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मक़बूल उन पत्रकारों में हैं जिन्हें अपना काम करने पर जेल भेजा गया

श्रीनगर : साहिल मक़बूल अपनी स्नेही मुस्कान के साथ झिझकते हैं, ऐसी अतिसंवेदनशीलता उन लोगों में खासकर देखी जा सकती है, जिन्होंने या तो बहुत ज्यादा सार्वजनिक अपमान सहा हो अथवा निजी त्रासदी। उन्होंने दोनों को बर्दाश्त किया है। 44 वर्षीय कश्मीरी पत्रकार और कवि कहते हैं कि उन्हें उन लोगों ने धोखा दिया, जिन पर यकीन किया, उन्हें 16 सितंबर 2004 को गिरफ्तार किया गया, जेल में डाला गया और उनके मुताबिक, भयंकर यंत्रणा दी गई। श्री मक़बूल भारत के अशांत कश्मीर क्षेत्र में खोजी पत्रकार के तौर पर जीवन निर्वाह कर रहे थे।

श्रीनगर : साहिल मक़बूल अपनी स्नेही मुस्कान के साथ झिझकते हैं, ऐसी अतिसंवेदनशीलता उन लोगों में खासकर देखी जा सकती है, जिन्होंने या तो बहुत ज्यादा सार्वजनिक अपमान सहा हो अथवा निजी त्रासदी। उन्होंने दोनों को बर्दाश्त किया है। 44 वर्षीय कश्मीरी पत्रकार और कवि कहते हैं कि उन्हें उन लोगों ने धोखा दिया, जिन पर यकीन किया, उन्हें 16 सितंबर 2004 को गिरफ्तार किया गया, जेल में डाला गया और उनके मुताबिक, भयंकर यंत्रणा दी गई। श्री मक़बूल भारत के अशांत कश्मीर क्षेत्र में खोजी पत्रकार के तौर पर जीवन निर्वाह कर रहे थे।

“मैंने अपना सब कुछ खो दिया,” श्रीनगर में एक हाउसबोट के प्रतीक्षाकक्ष में बैठे श्री मक़बूल कहते हैं, सुबह का वक्त है और उनके पीछे सूर्योदय की किरणें डल झील पर बिखर रही हैं। “मैंने अपने स्त्रोत, संपर्क खो दिए। आप इन चीजों की कदर समझ सकते हैं। मैंने तो अपना वो पारिवारिक घर तक खो दिया, जिसका मैं सालों से रखरखाव कर रहा था। मेरा कैमरा, लैपटॉप, पासपोर्ट हर चीज़ चली गई।”

श्री मक़बूल उन भारतीय पत्रकारों और संपादकों की फेहरिस्त में शामिल हैं, जिनका दावा है कि उन्हें अपना काम करने की एवज़ में जेल में डाल दिया गया। गत वर्ष राजनीतिक कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी को गिरफ्तार किया गया, जिसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया, लेकिन श्री मक़बूल सरीखों के मामले बामुश्किल सुर्खियां बटोर पाए हैं।

कश्मीर का हरा-भरा पर्वतीय क्षेत्र भारत और पाकिस्तान के दोनों ओर फैला है और दोनों ही देश पूरे क्षेत्र पर अपना-अपना दावा ठोकते हैं। कानून प्रवर्तन प्राधिकारियों और भारतीय हुकूमत से आज़ादी चाहने वाले कश्मीरियों के बीच अकसर तनाव हिंसा में तब्दील होता है। श्री मक़बूल की गिरफ्तारी वाले वर्षों में, खास तौर पर कश्मीर का मुख्य शहर श्रीनगर अशांत था।

एक धर्मपरायण मुस्लिम, श्री मक़बूल कहते हैं कि शुक्रवार जुम्मे की नमाज़ के बाद एक दोपहर उन्हें भारतीय सेना के साहिल मकबूलबादामी बाग़ दफ्तर के बाहर गिरफ्तार कर लिया गया। बादामी बाग भारी सैन्य ठिकानों से आबाद श्रीनगर का एक छावनी इलाका है। श्री मक़बूल कहते हैं कि उर्दू अखबार “चट्टान” में काम करने के दौरान उनका एक सैन्य जनसंपर्क अधिकारी से परिचय था, जिन्होंने श्री मक़बूल को अपने कार्यालय आने का न्योता भेजा था, इस दिखावे के साथ कि आर्मी अखबार में एक विज्ञापन छपवाना चाहती है। “चट्टान” कम स्टाफ वाला एक अखबार है, जो बहु-भूमिकाओं के लिए अपने कर्मचारियों का इस्तेमाल करता है।

