दैनिक जागरण, बस्ती से खबर है कि अपने वरिष्ठों की मिजाजपुर्सी नहीं कर पाने की कीमत रत्नेश शुक्ल को चुकानी पड़ रही है. बताया जा रहा है कि महाराजगंज से बस्ती के प्रभारी बनाए गए महेंद्र तिवारी की इनपुट हेड संजय मिश्रा से काफी पटती है. संजय की पहल पर ही तबादला नीति को दरकिनार करते हुए महेंद्र तिवारी को लगातार जिलों का प्रभार मिलता रहा है. संजय ने ही अपने भांजे विश्व दीपक त्रिपाठी को महाराजगंज का प्रभारी बनवाया तथा महाराजगंज के प्रभारी महेंद्र तिवारी को बस्ती का प्रभार दिला दिया.
सूत्रों का कहना है कि संजय मिश्रा बस्ती के रिपोर्टर रत्नेश से काफी समय पहले से ही खार खाए हुए थे. रत्नेश को उन्होंने अतीत में फ्री के कई काम सौंपे लेकिन वे पूरा नहीं कर पाए. बताया जा रहा है कि इसकी वजह से रत्नेश शुरू से ही महेंद्र तिवारी के प्राइम टार्गेट पर थे. इसी बीच एक स्कूल में आग लगने की छपी खबर की शिकाय लेकर प्रबंधक समेत तीन लोग जागरण के कार्यालय पहुंचे. उस समय प्रभारी महेंद्र तिवारी, रत्नेश समेत कुछ और कर्मचारी मौजूद थे. प्रबंधन ने महेंद्र के सामने ही रत्नेश पर तमाम तरह के आरोप लगाने लगे. जब महेंद्र ने कोई विरोध नहीं किया तो रत्नेश ने प्रबंधक को सही तरीके से बात करने तथा उनकी शिकायत प्रभारी से करने को कहा.
बताया जा रहा है कि इतना सुनते ही महेंद्र प्रबंधक को चुप कराने की बजाय रत्नेश पर ही भड़क गए तथा प्रबंधक के सामने ही उन्हें उलटा सीधा कहने लगे. तिवारी ने बाहरी लोगों के सामने ही रिपोर्टर को बेइज्जत करना शुरु कर दिया. रिपोर्टर ने इस पर कुछ कहना चाहा तो प्रभारी ने नौकरी ले लेने की धौंस दे दी. इतना ही रहता तो गनीमत थी, कुछ देर बाद फील्ड में रिपोर्टर के निकलते ही तिवारी ने अपने आका गोरखपुर यूनिट के इनपुट हेड संजय मिश्रा व संपादकीय प्रभारी उमेश शुक्ल को पहले फोन पर रिपोर्टर के बारे में जमकर उल्टी सीधी जानकारी दी. फिर मेल चला दी. संजय मिश्रा ने देर शाम को रिपोर्टर को फोन किया और अकल ठिकाने लगाने की घुड़की दी और तीन जून को संपादक के सामने हाजिर होने का हुक्म सुनाया.

वो खबर, जिसको लेकर बवाल शुरू हुआ
सूत्रों ने बताया कि रिपोर्टर ने अनुरोध किया कि उसके बेटे की तबियत खराब है तो इसे अनसुना कर दिया गया. तीन जून को बस्ती कार्यालय पहुंचे रिपोर्टर को जिला प्रभारी ने बताया कि संपादक का हुक्म है कि उनसे मिले बिना तुम्हें काम करने की इजाजत नहीं मिलेगी. रिपोर्टर ने फिर मजबूरी बताई लेकिन तिवारी नहीं माने. इसी उधेडबुन में फंसा रिपोर्टर किसी नतीजे पर पहुंचता कि उसके मोबाइल पर संपादक उमेश शुक्ल का फोन आ गया. सूत्रों का कहना है कि संपादक ने रत्नेश को ही उल्टा सीधा बोलते हुए कहा कि तुम तिवारी को गोली मारने की धमकी दे रहे हो. बेटा चुटकी बजाते ही नौकरी ले लूंगा, सिर से जागरण का बैनर हटेगा तो तुम्हारी औकात कुत्ते से बदतर हो जाएगी.
बताया जा रहा है कि रिपोर्टर ने अपनी तरफ से पूरी सफाई देने तथा पक्ष रखने की कोशिश की परन्तु संपादक कुछ भी सुनने को तैयार नहीं हुए. संपादक ने फिर धमकी दी कि अगर बस्ती कार्यालय की सीढ़ी पर भी कदम रख दिया तो मुकदमा दर्ज करवा दूंगा और उससे पहले इतनी लात पड़वा दूंगा कि सारी हेकड़ी भूल जाओगे. संपादक के इस तेवर ने रिपोर्टर को सन्न कर दिया. उधर तिवारी ने कुछ बाहरी लोगों को अपनी हिफाजत के लिए बुलवा लिया. उन्हीं बाहरियों में से एक शाम को रिपोर्टर के घर जा पहुंचा और घर वालों से रिपोर्टर के बारे में पूछताछ की और लौटने से पहले धमकी दी कि कह देना तिवारी से ना टकराए वरना किसी लायक नहीं रह जाएगा.
इधर, तिवारी ने ग्रामीण क्षेत्र के प्रतिनिधियों को रिपोर्टर के खिलाफ तैयार करने की हरसंभव कोशिश छेड़ दी है. बेचारे रत्नेश के पिता का बीते 11 मई को ही निधन हुआ है, उसके बावजूद ये कथित पत्रकार सारी संवेदनाओं को ताक पर रख दिए हैं. बस्ती कार्यालय महेंद्र तिवारी के पहुंचते ही जंग का अखाड़ा बन गया है. बताया जा रहा है कि महाराजगंज में भी अखबार की ऐसी तैसी करते हुए महेंद्र तिवारी ने दर्जनों लोगों की नौकरी ले ली थी, जिसका खामियाजा जागरण को सर्कुलेशन गंवाकर चुकानी पड़ी थी.
इस पूरे मामले में जब रत्नेश से बात करने की कोशिश की गई तो उन्होंने कुछ भी बताने से इनकार करते हुए कहा कि जो भी होगा वे अपने संस्थान के उचित मंच और फोरम में इस बात को रखेंगे. वहीं महेंद्र तिवारी भी इस पूरे प्रकरण में यह कहकर बात करने से इनकार कर दिया कि मैं आपको जानता नहीं इसलिए मुझे कोई जानकारी आपको नहीं देनी है. संजय मिश्रा ने रत्नेश के बारे में पूछे जाने पर कहा कि न उन्हें हटाया गया है और ना ही बैठाया गया है. हालांकि अन्य सवालों का जवाब उन्होंने नहीं दिया. जब संजय मिश्रा को रिपोर्टरों से फ्री काम कराने के आरोपों के बारे में एसएमएस करके जानकारी मांगी गई तो उन्होंने उसका भी जवाब नहीं दिया.






