अजमेर जिले के तीर्थराज पुष्कर से विधायक राजस्थान की शिक्षा राज्य मंत्री नसीम अख्तर इंसाफ उस दिन पत्रकारों की हकीकत से बखूबी वाकिफ हो गईं, जब उनके भोज में दैनिक भास्कर के दो वरिष्ठ पत्रकार आपस में खूब भिड़े। जिले भर से रोटी खाने आए पत्रकारों और प्रेस फोटोग्राफरों के सामने हुए इस घटनाक्रम की राजनीतिक, प्रशासनिक और अखबारी जमात में खूब चर्चा है।
दरअसल इस भिड़ंत के मूल में भड़ास की एक खबर है। भास्कर के अजमेर संस्करण में कार्यरत एक पत्रकार अपनी नौकरी के साथ-साथ भास्कर के नाम का इस्तेमाल कर अपना एक साप्ताहिक अखबार भी चला रहा था। मजेदार बात यह है कि अखबार की छपाई भी भास्कर की प्रेस में ही हो रही थी और अखबार को तैयार भी भास्कर के ऑपरेटर ही कर रहे थे। पूरे शहर को इसकी जानकारी होते हुए भी भास्कर प्रबंधन मूक बना हुआ था।
भड़ास ने जब ‘भास्कर को चूना लगा रहा उसी का वरिष्ठ पत्रकार’ शीर्षक से खबर छापी तो भास्कर की आंखें खुली और उस पत्रकार को मौखिक आदेश से चलता कर दिया। भड़ास ने यह खबर भी छापी। पत्रकार अजमेर नगर परिषद के एक पूर्व अध्यक्ष और विधायकी के दावेदार समेत लखनऊ के एक बड़े अखबार के संपादक का लंगोटिया है। ऐसे में भास्कर से दबने का सवाल ही नहीं था। इसलिए भास्कर प्रबंधन के मौखिक आदेशों को चुनौती देते हुए चिट्ठी लिख मारी। शायद कानूनी कार्यवाही की धमकी वगैरह भी दी। जवाब में भास्कर प्रबंधन ने तबादला आदेश थमा दिया। अजमेर से सीधे छत्तीसगढ़ के रायगढ़। संदेश साफ था जाओ बेटा दादागिरी करनी है तो जरा नक्सली इलाके में करके दिखाओ। ज्वाइन करने के लिए 7 जून 2013 तक का समय दिया गया।
महिला मंत्री नसीम अख्तर चूंकि फिर से चुनाव लड़ने की दावेदार है, इसलिए उन्होंने पत्रकारों को खुश करने की खातिर अपने जन्मदिन के बहाने लंच पर आमंत्रित किया। पता नहीं कहां से टिकट की दावेदारी करनी पड़ जाए यह सोचकर जिले भर के पत्रकारों को न्यौता दिया गया था। भोज में पीड़ित पत्रकार का भास्कर के ही एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार से सामना हो गया। पीड़ित पत्रकार को शक था कि भड़ास की खबर, उसके साप्ताहिक अखबार, नौकरी, तबादले आदि के पीछे शायद वही पत्रकार है। आमना सामना होते ही टोक दिया, क्यों पड़ गई कलेजे में ठंडक, तसल्ली हो गई। मुझे निकालने के बाद तूने अगले दिन भास्कर में मिठाई बांटी आदि-आदि।
सामने से भी जवाब आया, अभी तो इतना दम रखता हूं, जिस दिन मिठाई बांटनी होगी नया बाजार की चौपड़ पर खडे़ होकर बांट सकता हूं। पीड़ित पत्रकार ने शहर भर में ढिंढोरा पीटने का आरोप लगाते हुए अपनी बात के समर्थन में एक कार डीलर का नाम लिया। सामने वाले पत्रकार ने हाथों हाथ कार डीलर को फोन लगा दिया। कार डीलर किसका बुरा बनता सो ना हां, हां ना कर उसने अपना पिंड छुड़ाया। भोज के साथ हो रहे इस रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम का कुछ पत्रकार मजा ले रहे थे तो कुछ के सिर शर्म से झुके जा रहे थे। बड़ी मुश्किल से बीच बचाव कर किसी तरह से दोनों को दूर किया गया।
भोज की आयोजक मंत्री और उनके राजनीतिक सलाहकार पति दोनों की स्थिति अजीब थी। वह पहले ही इस बात से चिंतित थे कि बुलाए चालीस-पचास और पहुंच गए सौ-सवा सौ। उन्हें अहसास हो गया कि पत्रकारों का खुफिया तंत्र कितना मजबूत होता है? पूरी जमात को भनक लग गई कि दाल-रोटी के साथ महंगा शॉल और फोटोफ्रेम भी है। उपर से दावत में अदावत। अगर कोई और होता तो बाहर धकिया देते परंतु क्या करें, पत्रकार हैं इन्हें तो उंची आवाजों के लिए उंची आवाज में टोक भी नहीं सकते थे?
अजमेर से एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.






