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”मधुबनी में मनीष भारतीय के खिलाफ साजिश करने वाले पत्रकार जीत गए”

मीडिया की नौकरी में जितना ग्लैमर है उतना ही यह क्षेत्र विडंबना भरा भी है. कुछ न करो और बैनर का इस्तेमाल सिर्फ दलाली के लिए करो तो आप पर नामर्द व दल्ले का ठप्पा चस्पा दिया जाता है. वहीं सच्चाई छाप कुछ अच्छा करने की जहमत उठाओ तो विवादों में पड़ना तय है. चाहें वह कथित विवाद मीडिया के खार खाए साथी पैदा करें या फिर उनके उकसावे पर नेता व उनके कुछ समर्थक. किसी छोटे मुद्दे को लेकर भी संपादक से शिकायत करने व अखबार की बदनामी के लिए उसकी कुछ प्रतियां जलाना आम बात हो चली है.

मीडिया की नौकरी में जितना ग्लैमर है उतना ही यह क्षेत्र विडंबना भरा भी है. कुछ न करो और बैनर का इस्तेमाल सिर्फ दलाली के लिए करो तो आप पर नामर्द व दल्ले का ठप्पा चस्पा दिया जाता है. वहीं सच्चाई छाप कुछ अच्छा करने की जहमत उठाओ तो विवादों में पड़ना तय है. चाहें वह कथित विवाद मीडिया के खार खाए साथी पैदा करें या फिर उनके उकसावे पर नेता व उनके कुछ समर्थक. किसी छोटे मुद्दे को लेकर भी संपादक से शिकायत करने व अखबार की बदनामी के लिए उसकी कुछ प्रतियां जलाना आम बात हो चली है.

कुछ दिन पहले बिहार के मधुबनी जिले में प्रशांत प्रकरण को लेकर विवाद में रहे हिंदुस्तान दैनिक के तत्कालीन स्थानीय प्रभारी मनीष भारतीय भी इससे अछूते नहीं हैं. राज्य के मुजफ्फरपुर जिले के छोटे से प्रखंड औराई से आनेवाले मनीष कभी कुढ़नी प्रखंड से हिंदुस्तान के लिए लिखते थे. यह उनकी प्रतिभा ही है कि ढाई वर्ष पहले उन्हें प्रबंधन ने मधुबनी का प्रभारी बनाकर भेजा था. कस्बाई पत्रकारिता से जुड़ा कोई भी व्यक्ति इस बात से भली-भांति वाकिफ होगा कि एक अखबार में बतौर जिला प्रभारी काम करना कितना दुरूह कार्य है. वह भी दूसरी जगह विपरीत परिस्थितियों में. ऐसे वक्त में जब प्रिंट मीडिया में स्थापित होने के लिए शुद्ध भाषा टाइपिंग व पजिनेशन की जानकारी निहायत ही जरूरी है.

इन चीजों से अंजान मनीष एक ग्रामीण संवाददाता होने के नाते केवल कलम से लिखना जानते थे. पर उन्होंने अपनी काबिलियत की बदौलत चुनौती को अवसर में बदला. उन्होंने ना केवल टाइपिंग व पेजिनेशन पर पकड़ मजबूत की बल्कि मधुबनी टीम को भी कसा. तमाम अवरोधों के बावजूद मनीष ने अपने कार्यकाल में मधुबनी में हिंदुस्तान को एक नई ऊंचाई दी. इस ढाई वर्ष में जिले में अख़बार का प्रसारण 13000 से बढ़कर 23000 हो गया.

लेकिन कहा गया है ना कि सफलता के साथ ही जलने वालों की संख्या बढती जाती है. दरअसल मधुबनी की पत्रकारिता में आबादी की लिहाज से एक खास तबका शुरू से ही हावी रहा है. इन्हीं में से कुछ स्थानीय कलमची कम परिजीवी नहीं चाहते थे कि दूसरी जगह का लड़का यहाँ तरक्की करें. क्योंकि सवाल धंधे का फीका पड़ने को लेकर था. वे मनीष को बदनाम करने के लिए मौके की तलाश करते रहे. और करत-करत अभ्यास… की तर्ज पर प्रशांत प्रकरण में उनका मंसूबा पूरा हुआ. अखबार जला, खिलाफ में नारे लगाए गए, प्रसार संख्या घटने का शिगूफा उछाला गया. और अंततः मनीष भारतीय का निलंबन. यह और बात है कि तमाम अटकलों के बावजूद भी मधुबनी में मनीष के चाहने वालों की भी कमी नहीं है.

इस पूरे मामले में हिंदुस्तान, मुजफ्फरपुर प्रबंधन बधाई का पात्र है जिसने मनीष की प्रतिभा व अखबार के लिए उनकी अहमियत को देखते हुए उन्हें बरखास्त नहीं किया. कुछ दिन पहले ही भड़ास पर यह खबर आई थी कि मनीष को हिंदुस्तान,मोतिहारी का सह प्रभारी बनाया गया है. यह सही है कि मधुबनी,हिंदुस्तान के प्रभारी रहे मनीष का तबादला वहां हुए कथित विवाद के बाद कर दिया गया. लेकिन हिंदुस्तान,मोतिहारी में भी वे बतौर कार्यालय प्रभारी ही कार्य करेंगे ना कि सहायक बनकर.

उपरोक्त विश्लेषण सौरव श्रीकांत का है.

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