पत्रकार धीरज भारद्वाज फेसबुक पर लिखते हैं- ''य़े दास्तान है एक ऐसी संपादक की जिनका खाना कभी ताज होटल से आता था और वे महंगी कारों में घूमती थीं.. आज लंगर का खाना खाकर अपने दिन गुजार रही हैं.. दिलचस्प बात ये है कि एक पत्रकार की इस बदहाली को उस चैनल ने दिखाया है जो खुद ही सैकड़ों मीडियाकर्मियों को बदहाली के रास्ते पर धकेल चुका है.. ''
मतलब ये कि मीडियाकर्मियों को जो खुद बदहाली के रास्ते पर चैनल धकेल चुका है, वह एक महिला संपादक की बुरी स्थिति के बारे में स्टोरी प्रसारित कर अपनी चिंता व सरोकार को प्रकट कर रहा था. यह कैसे संभव है? इस विरोधाभाष को क्या कहा जाए? चैनल पर प्रसारित स्टोरी इस लिंक पर क्लिक करके देख सकते हैं…
और, महिला संपादक की बदहाली की ये है पूरी कहानी…
कभी मैगजीन एडिटर थी,आज फुटपाथ पर करती है गुजारा
मुंबई। वक्त बलवान है, कब किसी को महलों में बैठा दे और कम फुटपाथ पर ला दे कौन जानता है। 65 वर्षीय सुनीता नायक ने भी कभी नहीं सोचा था कि उन्हें फुटपाथ पर सोना पड़ेगा और खाने के लिए वे गुरूद्वारे के लंगर पर निर्भर हो जाएंगी। एक दशक पहले मराठी की एक महिला मैगजीन की संपादक सुनीता ने पिछले दो माह से वर्सोवा स्थित गुरूद्वारा सचखंड दरबार के बाहर बने फुटपाथ को ही अपना घर बनाया हुआ है। पांच भाषाओं की ज्ञाता सुनीता आखिर मैले कपड़ों, टूटे हुए सेलफोन और अपने पालतू के साथ इन हालात में क्यों है। एक अंग्रेजी दैनिक समाचार को दिए साक्षात्कार में सुनीता ने बताया, "बहुत छोटी उम्र में मैंने माता-पिता को खो दिया था, लेकिन दोस्तों के प्रोत्साहन से मैंने पुणे यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया। दिन रात मेहनत कर मैं गृहलक्ष्मी मैगजीन की एडिटर बनी। मैगजीन का दफ्तर गिरगॉम में था, लेकिन कुछ साल पहले बंद हो गया।"
कभी थे तीन घर और दो गाड़ियां
नायक हमेशा से इतनी गरीब नहीं थी। 1980 के दशक में सुनीता के पास वर्ली में दो अपार्टमेंट थे और वे यहां वर्ष 2007 की शुरूआत तक रहती थीं। यही नहीं सुनीता के पास पुणे में पुश्तैनी बंगला भी था और उनके पास दो कारें थीं। नायक ने बताया, "1984 में मैंने पुणे वाला बंगला छह लाख रूपए में बेच दिया था। वर्ष 2007 में मैंने वर्ली वाले दोनों फ्लैट और दोनों कारें बेचीं। मुझे इससे 80 लाख रूपए मिले जिससे मैं ठाणे में किराए के बंगले में शिफ्ट हो गई। फिर अचानक मुझे पता चला कि मेरे सारे पैसे रहस्यमई तरीके से खत्म होते जा रहे थे। तब मैंने वर्सोवा में सस्ता किराए पर फ्लैट लिया और रहने लगी और उसके बाद हाल यह हुआ कि फुटपाथ पर आ गई। मैं यहां गुरूद्वारे से मिला लंगर खा कर गुजारा कर रही हूं। यह भले लोग हैं, इन्होंने मुझे यहां फुटपाथ पर रहने की इजाजत दी।"
नहीं पता कहां गया बैंक बैलेंस
फुटपाथ पर जीवन के लिए संघर्ष कर रहीं सुनीता नहीं जानती कि उनका बैंक बैलेंस कैसे उड़ गया, या इसके पीछे कोई गुनाह छिपा है। सुनीता ने कहा, "मुझे इस बारे में कुछ नहीं पता। हो सकता है कि मेरे पूर्व कर्मचारी कमल रेकर को इस बारे में कुछ पता हो। कमल बाई महालिन में एक छोटे से कमरे के मकान में रहती है और वह मेरे बैंक अकाउंट संभाला करती थी। उसने 15 साल तक मेरी देखभाल भी की है, लेकिन अब मैं उससे संपर्क नहीं कर पा रही हूं क्योंकि बारिश में भीगने से मेरा फोन खराब हो गया है।"
दोस्तों ने बढ़ाया हाथ पर शर्त के साथ
नायक के पास कुछ दोस्त और शुभचिंतक हैं। इनमें से कुछ ने मदद का हाथ भी बढ़ाया और उन्हें अपने घर में रहने का न्यौता दिया लेकिन एक शर्त पर। शर्त यह थी कि वे अपने साथ अपने बीमार पालतू डॉग को नहीं ला सकतीं, लेकिन नायक कहती हैं कि वे उसे कैसे छोड़ दें जिसने उनका साथा 12 सालों तक निभाया। सुनीता ने कहा, "मैं पढ़ी लिखी हूं, पांच भाषाएं जानती हूं। मुझे कोई नौकरी मिले तो मैं अपना जीवन फिर से शुरू करना चाहती हूं।" सुनीता के पुराने पड़ोसी विनोद पारकर ने पुष्टि की है कि सुनीता के पास जयंत अपार्टमेंट्स में दो फ्लैट थे।
साभार- पत्रिका






