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भड़ास की सफलता और यशवंत सिंह की मीडिया सरकार

अखबारों, पत्रकारों और इलेक्ट्रानिक न्यूज़ चैनल के गलत और अनुचित कार्यों के खिलाफ आग उगलने वाली प्रसिद्ध वेबसाइट भड़ास4मीडिया अब कुछ ही समय में अपने सफर का चौथा साल भी पूरा करने को आगे बढ़ रही है. आज भड़ास के पढ़ने वालों की संख्या प्रतिवर्ष 6 करोड़ 90 लाख 30 हजार तक पहुंच चुकी है. भड़ास ने हमेशा सबकी सुनी और किया वही जो किसी ने नहीं सुनी. वहीं भड़ास के घेरे में आये लोगों की फटती रही, चीख पुकार मचती रही लेकिन भड़ासियों के मसीहा कहे जाने वाले यशवंत सिंह ने कभी सच्चाई से मुंह न मोड़ कर उसका सामना किया और प्रकाशित तथ्य को साफ़ छवि देने के लिए लगातर कमेन्ट बॉक्स में भी नजर आते रहे. भड़ास4मीडिया को प्रतिदिन पढ़ने और लिखने वाले 1,91,750 भड़ासियों की सूचनाओं की गोपनीयता बनाने में हर संभव प्रयास करने के साथ सही तथ्यों को जान कर प्रकाशित करने में कभी पीछे नहीं रहे.

अखबारों, पत्रकारों और इलेक्ट्रानिक न्यूज़ चैनल के गलत और अनुचित कार्यों के खिलाफ आग उगलने वाली प्रसिद्ध वेबसाइट भड़ास4मीडिया अब कुछ ही समय में अपने सफर का चौथा साल भी पूरा करने को आगे बढ़ रही है. आज भड़ास के पढ़ने वालों की संख्या प्रतिवर्ष 6 करोड़ 90 लाख 30 हजार तक पहुंच चुकी है. भड़ास ने हमेशा सबकी सुनी और किया वही जो किसी ने नहीं सुनी. वहीं भड़ास के घेरे में आये लोगों की फटती रही, चीख पुकार मचती रही लेकिन भड़ासियों के मसीहा कहे जाने वाले यशवंत सिंह ने कभी सच्चाई से मुंह न मोड़ कर उसका सामना किया और प्रकाशित तथ्य को साफ़ छवि देने के लिए लगातर कमेन्ट बॉक्स में भी नजर आते रहे. भड़ास4मीडिया को प्रतिदिन पढ़ने और लिखने वाले 1,91,750 भड़ासियों की सूचनाओं की गोपनीयता बनाने में हर संभव प्रयास करने के साथ सही तथ्यों को जान कर प्रकाशित करने में कभी पीछे नहीं रहे.

जैसे इंसान के हर दिन एक जैसे नहीं होते वैसे भड़ास के दिन भी कभी एक जैसे नहीं रहे. भड़ासियों के इस कोने में खबरों के सहेजने से लेकर इसको जीवित रखने में कभी अपने को असहाय महसूस कर रहे यशवंत सिंह ने कभी कोई शर्म नहीं की और इसको चलाने के लिए लोगों से मदद की अपील भी की है. “भड़ास4मीडिया को अब आप लोग चलाइए, मैं चला चुका” लेख से प्रेरित हो कर बहुत लोगों ने मदद के लिए हाथ बढ़ाये, कितने लोगों ने इसे भीख का नाम तक दे डाला, तीखी प्रतिक्रिया दी, जिस तरह भड़ास लोगो की पोल खोलता रहा वैसे ही भड़ास की चपेट में आये लोग अपनी भड़ास निकालने के लिए तीखी प्रतिक्रियाएं भी देते रहे जिसे उसी अंदाज में भड़ास पर प्रकाशित भी किया जाता रहा है.

आज शायद ही कोई पत्रकार या मीडिया समूह इसे खोल कर ना देखता हो. कोई कितनी भी इस मीडिया वेबसाइट की बुराई बखानता फिरे लेकिन जबतक इसके दर्शन न कर ले, उसका खाना हजम नहीं होता. हम जहाँ सिर्फ एक कम्प्यूटर पर बैठ कर देश के कोने कोने की मीडिया सम्बंधित खबर को पढ़ कर अपना खाना हजम करते हुए नजर आते है वहीँ भड़ास भी हमें खबरे परोसने में कोई कंजूसी नहीं करता. ये सच है कि ऐसा पत्रकारों के सहयोग से ही मुमकिन है कि हमें मीडिया की अजीबोगरीब और उठापटक जैसे घमासान की जानकारी मिलती रहती है लेकिन इसमें भड़ास4मीडिया के माई-बाप कहे जाने वाले यशवंत सिंह की भूमिका सराहनीय है. उन्होंने हमें एक ऐसा चौराहा दिया, हमें बेबाकी से कहने बोलने के लिए एक ऐसी जगह मुहैय्या कराइ जिसकी कल्पना शायद ही किसी पत्रकार या किसी मीडिया समूह ने की हो.

