावों को हरा करने की साजिश नजर आती है. 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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