भारतीय आर्मी के एक प्रवक्ता ने श्री मक़बूल के दावे के बारे में किसी जानकारी से इन्कार कर दिया। जिस जनसंपर्क अधिकारी की तरफ श्री मक़बूल ने इशारा किया था, उन तक टिप्पणी के लिए नहीं पहुंचा जा सका। चाय की चुस्कियों के बीच कार्यालय में एक घंटा इंतज़ार करने के बाद, श्री मक़बूल कहते हैं कि आखिरकार उन्हें बैरंग लौटा दिया गया। जैसे ही वे छावनी के प्रवेश मार्ग, जिसे राजेन्द्र सिंह गेट कहा जाता है, से आगे बढ़े, उन्हें साधारण कपड़े पहने पांच लोगों ने आंखों पर पट्टी बांधकर एक जीप में फेंक दिया गया। श्री मक़बूल दावा करते हैं कि क्योंकि वो इस इलाके में खोजी पत्रकारिता करते थे, लिहाज़ा उन्होंने पहचान लिया कि ये सेना के जवान थे।

श्री मक़बूल कहते हैं कि इसके बाद उन्हें हरी निवास ले जाया गया। कभी ये स्थानीय महाराजा का निवास हुआ करता था और डल झील के नज़दीक एक सुरम्य स्थान था, मानवाधिकार समूह, जम्मू और कश्मीर नागरिक समाज गठबंधन के कार्यक्रम संयोजक खुर्रम परवेज़ कहते हैं कि आतंकवाद के चरम वर्षों, 1997 से 2007, में ये जगह आर्मी का पूछताछ केन्द्र बन गई थी। सेना उस दौरान हरी निवास का इस्तेमाल संदिग्धों से पूछताछ हेतु करती थी, इस आरोप पर टिप्पणी से सेना ने इन्कार कर दिया।

आर्मी श्री मक़बूल से पूछताछ की जानकारी से इन्कार करती है। आर्मी के एक प्रवक्ता ने कहा कि पूरे इलाके में आतंकवादी गतिविधियों में आई कमी के कारण श्रीनगर के पूछताछ प्रकोष्ठ अब इस्तेमाल नहीं किए जाते। “ये अतीत की बातें हैं, जो अब धीरे-धीरे समाप्त हो गई हैं क्योंकि कश्मीर ने ज्यादा शांत दौर में प्रवेश कर लिया है,” उन्होंने कहा, जब उनसे इन चैंबरों में यंत्रणा के आरोपों पर सवाल किया गया।

इस तरह के पूछताछ प्रकोष्ठ अब भी पूरे श्रीनगर में सक्रिय हैं और इन्हें पर्दे में रखने उद्देश्य से इनकी जगहें लगातार बदली जाती हैं, मानवाधिकारों का ये दावा सेना के वर्णन से पृथक है। उदाहरण के लिए श्री परेवज़ और उनका संगठन फिलहाल जम्मू-कश्मीर में कथित यंत्रणाओं पर एक रिपोर्ट तैयार कर रहा है, जिसमें निजी अनुभव और मेडिकल रिकॉर्ड शामिल हैं।

श्री मकबूल ने एक साक्षात्कार में कहा कि बतौर पत्रकार उन्होंने हरी निवास का दौरा किया था और कहते हैं कि उन्होंने सफेदी की उखड़ी हुई पपड़ियों से जगह को पहचान लिया। वह दावा करते हैं कि औपचारिक तौर पर जासूसी का मामला दर्ज करने से पहले उन्हें सशस्त्र सैन्य विशेषाधिकार अधिनियम, अशांत क्षेत्र में सैनिकों की मानवाधिकार हनन के अभियोगों से हिफाज़त करने वाला कानून, के तहत करीब पंद्रह दिनों तक जेल में रखा गया था।

आर्मी ने श्री मक़बूल पर 2001 में पाकिस्तान यात्रा के दौरान वहां की खुफिया एजेसीं से मिली-भगत का आरोप लगाया। श्री मक़बूल ये कहते हुए इस बात से इन्कार करते हैं कि उनकी यात्रा का उद्देश्य पाकिस्तान के लिए भारत के कब्ज़े वाले कश्मीर को छोड़ने वाले प्रवासियों के साक्षात्कार करना था। आर्मी के एक प्रवक्ता ने श्री मक़बूल के इन आरोपों पर टिप्पणी से इन्कार कर दिया कि उन्होंने पाकिस्तान की यात्रा साक्षात्कारों के सिलसिले में की थी।

