कुछ खुश हैं. कुछ नाराज़. कुछ आक्रोशित. भड़ास 4 मीडिया के संचालक और संपादक यशवंत सिंह की गिरफ़्तारी यहाँ बहसतलब है. नॉएडा पुलिस ने एक बनावटी मामले में उन्हें गिरफ्तार कर लिया है. बनावटी क्यों? क्योंकि, यशवंत पर जो आरोप लगाये गए हैं, वे कत्तई सही नहीं हैं. झूठे हैं. पुलिसिया भाषा में लिखे गए हैं. फंसाने के लिए. क्या विनोद कापड़ी और उनकी दूसरी पत्नी साक्षी यशवंत को पहले से नहीं जानते थे? अगर जानते थे, तो यह बनावटी घटनाक्रम क्यों?
सीधे कह देते क़ि यशवंत ने उनसे रंगदारी मांगी है. दो बाइक सवार लड़के. एक का भागना. पुलिस का जाल बिछा कर पकड़ना. शर्म कीजिये. जिन पत्रकारों ने भड़ास को अपना मुखपत्र बनाया, उन्ही ने ऐसी खबर चलाई. घिन्न आती है, ऐसी कौम पर. अख़बारों के मालिक तो उनका विरोध करेंगे ही, क्योंकि वह शख्स अख़बार मालिकों के शोषण के खिलाफ लिखता रहता था. दफ्तरों में भड़ास खोलने-पढने पर प्रतिबन्ध है. फिर भी प्रोक्सी से खोलकर भड़ास पढ़ते थे पत्रकार. फिर भी उनकी गिरफ़्तारी का विरोध नहीं? आश्चर्य है.
मोहल्ला वाले अविनाश से सुबह बात हो रही थी. फ़ोन पर. उन्होंने बताया क़ि उन्हें किसी महिला पत्रकार ने बताया है क़ि यशवंत डासना जेल भेज दिए गए हैं. इसके ठीक बाद जब मैंने यशवंत के सहायक अनिल को फ़ोन मिलाया तो पता चला क़ि अभी जमानत की अर्जी दाखिल की जाने वाली है. संजय तिवारी समेत कई लोग मौजूद हैं वहां पर. बाद में शाम 4 बजे अदालत ने उनकी जमानत अर्जी रद्द कर दी. फिर उन्हें डासना जेल ले जाया गया.
जाहिर है यह अखबार मालिकों और पुलिस के गठजोड़ की सोची-समझी साजिश थी. जब जमानत की अर्जी दाखिल ही नहीं हुई, तो उस पत्रकार महोदया को पता कैसे चला क़ि यशवंत जेल भेज दिए गए हैं. ऐसी कई बातें हैं. कई सवाल हैं एक बार सोचिये दोस्तों. आज अगर चुप बैठ गए, तो कल हमारी बारी आने वाली है. बेहतर होगा क़ि सड़क पर विरोध किया जाये पुलिस के खिलाफ. और अदालत में देश का अच्छे से अच्छा वकील खड़ा किया जाये, ताकि जमानत मिल सके. बाद में इस लड़ाई को मुकाम तक पहुँचाने की जरुरत है. सच सामने आना चाहिए.
बची बात शराब पीने की तो हम सब शराबी हैं. शराब पीते हैं. हाँ संभव है यशवंत शराब के नशे में कुछ उलुल जुलूल हरकते करते हों, लेकिन यहाँ यह बात प्रासंगिक नहीं है. अगर उनके शराब पीने के कारण मुकदमा हुआ होता या ऐसा कुछ आरोप भी होता तो हम इस पर बहस कर लेते. ऐसा नहीं है. लिहाजा, अनुरोध होगा क़ि इस विषय को यही छोड़ दें.
एक बात और. मैं यह लेख आपने नाम से नहीं लिख रहा. नाम लिखूंगा, तो नौकरी जाएगी. नौकरी बचानी इसलिए आवश्यक है, क्योंकि, इसी से घर चलता है. हाँ, आप सब और यशवंत मुझे माफ़ कर देंगे. मैं इस कौम का एक रीढविहीन सदस्य हूँ. पत्रकारिता क़ी नौकरी में रीढविहीन होना आज नौकरी चलने की पहली और सबसे महत्वपूर्ण शर्त है. अपील यह क़ि यशवंत के पक्ष में खड़े हों. आज इसकी जरूरत है. वरना जिस वैकल्पिक मीडिया की हम बात करते हैं, उसका कोई मतलब नहीं रह जायेगा.
(लेखक बिहार के एक युवा पत्रकार हैं. एक बड़े अखबार में बड़े पद पर हैं. नाम सार्वजनिक नहीं करने की उन्होंने विनम्र अपील की है. उन्होंने यह एक जुलाई 2012 को लिखकर मेल किया था.)
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