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‘मंत्रालय में उल्लू’ का लोकार्पण

नागपुर : व्यंग्यकार टीकाराम साहू 'आजाद' के ताजातरीन व्यंग्यसंग्रह 'मंत्रालय में उल्लू' (समय प्रकाशन, दिल्ली) के लोकार्पण और समीक्षण के अवसर पर महात्मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय ने अध्‍यक्षता करते हुए कहा कि व्यंग्य लेखन बेहद गंभीर कर्म है। व्यंग्य के मानी केवल हंसाना नहीं है। बात तो तब है जब व्यंग्य पढ़ते हुए हंसते-हंसते आंखों से आंसू छलक आए। हास्य कवि की भांति व्यंग्यकार की भूमिका मात्र मनोरंजनात्मक नहीं है।

नागपुर : व्यंग्यकार टीकाराम साहू 'आजाद' के ताजातरीन व्यंग्यसंग्रह 'मंत्रालय में उल्लू' (समय प्रकाशन, दिल्ली) के लोकार्पण और समीक्षण के अवसर पर महात्मा गांधी अंतरराष्‍ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति विभूति नारायण राय ने अध्‍यक्षता करते हुए कहा कि व्यंग्य लेखन बेहद गंभीर कर्म है। व्यंग्य के मानी केवल हंसाना नहीं है। बात तो तब है जब व्यंग्य पढ़ते हुए हंसते-हंसते आंखों से आंसू छलक आए। हास्य कवि की भांति व्यंग्यकार की भूमिका मात्र मनोरंजनात्मक नहीं है।

लोहिया अध्ययन केंद्र की ओर से केंद्र के मधु लिमये स्मृति सभागृह में आयोजित समारोह में प्रख्‍यात समाजवादी विचारक और गांधीवादी चिंतक व लेखक रघु ठाकुर ने व्यंग्य संग्रह 'मंत्रालय में उल्लू' का लोकार्पण किया। सुप्रसिद्ध कथाकार से.रा. यात्री विशेष रूप से उपस्थित थे। श्री राय ने कहा कि आजादी के बाद चाहा गया कि एक रोशन ख्‍याल निजाम कायम हो, पर ऐसा न हो सका। हाशिए पर पड़े हुए स्वप्‍न और मोहभंग की स्थिति का अविकल अंकन श्री आजाद की व्यंग्य रचनाओं में है। वे पूरे देश में उपजी निराशा का प्रतिनिधित्व करती हैं। श्री राय ने प्रासंगिक रूप से हरिशंकर परसाई और शरद जोशी के नागपुर से संबंधों का जिक्र किया। उर्दू के इब्‍ने इंशा को याद किया जिन्होंने सत्‍तर के दशक में पाकिस्तानी समाज की स्थिति पर नुकीली टिप्‍पणियां दी हैं।

पुस्तक की भूमिका लिखने वाले रघु ठाकुर ने चुटकी लेते हुए कहा कि संग्रह का नाम 'मंत्रालय में उल्लू' के बजाय 'उल्लुओं का मंत्रालय' होना था। आजाद की प्रवृत्तिगत विशेषताओं को रेखांकित करते हुए उनका कहना था कि वे समस्या के किसी एक पहलू को उठाकर उस पर प्रहार करते हैं। जैसे एक्‍टर, क्रिकेटर और लीडर ही नहीं, आए दिन भ्रष्ट लोगों के भी बनते हुए मंदिर, प्रधानमंत्री का ख्‍वाब पालते नेता और आतंकवादी हमले की संकटग्रस्त घड़ी में शिवराज पाटिल का तीन बार कपड़े बदलना जैसी अनेक हास्यास्पद विसंगतियां उनके व्यंग्य की गिरफ्त में हैं। व्यंग्य में मात्र चिकोटी काटना पर्याप्‍त नहीं है। समग्र चिंतन को फलक पर रखा जाना चाहिए। आजाद के व्यंग्य 'देखन में छोटे लगे घाव करे गंभीर' को चरितार्थ करते हैं। अपने उपनाम के अनुरूप आजाद में लेखकीय निष्पक्षता है। वे पूर्वाग्रह से ग्रस्त नहीं है। चौतरफा व्यंग्यबाण चलाते हैं।

'आजाद' ने अपने मनोगत में कहा कि स्वस्थ समाज की संकल्पना को साकार करना ही लक्ष्य है। उनके व्यंग्यों में निजी नहीं, आम आदमी की पीड़ा का अनुरणन है। देश भर में विभिन्न समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित चुनिंदा 45 व्यंग्यों का यह संग्रह है। समय-समय पर लिखे गए ये व्यंग्य आज भी प्रासंगिक है। डा. ओमप्रकाश मिश्र ने भूमिका निवेदित की। उन्होंने बड़ी शिद्दत से कहा कि आजाद के व्यंग्यों में परिवर्तन की चाह बड़े ही सकारात्मक ढंग से रखी गई है। तमिल कवि मुथ्थु स्वामी ने इस अवसर पर डा. लोहिया पर स्वरचित हिंदी गीतों को सस्वर प्रस्तुत किया। केंद्र के सचिव हरीश अड्यालकर ने केंद्र की गतिविधियों पर प्रकाश डाला।

संचालन व्यंग्यकार राजेंद्र पटोरिया तथा आभार प्रदर्शन डा. गोविंद उपाध्याय ने किया। इस अवसर पर बड़ी संख्‍या में प्रबुद्घजन उपस्थित थे जिनमें वरिष्ठ पत्रकार जयशंकर गुप्त, इंदिरा किसलय, कृष्ण नागपाल, ओमप्रकाश शिव, मधु पाटोदिया, नरेंद्र परिहार, डा. शशिवर्धन शर्मा 'शैलेश', विश्वास इंदुरकर, जयदीप हर्डीकर, राजेंद्र प्रसाद सिंह 'राज', राजेंद्र मन, उमेश यादव, डा. संतोष मोदी, उमेश शर्मा, कृष्णकुमार द्विवेदी, डा. प्रमोद शर्मा, कमलकिशोर गुप्ता, डा. राजेंद्र मालोकर, जनकराम साहू, अविनाश बागड़े, रमेश उदेपुरकर, विनोद व्यास, अनिल चंदेल आदि का समावेश था। प्रेस रिलीज

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