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मायावती और मुलायम की एक लाइलाज बीमारी

: बेशर्मों का महल : इससे शर्मनाक भला और क्या हो सकता है? जिस प्रदेश में किसान भूख से आत्महत्या कर रहे हों! पूर्वांचल में दस हजार से अधिक बच्चे दिमागी बुखार से मर जाएं क्योंकि उनके इलाज के लिए लगने वाले टीके एवं अन्य संसाधन सरकार के पास नही हैं। वहां के सूबे की पूर्व मुख्यमंत्री अपने बंगले की साज-सज्जा पर सौ करोड़ रुपये खर्च करे दें। इसे गरीबों का मजाक उड़ाना कहा जायेगा या समाज का नाकारापन कि वह ऐसे नेताओं को ढोने पर मजबूर है जिनका गरीबों और वंचितों से कोई सरोकार नही बचा है। यह सिलसिला क्या यूं ही चलता रहेगा?

: बेशर्मों का महल : इससे शर्मनाक भला और क्या हो सकता है? जिस प्रदेश में किसान भूख से आत्महत्या कर रहे हों! पूर्वांचल में दस हजार से अधिक बच्चे दिमागी बुखार से मर जाएं क्योंकि उनके इलाज के लिए लगने वाले टीके एवं अन्य संसाधन सरकार के पास नही हैं। वहां के सूबे की पूर्व मुख्यमंत्री अपने बंगले की साज-सज्जा पर सौ करोड़ रुपये खर्च करे दें। इसे गरीबों का मजाक उड़ाना कहा जायेगा या समाज का नाकारापन कि वह ऐसे नेताओं को ढोने पर मजबूर है जिनका गरीबों और वंचितों से कोई सरोकार नही बचा है। यह सिलसिला क्या यूं ही चलता रहेगा?

मायावती का जादुई बंगला यूं भी लोगों के लिए कम कौतूहल का विषय नही रहा है! उनकी अपार संपदा के किस्से कहानियां सालों से फिजा में तैरती रहीं हैं। मगर किसी की इतनी हैसियत नही थी कि वह इस जादुई बंगले के निकट भी जाने की जुर्रत करे। इस बंगले की तरफ जाने वाले सभी रास्ते बंद थे! उधर जाने वालों को भी इतनी शक भरी निगाहों से देखा जाता था कि मानो वह कोई आतंकी वारदात करने जा रहे हैं।

अब जब शिवपाल सिंह यादव की जनसूचना पर राज्य सम्पत्ति विभाग ने जो जानकारी उपलब्ध कराई है वह न सिर्फ चैंकाने वाली है बल्कि सबको शर्मिंदा करने वाली भी! अपने को दलित की बेटी कहने वाली इस नेत्री के आलीशान भवन में दो खिड़कियों का खर्च ही तीस लाख रुपया आया है। एक एक बाथरूम को सत्रह-सत्रह बार तोड़ा गया। लाइन से इस भवन में लॉकर लगवाये गये हैं। महंगे गुलाबी ग्रेनाइट से चमचमाते फर्श इस प्रदेश के उन बेसहारा लोगों का मजाक उड़ाते फिरते हैं जिनके पास खाने को पैसे नही हैं। वह अपने बच्चे को तड़प-तड़प कर मरते हुए देखते रहते हैं क्योंकि उनके पास अपने बच्चे के इलाज को पैसे नहीं हैं। जिस शख्स को उन्होंने इन परेशानियों को दूर करने की जगह चुना था उसने इन गरीबों, वंचितों, दलितों की परेशानी को दूर करने के लिए अपना मकान सौ करोड़ से अधिक का बनाने की सोची ताकि वह दिखा सके कि राजसी ठाट-बाट क्या होते हैं।

मगर यह ठाट किसको दिखाये होंगे मायावती ने? विधायकों और मंत्रियों की इतनी हैसियत नहीं थी कि वह इस बंगले के भीतर जा सकें। बाहरी तरफ हाल बना दिया गया था। नेताओं की एंट्री एक बाहरी गेट से उस हाल तक होती थी और वहीं से उन्हें बैरंग लौटा दिया जाता था। मीडिया का हाल भी कुछ इससे ज्यादा बेहतर नहीं था। नेताओं की तरह उनकी भी एंट्री इसी हाल तक सीमित थी। इससे आगे बढ़ने की इजाजत किसी को नही थी। मायावती के दूसरे बंगले का हाल भी इससे कम जुदा नहीं था।