अखबारों, न्यूज़ चैनल में लोगों की काली करतूतों को जगजाहिर करने में भले ही पत्रकार समाज रात दिन एक करता रहा है लेकिन अखबार की करतूत और उसमें फैले भ्रष्टचार के खिलाफ कौन बोले? अखबार, न्यूज़ चैनल में प्रकाशित, जारी हुई गलत और निराधार खबरों पर कटाक्ष करने के लिए कोई फौरी तौर पर कहाँ जाता? अपने संपादक या वरिष्ठ अधिकारीयों के उत्पीड़न के शिकार पत्रकार, कर्मचारी कहां जाते? लेकिन अपनी भड़ास को निकलने के लिए यशवंत सिंह ने भड़ासियों के लिए एक ऐसी जगह मुकर्रर की जहाँ किसी को भी उसके गलत कामों के लिए नंगा किया जा सकता है और समाज के सामने मीडिया में छिपे घिनौने चेहरे को दुनिया और समाज के सामने ला कर खड़ा किया जा सकता है. भड़ास4मीडिया की तारीफों के पुल बांधते हुए मेरे इस लेख पर लोगो की राय भी गजब की होगी.

लोग सोचते होंगे कि मैंने भड़ास की कोई बुराई क्यों नहीं लिखी? क्यों सिर्फ इसकी और इसके संचालक की तारीफों के पुल बांधे है? लेकिन अगर मेरे स्वयं के शब्द ऐसे हैं तो ज़रूर कहीं न कहीं से मुझे भड़ास से कुछ सीखने को मिला है जिसके लिए मै भड़ास का शुक्रगुज़ार हूँ, जिसने हमें खुल कर बोलने की आजादी दी है. मैं भड़ास पर बहुत से लोगों की आपत्ति पढता आया हूँ कि हमारी खबरों को स्थान नहीं दिया जाता है, सिर्फ उनकी खबरों को स्थान दिया जाता है जो भड़ास की पैसों से मदद करते हैं या फिर भड़ास के चहेते हैं. लेकिन मेरा कहना होगा कि मैंने कभी कोई सहयोग राशि भड़ास को नहीं दी लेकिन मेरी खबरों, रिपोर्ट को प्रकाशित किया जाता रहा है लेकिन बहुत सी खबरें मेरी भी प्रकाशित नहीं हुई जिसके लिए मैंने कभी भड़ास से उसे प्रकाशित करने के लिए कोई आग्रह नहीं किया और आग्रह करूं भी तो क्यों?

रही बात अपने चहेतों की खबर छापने की बात, तो जहाँ तक मुझे याद है कि भड़ास पर जिसकी कभी तारीफ छापी गई हो उसको भी उसके गलत कामों के लिए नंगा किया गया है. भड़ास पर खबर का न लग पाना और लोगों को अपनी नाराजगी ज़ाहिर करना इस बात को साबित करता है कि भड़ास आज किस मुकाम पर है. मेरे द्वारा सर्च की गई कुछ मीडिया वेबसाइट का आंकलन करने पर ये तो साबित हो गया कि आज भड़ास कितना लोकप्रिय है, पाठकों की संख्या में लगातार बढ़त बनाते हुए वेबवर्थ के अनुसार आज भड़ास के पढ़ने वालों की संख्या प्रतिवर्ष 6 करोड़ 90 लाख 30 हजार तक पहुंच चुकी है. ऐसा देखा गया है कि लोगों ने अपनी भड़ास किसी और पर निकालने के लिए भड़ास पर खबर भेज दी हो जिससे उसका शिकार हुए लोग चीखते चिल्लाते हुए नज़र आये हैं. भड़ास के लिए लिखने वाले असंख्य पत्रकारों को बेबाकी से लिखने के लिए जो अधिकार यशवंत सिंह ने दिया है वो सच में तारीफ के काबिल है.

इस वेबसाइट पर बिना शुल्क दिए अपनी भड़ास लिखने कहने का अधिकार दे कर यशवंत सिंह ने पत्रकारिता जगत और उनके हित के लिए बड़ा काम किया है. और जब यशवंत सिंह ने हमें ये सुविधा निशुल्क प्रदान करने का प्रण ले ही लिया है तो अगर उन्होंने कभी भीतरी संकट के बारे में अपनी परेशानी साझा की है तो क्या गलत है? क्या गलत है कि इस भड़ासीय कोने को जिंदा रखने के लिए चंदा सहयोग माँगा गया हो? आज के इस दौर में मीडिया में काम कर रहे पीड़ित लोगों को उनका अखबार, मीडिया संस्थान नहीं पूछता लेकिन यहाँ इस चौराहे पर आये ऐसे पीड़ित की परेशानी बयान करने से लेकर उनकी परेशानी को एक दूसरे से साझा करने का जो बीड़ा यशवंत सिंह ने उठाया है वो क्या कम है?

इमरान जहीर

मुरादाबाद

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