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सुख-दुख...

भूमिका राय मामले में एडीजी एके जैन की तत्परता से सबक

ईटीवी, लखनऊ में कार्यरत युवा पत्रकार भूमिका राय शाम में दिल्ली से लखनऊ जाने के लिए दिल्ली फैजाबाद एक्सप्रेस के स्लीपर कोच एस टू में सवार होती है. ट्रेन दिल्ली से चल कर गाज़ियाबाद पहुँचती है और फिर अचानक ऐसी स्थितियां बन जाती हैं कि भूमिका को फेसबुक पर लिखना पड़ जाता है- “दिल्ली-फैजाबाद एक्सप्रेस ट्रेन में हूं, लखनऊ जा रही हूं. लगभग हर दो हफ्ते में दिल्ली से लखनऊ और लखनऊ से दिल्ली जाती हूं लेकिन पहली बार डर लग रहा है. डर….क्योंकि गाजियाबाद में जो भीड़ चढ़ी है वो बेहद बेहूदी है. अपर बर्थ पर हूं फिर भी उन्होंने अपना समान फेंक दिया था, बैठने के लिए चढ़ भी गए….मना करने पर चिल्लाने लगे,खुद हटे तो समान रख दिया जिसे अनुरोध के बाद भी नहीं हटाने पर मैने नीचे कर दिया….और अब चारों ओर से सब घूर रहे हैं और कुछ शोहदे फब्तियां भी कस रहे हैं….और कुछ ऐसी गालियां भी जो मेरी समझ से तो परे हैं…और न तो यहां रेलवे पुलिस है और ना ही कोई और…”

ईटीवी, लखनऊ में कार्यरत युवा पत्रकार भूमिका राय शाम में दिल्ली से लखनऊ जाने के लिए दिल्ली फैजाबाद एक्सप्रेस के स्लीपर कोच एस टू में सवार होती है. ट्रेन दिल्ली से चल कर गाज़ियाबाद पहुँचती है और फिर अचानक ऐसी स्थितियां बन जाती हैं कि भूमिका को फेसबुक पर लिखना पड़ जाता है- “दिल्ली-फैजाबाद एक्सप्रेस ट्रेन में हूं, लखनऊ जा रही हूं. लगभग हर दो हफ्ते में दिल्ली से लखनऊ और लखनऊ से दिल्ली जाती हूं लेकिन पहली बार डर लग रहा है. डर….क्योंकि गाजियाबाद में जो भीड़ चढ़ी है वो बेहद बेहूदी है. अपर बर्थ पर हूं फिर भी उन्होंने अपना समान फेंक दिया था, बैठने के लिए चढ़ भी गए….मना करने पर चिल्लाने लगे,खुद हटे तो समान रख दिया जिसे अनुरोध के बाद भी नहीं हटाने पर मैने नीचे कर दिया….और अब चारों ओर से सब घूर रहे हैं और कुछ शोहदे फब्तियां भी कस रहे हैं….और कुछ ऐसी गालियां भी जो मेरी समझ से तो परे हैं…और न तो यहां रेलवे पुलिस है और ना ही कोई और…”

साथ ही वह भड़ास के संस्थापक यशवंत सिंह को फोन करती हैं. उन्हें उम्मीद है कि यशवंत इन स्थितियों में शायद कुछ ऐसी व्यवस्था बनाएँ जिससे भूमिका को उस बेहद असहज स्थिति से मुक्ति मिल सके. यशवंत तुरंत मुझे फोन करते हैं और पूछते हैं कि ऐसी स्थितियों में क्या किया जा सकता है. मैं भी एक क्षण सोचता हूँ कि अब क्या किया जाए. ट्रेन गाज़ियाबाद से चल चुकी है, पता नही कहाँ होगी. फिर सोचता हूँ कि जीआरपी के एडीजी ए के जैन को ही फोन करूँ.

एक बार मन में आता है कि वरिष्ठ अधिकारी हैं, पता नहीं मेरी बात को किस रूप में लें. फिर लगता है कि चूँकि मामला गंभीर है और तत्काल मदद की जरूरत है अतः शायद उन्हें ही फोन करना पड़ेगा. राते के आठ बज चुके हैं पर फिर भी मैं पुलिस विभाग के तमाम प्रोटोकॉल छोड़ कर एडीजी ए के जैन को फोन करता हूँ. उधर से बेहद संयत आवाज़ आती है. और इसके बाद कुछ ऐसा होता है जो ना सिर्फ मुझे उनकी सार्वजनिक रूप से तारीफ़ करने को प्रेरित करता है बल्कि मौके की पुलिसिंग के एक शानदार रूप को भी दिखाता है.

एके जैन मेरे फोन करने के बाद मेरी शिकायत को बेहद तत्परता से नोट करते हैं, इस दौरान उनकी आवाज़ में जो आश्वासन के भाव हैं वे

एके जैन

एके जैन

वाकई काबिले-तारीफ़ हैं. इतने बड़े पुलिस अधिकारी होने के बाद भी वे एक बार भी मेरे फोन को इस रूप में नहीं लेते कि मैंने उन्हें क्यों फोन कर दिया, यह काम तो किसी इन्स्पेक्टर, डिप्टी एसपी या एसपी का है. इतना ही नहीं, वे इससे आगे बढ़ कर स्वयं भूमिका का मोबाइल नंबर भी देने को कहते हैं ताकि कार्यवाही में आसानी हो. मेरे पास भूमिका का नंबर नहीं है. मैं यशवंत से मोबाइल नंबर के बारे में पूछ कर दो-तीन मिनट के अंदर उन्हें बताता हूँ. तब तक उनकी गाजियाबाद और मेरठ के जीआरपी वालों से बात हो गयी है और वे यह बात मुझे बताते हैं. मैं काफी आश्वस्त हो जाता हूँ और प्रभावित भी.