पाकिस्तानी खुफिया एजेसीं आईएसआई, इंटर-सर्विसेज़ इंटेलिजेंस, की एवज़ में जासूसी के आरोपों में गिरफ्तारी के पूरे नौ दिन बाद उन पर अभियोग लगाया गया। जम्मू-कश्मीर सेन्ट्रल जेल में अभियोग के पश्चात भेजे जाने से पहले, शुरुआती पूछताछ के दौरान श्री मक़बूल आरोप लगाते हैं कि उनके साथ मारपीट की गई, उनके हाथ छत पर टांग दिए गए और पैरों की मांस-पेशियों को रोलर से कुचला गया। श्री मक़बूल के मुताबिक, जिस अधिकारी ने पूछताछ की, वो एक आर्मी अफसर था, जिसे वो खोजी पत्रकार के रूप में काम करने के कारण पहचान गए। वह दावा करते हैं कि जब तक उन्हें जेल भेजा गया, तब तक वो चलने-फिरने में अक्षम हो चुके थे।

आर्मी प्रवक्ता ने दावा किया कि आज की तारीख में कश्मीरी जेलों में इतने कठोर ढंग से पूछताछ नहीं की जाती। “मैं किसी विशिष्ट मामले पर टिप्पणी नहीं कर सकता,” अफसर ने कहा, “लेकिन ऐसा केवल खतरनाक आतंकवादियों के साथ ही किया जाता है।”

श्री मक़बूल की कहानी की प्रमाणिकता हेतु किसी तरह के मेडिकल रिकॉर्ड्स प्रस्तुत नहीं किए जा सके। उनका वर्णन इस क्षेत्र में जेल में होने वाले दुर्व्यवहार के उन्हीं मामलों सरीखा है, जिनके बारे में स्थानीय लोग और अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार समूह सूचित करते हैं। उदाहरण के लिए, दो स्थानीय मानवाधिकार समूहों (मानवाधिकारों के लिए अंतर्राष्ट्रीय सार्वजनिक न्यायालय और भारतीय कश्मीर में न्याय और गायब लोगों के अभिभावकों का संगठन) द्वारा तैयार, “तथाकथित अपराधकर्ता:जम्मू और कश्मीर में दंडाभाव की कहानियां”, नाम की रिपोर्ट में अपहरण, यातना और न्यायिक हिरासत में मौत के करीब 214 मामलों का उल्लेख है, जिन्हें जेलों में नहीं बल्कि अस्थायी थानों अथवा पूछताछ प्रकोष्ठो में अंजाम दिया गया।

ज़मानत मिलने से पहले श्री मक़बूल ने जम्मू-कश्मीर सेन्ट्रल जेल में तीन साल, चार महीने बिताए। गिरफ्तारी के आठ साल बाद भी वो ट्रायल का इंतज़ार कर रहे हैं। श्री मक़बूल को लगता है कि उनकी रिपोर्टिंग की संवेदनशील प्रकृति ही उनकी गिरफ्तारी की वजह रही। “मैं भ्रष्टाचार, हिरासत में मौतों, मुठभेड़ों जैसे मुद्दों पर लिख रहा था,” श्री मक़बूल कहते हैं। “मैं मानवाधिकार हनन, विशेष रूप से, आर्मी द्वारा किए जाने वाले, पर फोकस कर रहा था” उन्होंने आगे जोड़ा। श्री मक़बूल जिस काम का हवाला देते हैं, वो दैनिक उर्दू भाषी अखबार “चट्टान” में प्रकाशित हुआ।

श्री मक़बूल का दावा कि आर्मी पत्रकारों को निशाना बनाती है, पर जब आर्मी प्रवक्ता से सवाल किया गया, तो उन्होंने जवाब में कहा कि स्थानीय प्रेस के साथ संबंध “बहुत प्रगाड़” हैं। उन्होंने इस पर विस्तार से कुछ नहीं कहा। श्री मक़बूल अकेले कश्मीरी पत्रकार नहीं, जिन्हें उक्त आरोपों के चलते जेल हुई। 45 वर्षीय इफ्तिखार गिलानी की “माई डेज़ इन प्रीज़न”; उनके एक सम्मानजनक पत्रकार होने से लेकर कथित जासूसी के आरोप में तिहाड़ जेल में बिताए वक्त का संस्मरण है।

श्री गिलानी, जो फिलहाल “डेली न्यूज़ ऐंड एनालिसिज़” के लिए रिपोर्टिंग करते हैं, 2002 में एक स्थानीय अखबार “कश्मीर टाइम्स” में काम करने के दौरान गिरफ्तार किए गए। श्री मक़बूल की तरह श्री गिलानी भी अर्से से कश्मीर में सैन्य ऑपरेशन को कवर कर रहे थे।

“जब उन्हें एहसास हुआ कि मैं एक पत्रकार हूं और पता चला कि मैं क्या लिखता हूं, उन्होंने मुझपर सख्ती बरतना शुरू कर दिया,” उन्होंने कहा। सेना ने श्री गिलानी की गिरफ्तारी और पूछताछ से जुड़े प्रश्नों पर टिप्पणी से इन्कार कर दिया।

