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भ्रमित करते भाषाई प्रयोग

एक वक्त था, जब अखबारों के लिए भाषा एक महत्वपूर्ण चीज हुआ करती थी…पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों से समाचार डेस्क पर मिलने वाले गुरुज्ञान में खबरें बनाते हुए भाषा की इज्जत रखते हुए सही शब्दों का सही इस्तेमाल सिखाया जाता था. बताया जाता था कि चाकू भोंकने और चाकू घोंपने में क्या फर्क होता है, दुर्घटनाओं में कहाँ टक्कर लिखना है, कहाँ भिड़ंत और कहाँ मुठभेड़…फिर जैसे अचानक ही एक दौर बीत गया.

एक वक्त था, जब अखबारों के लिए भाषा एक महत्वपूर्ण चीज हुआ करती थी…पत्रकारिता के पाठ्यक्रमों से समाचार डेस्क पर मिलने वाले गुरुज्ञान में खबरें बनाते हुए भाषा की इज्जत रखते हुए सही शब्दों का सही इस्तेमाल सिखाया जाता था. बताया जाता था कि चाकू भोंकने और चाकू घोंपने में क्या फर्क होता है, दुर्घटनाओं में कहाँ टक्कर लिखना है, कहाँ भिड़ंत और कहाँ मुठभेड़…फिर जैसे अचानक ही एक दौर बीत गया.

भाषाई शुद्धता ‘विद्यानिवासी सनक’ ( पं. विद्यानिवास मिश्र द्वारा नवभारत टाइम्स में प्रधान संपादक रहते हुए भाषा की गरिमा और शुद्धता को स्थापित करने के लिए किए गए उपक्रम) करार दे दी गई और अधकचरी भाषा को आम आदमी की भाषा कहते हुए अखबार के लिए जरूरी बना दिया गया.

सब जगह एकरूपता की बजाए अपनी-अपनी ढपली, अपना-अपना राग बजने लगा. कुछ अखबार तो और भी आगे निकल गए, जिनके लिए प्रधानमंत्री -राष्ट्रपति जैसे शब्द कठिन और प्राइम मिनिस्टर-प्रेसिडेंट जैसे शब्द आसान थे, संगीत बोलने में जुबान को मशक्कत करनी पड़ती थी और म्युजिक कर्णप्रिय लगता था. आज तो हालत ये है कि कई अखबारों ने खबरों के शीर्षक में ‘के लिए’ का इस्तेमाल ही बंद कर दिया है और कई ‘ना’ को जरूरत के मुताबिक ‘ने’ में ही नहीं बदलते…उनके लिए रिपोर्ट लिखाने थाना गए, थाने गए की जगह ज्यादा शुद्ध और पागलखाना में हंगामा, पागलखाने में हंगामे से ज्यादा सुगम है.

भाषाई मटियामेट में अंग्रेजी अखबार भी कुछ कम नहीं हैं…जहाँ अवार्ड, म्युजिक और लाइफ जैसे शब्दों को नकारात्मक खबरों के शीर्षकों में प्रयोग किया जाता है. पहले लगता है कि जैसे किसी को उसके बुरे कामों के लिए उपकृत किया जा रहा हो. जैसे ‘…गेट्स लाइफ’ ( किसी को आजीवन कारावास की सजा सुनाए जाने पर), ही ‘अवार्डेड डेथ फॉर…( मौत की सजा मिलने पर); ‘….फेस म्यूजिक’( गलती के लिए मुश्किल में पड़ने पर)…ऐसे बहुत सारे भ्रमित करने वाले भाषाई प्रयोग आपको अक्सर मिल जाएंगे. क्या आम आदमी को इसी भाषा की दरकार है?

संदीप अग्रवाल

संपादक

ज़िंदगी नेक्स्ट


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