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भूमिहार यादव का दुश्मन ही होता है न

भई, मीडिया का धंधा बड़ा निराला है। आप खोजते किसी और को हैं, और मिलता कोई और है। इस खोजने और मिलने के दौर में कोई तीसरा प्रवेश कर जाए तो करेला पर नीम। और वह नीम कहे कि हम हैं आपके दुश्मन तो आप आसानी से समझ सकते हैं कि किस उलझन में पड़े होंगे हम। पटना के अंटा घाट पर एसबीआई का कार्यालय है। एकदम गंगा के तीर पर। किसी काम से गया था। बैंक में हमारे एक परिचित काम करते हैं। नाम हैं हसन इमाम। बातचीत फोन पर ही हुई थी। सोचा, क्यों न उनसे मिल लिया जाए। उनका मोबाइल मिस हो गया था।

भई, मीडिया का धंधा बड़ा निराला है। आप खोजते किसी और को हैं, और मिलता कोई और है। इस खोजने और मिलने के दौर में कोई तीसरा प्रवेश कर जाए तो करेला पर नीम। और वह नीम कहे कि हम हैं आपके दुश्मन तो आप आसानी से समझ सकते हैं कि किस उलझन में पड़े होंगे हम। पटना के अंटा घाट पर एसबीआई का कार्यालय है। एकदम गंगा के तीर पर। किसी काम से गया था। बैंक में हमारे एक परिचित काम करते हैं। नाम हैं हसन इमाम। बातचीत फोन पर ही हुई थी। सोचा, क्यों न उनसे मिल लिया जाए। उनका मोबाइल मिस हो गया था।

इस मंजिल से उस मंजिल पर तलाशने का क्रम शुरू हुआ। एक टेबल पर जाकर पूछा- हसन इमाम जी कौन हैं? इस बीच बगल वाले टेबुल पर बैठे अधिकारी ने मुझे बुला लिया। हमें लगा यही होंगे हसन इमाम जी। मैंने अपना नाम बताया और उनके सामने बैठ गया। अपना विजिटिंग कार्ड दिया और फॉरवर्ड प्रेस की विशेषता के बारे में उनसे चर्चा की। बताया कि बहुजन के सरोकारों की वकालत करती है यह पत्रिका। इस दौरान मेरी नजर उनके परिचय पत्र पर पड़ा। मैं चौंका। हम हसन जी को खोज रहे थे, यह तो करीम जी हैं। मैंने अपनी दुविधा उन्हें बतायी। उन्होंने कहा कि एक वीरेंद्र यादव जी होम लोन के लिए आने वाले थे। हम वही समझ रहे थे।

हम लोग की बातचीत में कभी-कभार राधिका रमण जी भी शामिल हो रहे थे। उन्होंने पत्रिका देखी और उसके विषय, विचार और कलेवर को लेकर प्रशंसा भी की। जब मैंने पत्रिका की सदस्यता के बारे में बात की तो करीम जी अनमने हो गए। तब तक मैं राधिका रमण जी की ओर मुखातिब हो लिया था। उनसे मैंने कहा कि बैंक में कोई यादव लोग हों तो उनका ही नाम, पता बता दीजिए, उनसे ही मिल लिया जाए। उन्होंने कहा, देखिए जातिवाद शुरू कर दिए न। मैंने कहा, ऐसी बात नहीं है। जाति के नाम पर तो थोड़ा जुड़ाव हो ही जाता है।

बात आगे बढ़ी। मैंने पूछा, आप किस जाति के हैं? उन्होंने कहा, आपका दुश्मन। उनके कहने का आशय को समझते हुए मैंने कहा, मेरा तो कोई दुश्मन है ही नहीं, आप कहां से आ गए? उन्होंने कहा, आप नहीं समझे, हम भूमिहार हैं। भूमिहार यादव का दुश्मन ही होता है न। मैंने कहा, ऐसी बात तो नहीं है। उन्होंने अपनी बात के समर्थन में कहा कि एक समय था, जब पटना में यादव व भूमिहार एक दूसरे के दुश्मन थे। लेकिन अब वह स्थिति नहीं है। राज बदलने के बाद समाज भी बदला है।  

फिर मैंने अपना प्रवचन शुरू किया। इस राज्य में दो ही जाति लड़ने वाली है। एक है यादव और दूसरी है भूमिहार। लेकिन दोनों की लड़ाई में अंतर है। भूमिहार लड़ता है सिर्फ भूमिहार के लिए, भूमिहार के फायदे के लिए। जबकि यादव यादव जाति के हित के लिए नहीं लड़ता है। वह लड़ता है दूसरे के हित के लिए, दूसरे फायदे के लिए। यही दोनों की लड़ाई का अंतर है। यही वजह है कि वामपंथ की लड़ाई में दोनों साथ-साथ नजर आते हैं तो सामाजिक सम्मान की लड़ाई में दोनों एक-दूसरे के आमने-सामने नजर आते हैं। उन्होंने भी अपने तर्क रखे। इस बीच मेरे काम का समय हो रहा था और मैं विदा लेकर चल दिया। लेकिन यही सोचता रहा कि अनजानी जगह पर भी दुश्मन मिल ही जाते हैं चाहे या अनचाहे।

लेखक वीरेंद्र कुमार यादव पटना के पत्रकार हैं.

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