: कानाफूसी : नईदुनिया में ६५ साल तक जिस परिवारवाद का बोलबाला रहा उसका जागरण समूह ने ४ महीने मे जनाजा निकाल दिया। नईदुनिया के स्टाफ के साथ अब एक नया धोखा हो रहा है। नईदुनिया के सभी संस्करण के लोगों से अपरैजल फॉर्म भरवाया जा रहा है, जो कि हर साल नईदुनिया प्रबंधन भी भरवाता रहा है, लेकिन इस बार फर्क ये है कि इसके साथ एक और फॉर्म भरवाया जा रहा है, जो 'मणीसाना वेतन आयोग' से सम्बंधित है। २ पन्ने के इस फॉर्म का मज़मून इंग्लिश में है, जिसे स्टाफ को पढ़ने भी नहीं दिया जा रहा। इसका लब्बो-लुआब ये है कि नईदुनिया का कोई भी कर्मचारी 'मणीसाना' के मुद्दे पर अदालत नहीं जा सकता।
इस फॉर्म पर दस्तखत करने के बाद 'मणीसाना' सम्बन्धी सारे अधिकार वो जागरण प्रबंधन को दे देगा। आशय ये है कि नईदुनिया के लोगों को न तो वेतन आयोग का लाभ मिलेगा ना ही वे अदालत जा सकेंगे। इस अधिकार-पत्र पर दस्तखत कराने के लिए ही साथ मे अपरैजल फॉर्म भरवाया जा रहा है, जो कि नाटक है, क्योकि, जो अपरैजल फॉर्म दिया गया है वो ही सबसे बड़ा झूठ है। अपरैजल फॉर्म पर पिछला साल (२०११-१२) दर्ज है। साथ ही 'नईदुनिया मीडिया प्राइवेट लिमिटेड' भी छपा है, जबकि जागरण समूह के हाथ बिकने के बाद नईदुनिया लिमिटेड कंपनी बन गया है। इन्क्रीमेंट के लोभ मे लोग दस्तख़त कर भी रहे हैं, कोई आवाज़ नहीं निकाल रहा, क्योंकि नौकरी जो करना है। इसकी जिम्मेदारी विनय छजलानी के ख़ास मनीष शर्मा को दी गयी है।
एडिटोरियल में कोई आवाज़ नहीं निकाले इसके लिए इंदौर में संपादक जयदीप कर्णिक सक्रिय हैं। कारण ये भी है कि मनीष और जयदीप को विनय छजलानी के बाद अब जागरण प्रबंधन के सामने अपनी वफादारी साबित करना है, और इससे अच्छा मौका और कौन सा मिलेगा। ध्यान देने वाली बात ये भी है कि पत्रकारों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने वाले और जयप्रकाश आन्दोलन से निकले प्रधान संपादक श्रवण गर्ग भी जागरण प्रबंधन के सामने कमर झुकाकर खड़े हैं, इसलिए कि नौकरी बचाने कि चिंता उन्हें भी सता रही है।
एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.