दिल्ली के बाशिंदे श्री गिलानी को आखिरकार शहर के तिहाड़ जेल भेज दिया गया, वो दावा करते हैं कि वहां उनके साथ मारपीट की गई, उन्हें यातनाएं दी गईं और उस कमीज़ से मल साफ करने को कहा गया, जिसे उन्हें लगातार तीन दिनों तक पहनाए रखा गया, ये कुछ एक घटनाएं हैं जिनका उन्होंने अपने संस्मरण में हवाला दिया हैं। “सुधारों को लेकर की जाने वाली बकवास पर यकीन मत कीजिए,” वह कहते हैं। “तिहाड़ दुनिया का सबसे खराब जेल है।”

तिहाड़ जेल के एक प्रवक्ता सुनील गुप्ता ने तिहाड़ दौरे पर कहा था कि व्यक्तिगत मामलों पर बात नहीं की जा सकती, लेकिन तिहाड़ में यातनाएं पूरी तरह निषिद्ध हैं। लेकिन श्री मक़बूल के विपरीत श्री गिलानी आठ महीनों के अंदर-अंदर आरोप खारिज होने के बाद जेल से छूट गए। वो इसके पीछे कश्मीर टाइम्स के सक्रिय समर्थन की बात कहते हैं, जिन्होंने उनकी रिहाई के लिए लॉबी की। अखबार की कार्यकारी संपादक अनुर्ता भसीन ने ये कहते हुए श्री गिलानी के बयान की पुष्टि की कि श्री गिलानी की आज़ादी के लिए कश्मीर टाइम्स से जो बन पड़ता था, उसने किया।

श्री मक़बूल को अपने संगठन से ऐसा समर्थन नहीं मिला। “मैं बदकिस्मत था,” श्री मक़बूल “चट्टान” का हवाला देते हुए याद करते हैं। “सेना के दबाव में, उन्होंने चुप्पी साध ली।”

“चट्टान” के वरिष्ठ संपादक ताहिर मोहिद्दीन ने श्री मक़बूल की पीढ़ा पर दुखी मन और स्वेच्छा से बोला। “उनके खिलाफ आरोप थे, लेकिन उनकी पुष्टि नहीं हुई,” श्री मोहिद्दीन दावे के साथ कहते हैं कि उनकी गिरफ्तारी के वक्त अखबार से जो बन पड़ा, उसने किया।

“हमने विभिन्न अधिकारियों से संपर्क किया और उनकी एवज़ में दलीलें दीं,” वह कहते हैं।

जम्मू-कश्मीर में जेलों के महानिदेशक 51 वर्षीय नवीन अग्रवाल कहते हैं कि अगर ये बात सही है, तो दुखदायी है, श्री मक़बूल पर लगे आरोप कभी सिद्ध नहीं हो पाए। “यंत्रणा के कथित मामले प्रांत की दोनों प्रमुख जेलों में नहीं हुए,” उन्होंने कहा। श्री अग्रवाल संहेदास्पदों पर औपचारिक तौर पर अभियोग अथवा दोषसिद्धि के बाद अथवा ट्रायल का इंतज़ार कर रहे कैदियों के कारावास हेतु उत्तरदायी हैं।

श्री मक़बूल ने अपने वृत्तांत, “द डार्कनेस इनसाइड” में जेल में बिताए वक्त के बारे में लिखा, जो उर्दू में है। एक बार जब वे जम्मू-कश्मीर की सेन्ट्रल जेल में आ गए, जहां यंत्रणा के खिलाफ नियामकों का कठोरता से निरीक्षण किया जाता है, श्री मक़बूल दावा करते हैं कि उन्हें कारावास में ये दौर काफी प्रिय लगा, उन्होंने इस दौरान लेखनी और प्रार्थना पर फोकस किया।

“मैंने जेल को लाइब्रेरी में तब्दील कर दिया,” वह गर्वोक्ति से कहते हैं।

श्री मकबूल एक बार फिर पत्रकारिता के क्षेत्र में उतर आए हैं, वो उर्दू अखबार “पुकार” में काम करते हैं। श्री मकबूल स्थानीय रेडियो और टेलीविज़न में एक शो की मेज़बानी भी करते हैं। लेकिन उनके लिए घाव भरने की प्रक्रिया काफी धीमी रही है और वो अब भी खुद को बेदाग साबित करने का इंतज़ार कर रहे हैं।

अमेरिकी लेखक माइकल एडीसन हेडन की यह रिपोर्ट दी वाल स्ट्रीट जर्नल में प्रकाशित हुई है. माइकल एडीसन हेडन इन दिनों मुंबई में रहते हैं.

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