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महुआ ग्रुप की इमोशनल ब्लैकमेलिंग : आंदोलनरत पत्रकारों का दो टूक जवाब

 

महुआ न्यूज़लाइन के पत्रकारों के आंदोलन का दूसरा दिन यादगार रहा। न्यूज़रूम में अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे पत्रकारों ने अपनी धार और तेज़ कर दी है। सोमवार को पूरे दिन आंदोलनरत पत्रकार ज़मीन पर बैठे थे और वे इस बात अड़े थे कि किसी भी स्तर की बातचीत न्यूज़रूम में सबके बीच होगी। प्रबंधन के दूतों ने पूरी कोशिश की कि पत्रकारों के प्रतिनिधि बंद कमरे में महुआ समूह की वर्तमान प्रमुख मीना तिवारी से बात करें। लेकिन आर-पार की लड़ाई लड़ रहे पत्रकारों ने इससे साफ इनकार कर दिया। आखिरकार प्रबंधन को झुकना पड़ा।

 

महुआ न्यूज़लाइन के पत्रकारों के आंदोलन का दूसरा दिन यादगार रहा। न्यूज़रूम में अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे पत्रकारों ने अपनी धार और तेज़ कर दी है। सोमवार को पूरे दिन आंदोलनरत पत्रकार ज़मीन पर बैठे थे और वे इस बात अड़े थे कि किसी भी स्तर की बातचीत न्यूज़रूम में सबके बीच होगी। प्रबंधन के दूतों ने पूरी कोशिश की कि पत्रकारों के प्रतिनिधि बंद कमरे में महुआ समूह की वर्तमान प्रमुख मीना तिवारी से बात करें। लेकिन आर-पार की लड़ाई लड़ रहे पत्रकारों ने इससे साफ इनकार कर दिया। आखिरकार प्रबंधन को झुकना पड़ा।
 
भारी दबाव के बीच चैनल की कमान संभाल रहीं मीना तिवारी को पत्रकारों की अदालत में पेश होना पड़ा। यहां आते ही वो रो पड़ीं। अपनी मुश्किलों की फेहरिस्त गिनाने लगीं। लेकिन ऐसा करते हुए करोड़ों की समूह की मालकिन होने का उनका अहंकार फूट पड़ा। वो ऐसी बातें कह गईं कि खुद को लेकर बजाय सहानुभूति के उन्होंने माहौल ही खराब कर दिया।
 
उन्होंने जिन पंक्तियों का इस्तेमाल किया…ज़रा उसका मजमून देखिए।‘मैं इतनी मुश्किल में हूं और आप ये सब कर रहे हैं आपको शर्म नहीं आती‘, ‘मैं कहां से दूं पैसे..कहां से लाऊं पैसे‘,‘एक महीने की आपकी बकाया सैलरी दे रही हूं…क्या वो कम है..एक महीने में तो आप नौकरी खोज ही सकते हैं..इतने से आपकी कितनी मदद होगी आपने ये बात सोची है?’…….क्रोध के आवेग को भावुकता के मुलम्मे में पेश कर रहीं महुआ ग्रुप की मालकिन इस अंदाज़ में ये सब कह रही थीं जैसे वो दो महीने की जगह 1 महीने की बकाया सैलरी देने का ऐलान करके अहसान कर रही हैं।
 
उनका न्यूज़रूम के नाम संबोधन लंबा खिंच रहा था और इसी बीच पत्रकार अपना धीरज खोते जा रहे थे। कुत्ते की तरह जलालत की भाषा सुनते-सुनते जब धैर्य जवाब दे गया..तो फिर मीना तिवारी को ऐसे जवाब सुनने पड़े जिसकी उन्हें शायद कोई उम्मीद नहीं रही होगी। उन्हें एक पत्रकार ने कहा- ‘आप अपने संस्थान का सामान बेचिए और पैसे चुकाइए, मर्सिडीज बेचिए, बीएमडबल्यू बेचिए, बिल्डिंग बेचिए..जो करना हो करिए…हमें पैसे चाहिए..आपसे सहानुभूति थी अब नहीं है क्योंकि आपने 125 लोगों को नहीं,.. उनके परिवारों को सड़क लाने का काम किया है,..उनकी दिक्कतों के बारे में आपने नहीं सुना…इसलिए आपके दुख से हमें मतलब नहीं‘। कुछ पत्रकार आपे से बाहर थे। सुनाने का सिलसिला आगे ही बढ़ता गया- एक ने कहा -‘ये अहंकार का अंदाज, ये अहसान की भाषा और ये धमकी भूल जाइए, पत्रकारों को पहचान लीजिए उनकी ताकत समझ लीजिए और बताइए क्या करने जा रही हैं,..कब तक फैसला लेने जा रही हैं।‘लेकिन जवाब मजबूरी के रोने के रूप में ही मिला। फिर उनके सिपाहसालारों ने मैदान संभाला लेकिन माहौल भांपकर फिर दुबक गए। मीना तिवारी इस सवाल का जवाब नहीं दे पाईं कि आखिर पी के तिवारी के जेल जाने के तुरंत बात चैनल बंद करने की उन्हें जल्दबाजी क्यों हुई?
 
