२६ मई को सुविख्यात कवियत्री स्व. महादेवी वर्मा के रामगढ़ आवास पर जनसत्ता के वरिष्ठ पत्रकार अम्बरीश कुमार ने एक छोटे से कार्यक्रम के लिए बुलावा भेजा. वहां जाकर मालूम हुआ कि ये आयोजन दबंग पत्रकार अलोक तोमर की याद में किया जा रहा है, जो कि अक्सर यहाँ आते रहते थे. उन्होंने यहाँ बसने का इरादा भी कर लिया था, पर वो कहीं और जा बसे. अम्बरीश जी की कोशिशों से यहाँ, साहित्यकार विभूति नारायण, न्यूज़ २४ के अजीत अंजुम, आउटलुक की गीता श्री, सीएनबीसी के अलोक जोशी, संतोष, मयंक सक्सेना, आशुतोष, नैनीताल से प्रयाग पांडे, छतीसगढ़ से राजकुमार सोनी आदि ने अलोक तोमर को अपनी अपनी दिल की गहराइयों से याद किया.
हिंदी भाषा और पत्रकारिता पर नए पुराने विचार सामने आये. किस तरह से अलोक तोमर अपने शब्दों का जाल बुनते थे और कैसे वो पत्रकारों की दुनिया में अलग दिखलाई देने लगे. सिख दंगों और सफ़दर हाश्मी की हत्या के बाद अलोक तोमर की लेखनी पर, प्रभाष जोशी से उनके संबंधों पर खासी चर्चा हुई. मेरे लिए ये सौभाग्य की बात थी कि मुझे इन सब के बीच अलोक तोमर जी के एक लेख के जरिये अपनी बात कहने का मौका मिला कि कैसे केबीसी १ की स्क्रिप्ट ने विफलता से जूझ रहे अमिताभ बच्चन को फिर से
घर-घर का दुलारा बना दिया. चर्चा का समापन इस बात पर हुआ कि आलोक जी रामगढ़ में बसना चाहते थे. लिहाजा उनकी याद यहाँ हमेशा बनी रहे और हिंदी पत्रकारिता को और ताकत देने के लिए विभूति नारायण जी के माध्यम से कोई नयी पहल की जाये.
लेखक दिनेश मानसेरा उत्तराखंड के टीवी जर्नलिस्ट हैं. इन दिनों एनडीटीवी के लिए नैनीताल में कार्यरत हैं.