कभी-कभी तो समझ ही नहीं आता कि राजनेताओं की बुद्धि इतनी भ्रष्ट क्यों हो जाती है? उन्हें इस बात का एहसास क्यों नही रहता कि जनता ने उन्हें बहुत उम्मीदों के साथ चुना है। इससे लगता है कि उसके चुने हुए प्रतिनिधियों की जब सरकार बन जायेंगी। तब उसकी परेशानियों का निदान हो जायेगा। मगर हकीकत में उसके नेता बिल्कुल विपरीत हैं। सत्ता में आने के बाद राजनेताओं को सिर्फ और सिर्फ अपने स्वार्थ ही याद आते हैं। उसे जनता की परेशानियों से कोई सरोकार नहीं रहता। उन लोगों से भी नहीं जो अपनी जान की बाजी लगाकर चुनाव लड़ाते हैं। सिर्फ और सिर्फ पैसा कमाना ही मानो मुख्य उद्देश्य बन जाता है हमारे राजनेताओं का। मायावती के बंगले के यह सौ करोड़ दरअसल इस प्रदेश के बीस करोड़ लोगों के मुंह पर तमाचा है।

हम सब इतने नपुंसक कैसे हो जाते हैं कि हमारी आंखों के सामने बैठकर यह राजनेता हमारे पैसे से ही लूटकर अपना साम्राज्य बनाते और उसे बड़ा करते जाते हैं और हम सब बस बैठकर देखते रहते हैं कि किस तरह कर्ज न चुका पाने के कारण हमारे किसान आत्महत्या करते जाते हैं। यह दर्द तब और बढ़ जाता है जब हम देखते हैं कि पूर्वांचल में पिछले कुछ सालों से दिमागी बुखार से दस हजार से ज्यादा बच्चे मर गये। अगर दुनिया के किसी भी हिस्से में एक ही बीमारी से इतने बच्चे मर गये होते तो हाहाकार मच जाता। मगर यह बच्चे गरीबों के बच्चे थे। इनके माता-पिता इस हैसियत के नहीं थे कि वह किसी का वोट बैंक होते लिहाजा उन्हें असहाय तरीके से छोड़ दिया गया ताकि वह अपने बच्चे को मरते हुए देखें।

आप कल्पना कीजिए तो आपका दिल दहल जायेगा। पूर्वांचल में अगर किसी बच्चे को बुखार चढ़ता है तो उसके माता-पिता रोना शुरू कर देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि अब उनका लाडला बच नहीं पाएगा। लखनऊ में स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी संभाल रहे मंत्री और अफसर हजारों करोड़ का घोटाला करके उसकी रकम तो ऊपर तक पहुंचाते रहे मगर इन बच्चों के इलाज की कोई बेहतर व्यवस्था नहीं कर पाये। हमारे शासक यह भी नहीं कर पाये कि इस बीमारी को अगर जड़ से खत्म न कर पाये तो वहां बच्चों का कोई बड़ा अस्पताल ही बनवा दें। बड़े अस्पताल से ज्यादा जरूरी उनके लिए अपना बड़ा बंगला बनवाना था। सवाल सिर्फ मायावती का नही है। सवाल उस मानसिकता का भी है जो सत्ता संभालते ही शासकों के मन में खुद ब खुद पैदा होती है।

इसी मानसिकता की उपज के चलते मुलायम सिंह सैफई में हजारों करोड़ रुपये के स्टेडियम, एयरपोर्ट, मेडिकल कॉलेज बनवा डालते हैं तो मायावती को अपना गांव बादलपुर भी सोने जैसा बनवाने का जूनून चढ़ता है। सोनिया गांधी को भी लगता है कि अगर यूपी में एम्स खुलता है तो वह सिर्फ अमेठी या रायबरेली में ही खुले क्योंकि वहां के लोग उन्हें जिताकर संसद में भेजते हैं।

यह एक खतरनाक शुरुआत है अगर इस पर रोक नहीं लगाई गयी तो यह एक भयंकर बीमारी का रूप ले लेगी। इसलिए जरुरी है कि वक्त रहते इसका इलाज किया संजय शर्माजाए। हमारे चाहने से भला क्या होगा जैसे जुमले छोड़कर अपना सार्वजनिक विरोध हर मंच पर दर्शाना ही होगा जिससे भविष्य में कोई भी शासक गरीबों की लाश पर ऐसा महल खड़ा करने की हिम्मत न जुटा सके।

लेखक संजय शर्मा लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार हैं. हिंदी वीकली न्यूजपेपर वीकएंड टाइम्स के संपादक हैं.

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