पंद्रह मिनट के इस एपिसोड में वो सब हुआ जिसकी कल्पना महुआ के प्रबंधन ने चैनल बंद करते वक्त नहीं की होगी। कड़े प्रतिरोध का मीना तिवारी पर कोई असर होता नहीं दिखा..उनके तेवर नरम नहीं हुए.. वो पांव पटकती हुई वापस लौटने लगीं..जाते-जाते धरने पर बैठीं दस के लगभग महिला पत्रकारों की तरफ इशारा करते हुए कहा‘यूं ही पड़े रहो’।
 
इस पूरी घटना के बाद न्यूज़रूम का माहौल गरमा गया। लेकिन समूह के संपादक राणा यशवंत ने सबसे शांति बनाए रखने की अपील की। इसके बाद एक बार फिर प्रबंधन भारी दबाव के बीच कोई बीच का रास्ता निकालने की कोशिश में जुट गया। दूसरी तरफ आंदोलनरत पत्रकार सामूहिक चर्चा में जुट गए। न्यूज़चैनल खोलकर इसे एक झटके में बंद करने वाले ट्रैंड पर यहां जबर्दस्त चर्चा हो रही थी। इसमें भागीदारी करने वरिष्ठ पत्रकार राम बहादुर राय को आमंत्रित किया गया था। जिन्होंने पत्रकारों की मांगों को उनका हक करार दिया और कहा कि ये हर हाल में पूरी की जानी चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार अवधेश कुमार भी इस परिचर्चा में शामिल हुए। उन्होंने कहा कि वाजिब हक को संस्थान को हर हाल में पूरा करना होगा। इसके बाद कई संस्थानों के पत्रकार इस बहस में शरीक होने पहुंचे। जिससे आंदोलन का माहौल उत्साहपूर्ण बना रहा। न्यूज़लाइन की महिला पत्रकारों ने बहस को धार देते हुए कहा कि अब बहुत हुआ…आगे इस तरह से पत्रकारों को सड़क पर ला खड़ा करनेवालों को किसी भी हाल में बख्शा नहीं जाएगा।
 
उधर पत्रकारों का उत्साह कम होने का इंतज़ार कर रहे प्रबंधन को सोमवार शाम तक ये लगने लगा कि अब और देरी आत्मघाती होगी। क्योंकि बेरोजगार पत्रकारों के आवेदन ईपीएफ ऑफिस, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय, श्रम मंत्रालय और यूपी पुलिस मुख्यालय के साथ ही सीएम कार्यालय तक पहुंच चुके हैं। और मंगलवार से यहां प्रबंधन को वो सब कुछ भुगतना होगा जिसे बर्दाश्त करने लायक स्थिति उसकी नहीं है। इसलिए आनन-फानन में इस बात के संकेत दिए जाने लगे कि पत्रकारों की एकसूत्रीय मांग मानी जा सकती है। अब सबकी निगाहें मंगलवार पर टिकी हैं। दोस्तों..भरोसा रखिए कि मामला मंगलवार को सुलझ जाएगा…नहीं तो फिर अल्टीमेटम पर अमल किया जा सकता है। जिसका खामियाजा भुगतने लायक स्थिति महुआ समूह की नहीं है।
 
ये लड़ाई न किसी व्यक्ति से है, न संस्था विशेष से, ये उस मनमानी के खिलाफ एक संगठित विद्रोह है जिसे अब तक हम और आप अपने अब तक के पत्रकारीय जीवन में झेलते आए हैं। लेकिन अपनी आनेवाली पीढ़ी को भी हमें मुंह दिखाना होगा…जो इस पेशे में आते ही कह रही है कि ग़लती हो गई। बहुत बड़ी गलती हो गई। ऐसा इसलिए क्योंकि दूसरे की आवाज़ उठाने का दम भरनेवाले हम पत्रकारों ने अपने हक पर हमले पर ज्यादातर बार हाथ खड़े किए और सब कुछ सह लिया। पर अब और नहीं। घड़ा भर चुका है और वो घड़ी आ चुकी है कि पत्रकारों को कुचलने की कोशिश करनेवालों की बाहें मरोड़ दी जाएं। लड़ाई जारी है और हम जीत कर ही दम लेंगे। समर्थन के लिए आप सबका आभार। – जयहिन्द
 
महुआ न्‍यूज लाइन के पत्रकारों द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.
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