करीब आधे घंटे बाद यशवंत का फोन आता है. वे मुझे बताते हैं- ''अमिताभ भाई, आपको सूचित करने के कुछ ही देर बाद चार-पांच कांस्टेबल भूमिका  के पास पहुंच गए. पुलिस वालों को देखते ही वे बदमाश लोग पिछले दरवाजे से भाग खड़े हुए और उनमे से एक पकड़ा गया. मैं आपको इस त्वरित एक्शन के लिए कई बार धन्यवाद देना चाहता ''

यशवंत ने मुझे धन्यवाद दिया और उसके तुरंत बाद मैंने अपनी तरफ से तुरंत फोन मिलाया एके जैन को. उन्हें मैंने अपनी तरफ से तहे दिल से धन्यवाद बोला.

घटना बहुत छोटी सी है, और बहुत बड़ी भी. पुलिस समय से चली आई, कोई बड़ी घंटना घटने से बच गयी, सब ठीक हो गया. यदि देखा जाए तो एडीजी ए के जैन ने किया ही क्या. बस एक या दो लोगों को फोन कर दिया. लेकिन यदि इस घटना को इसकी सम्पूर्णता में देखा जाए तो यह पूरी पुलिसिंग को उसके बुनियादी स्वरुप में सामने रख देती है. पुलिस के पास कोई आदमी फुर्सत के वक्त तो आता नहीं, ना ही कोई तफरी करने आता है.

यह कोई पार्क या रेस्त्रा या सिनेमाघर तो है नहीं कि जब मूड खुशनुमा हुआ तो चले गए. पुलिस के पास तो आदमी तभी जाता है जब उसके ऊपर कोई मुसीबत आई हो अथवा वह किसी समस्या से रूबरू हुआ हो. ऐसे में आगंतुक व्यक्ति एक अजीब सी परेशान और व्याकुल मनोदशा में होता है. यदि इस अवस्था में आये व्यक्ति से हमदर्दी और सहानुभूति से बात कर ली जाए, उससे अपनेपन से उनकी पूरी बात सुन और पूछ ली जाए तो वह काफी हद तक आश्वस्त हो जाता है. फिर यदि इसके बाद आनन-फानन में पुलिस की कार्यवाही शुरू कर दी जाए तो कहना ही क्या.

नतीजा उतना ही असरदार होता है जितना भूमिका के मामले में हुआ. किसी परेशान आदमी की पीड़ा का त्वरित समाधान हो जाता है और इसके साथ ही पुलिसवाले अपने लिए ढेर सारे धन्यवाद और नेकनामी बटोर लेते हैं. त्वरित कार्यवाही से कई सारे फायदे होते हैं- एक तो जल्दी की गयी प्रतिक्रिया अकसर बेहतर परिणाम देती है, दूसरे इससे आगे घटने वाली कोई दूसरी संभावित घटना रुक जाती है, साथ ही इससे अन्य लोगों तक एक बहुत अच्छा सन्देश भी जाता है.

मैं इस घटना को इसके अकेलेपन में नहीं लेता. यह तो ठीक है कि भूमिका को ए के जैन की त्वरित कार्यवाही से बहुत मदद मिली पर मूल मुद्दा मात्र भूमिका या यशवंत या ए के जैन का नहीं है. मूल मुद्दा है पुलिसिंग के कार्य और स्वरुप का. मूल मुद्दा है मौके पर पुलिस के रेस्पोंस का. इस रूप में मैं इस घटना को एक नजीर और एक ऐसे उदाहरण के रूप में देखना और प्रस्तुत करना चाहूँगा जो हमें बताता है कि यदि पुलिस का प्रत्येक अधिकारी अपने आप को जरा सा चौकन्ना और जागरूक बना ले तो हम किस हद तक जनता की उम्मीदों पर खड़े उतर सकते हैं. मैं व्यक्तिगत रूप से इसे एक ऐसे मॉडल के रूप के सामने रखना चाहता हूँ जिसका पालन करने से ना सिर्फ पीड़ित और परेशान व्यक्ति की काफी मदद ही जायेगी बल्कि पुलिस भी अपने काम को बेहतरी से अंजाम देने में सफल होगी.

सचमुच पुलिसिंग आसान है यदि हम उसके बेसिक्स को ठीक ढंग से समझने को तैयार हैं.

अमिताभ

अमिताभ

लेखक अमिताभ लखनऊ में पदस्थ जनपक्षधर आईपीएस अधिकारी हैं. वे यूपी के कई जिलों में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक रह चुके हैं. पुलिसिंग पर सतत प्रयोग करने के साथ-साथ अन्य सामाजिक और नैतिक मुद्दों पर गाहे-बगाहे चिंतन व लेखन करते रहते हैं.

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