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मायावती का जाना तय, केवल दलित वोट से बसपा की सरकार नहीं बनेगी

लखनऊ का चर्चित अंबेडकर पार्क। 40 से 50 एकड़ में फैला यह पार्क कई मायनों में अदभुत है। अरबों की सरकारी राशि से तैयार इस पार्क और इसमें बने हाथी, मायावती, कांशीराम और स्तूपों की कलाकृतियां चाहें जो भी हो, इतना तय मानिए कि इतिहास सदा मायावती की इस कृति को याद रखेगा। माया के इस कला प्रेम के पीछे का सच चाहे जो भी हो, लेकिन एक सच तो यह है कि जब सदियां बदलेंगी, भूगोल में परिवर्तन होगा और नई सभ्यता, संस्कृति का उदभव होगा, तो माया का यह अंबेडकर पार्क तब के लोगों को आज के इतिहास, माया संस्कृति और उसके शिल्प से परिचय कराएगा। लखनऊ का यह अंबेडकर पार्क स्थानीय लोगों के लिए दर्शनीय तो है ही, यह आधुनिक राजनीतिक वाद-विवाद का केंद्र भी है।

लखनऊ का चर्चित अंबेडकर पार्क। 40 से 50 एकड़ में फैला यह पार्क कई मायनों में अदभुत है। अरबों की सरकारी राशि से तैयार इस पार्क और इसमें बने हाथी, मायावती, कांशीराम और स्तूपों की कलाकृतियां चाहें जो भी हो, इतना तय मानिए कि इतिहास सदा मायावती की इस कृति को याद रखेगा। माया के इस कला प्रेम के पीछे का सच चाहे जो भी हो, लेकिन एक सच तो यह है कि जब सदियां बदलेंगी, भूगोल में परिवर्तन होगा और नई सभ्यता, संस्कृति का उदभव होगा, तो माया का यह अंबेडकर पार्क तब के लोगों को आज के इतिहास, माया संस्कृति और उसके शिल्प से परिचय कराएगा। लखनऊ का यह अंबेडकर पार्क स्थानीय लोगों के लिए दर्शनीय तो है ही, यह आधुनिक राजनीतिक वाद-विवाद का केंद्र भी है।

पार्क के किसी कोने में दर्जनों छात्रों का आपस में राजनीतिक बहस करना, आज की राजनीति की कलई खोलता है। पार्क के किसी कोने में बूढ़े, नौजवान, महिलाओं का जमावड़ा और फिर मायावती की लूट पर बहस सुनकर आप दंग रह सकते हैं। प्रदेश की चुनावी राजनीति में घपले-घोटालों पर जितने तर्क आप यहां सुन सकते हैं, वह कहीं और नहीं मिलेगा। इसी पार्क से पांच किमी की दूरी पर सचिवालय है, जहां से मायावती सूबे में शासन चलाती हैं और अपनी गद्दी से उठकर अपने आवास पर चली जाती हैं। अंबेडकर पार्क से सीएम आवास की दूरी चार किमी है। मायावती का यह सीएम आवास आधुनिक भारत के तमाम मुख्यमंत्री आवास से विलग है। गोमती नगर के इस इलाके से जब मुख्यमंत्री मायावती गुजरती हैं, तो उससे पहले जिस तरह सड़कों की सफाई होती है, कहीं और ऐसा नहीं देखा जाता। पहले सड़कों की मशीन से सफाई, फिर सड़कों पर पानी की बौछार। इसके बाद 100 गाड़ियों की फ्लीट के साथ मायावती की सवारी निकलती है। जनता की सेवा के लिए।

इसी पार्क में संवाददाता की मुलाकात तीन ऐसे लोगों से हुई, जो अपने बाल-बच्चों के साथ यहां घूमने पहुंचे थे। बातचीत हुई, तो पता चला कि यह तीनों सज्जन प्रदेश के ग्रामीण विकास से जुड़े इंजीनियर थे। कहने लगे कि चुनाव में जो भी हो जाए, इतना मान लीजिए कि पैसे के दम पर फिर बसपा की ही सरकार बनेगी। उन्होंने एक घटना के बारे में बताया। इन तीनों को अंबेडकर ग्राम का विकास करने का जिम्मा दिया गया, लेकिन टेंडर से पहले ही मायावती सरकार के लोगों ने एडवांस रकम की मांग की। आपको बता दें कि गांव के बाहर अंबेडकर गांव का बोर्ड लग गया और गांव में कोई काम नहीं हुआ। एक इंजीनियर ने यहां तक कहा कि जब कोई महिला पैसे के पीछे पड़ जाती है, तो वह आगे-पीछे नहीं देखती। ऐसा ही उत्तर प्रदेश में हो रहा है।

चुनाव के इस मौसम में माया के भ्रष्टाचार की कहानी पर बहस बेमानी होगी। 24 से ज्यादा मंत्री बर्खास्त हैं और 700 से ज्यादा अधिकारी जांच के घेरे में। मायावती पर इस पूरे खेल का कोई असर नहीं है। बाबा रामदेव और उसकी टीम मायावती के भ्रष्टाचार पर चाहे जो भी अलख जगाए, अन्ना हजारे भ्रष्टाचार और जनलोकपाल पर चाहे जो भी रट लगाएं, मायावती को अपनी ‘करनी’ पर पूरा विश्वास है और यकीन है अपने दलित समाज पर। मायावती के वर्तमान, अतीत और भविष्य के बारे में जितनी चर्चा इस अंबेडकर पार्क की दीवारों में पैबस्त हो रही है, वही माया सरकार और मायावती का इतिहास हो सकता है। मायावती ने 2007 से अब तक सूबे को क्या दिया और सूबे को क्या मिला? इस पर चर्चा अभी बेमानी है। सबसे पहले चर्चा के केंद्र बिंदु अंबेडकर पार्क से आइए आपको दिखाते हैं, उत्तर प्रदेश की राजनीति का असली चेहरा और चुनावी गणित का गुणा-भाग।

तमाम तरह की चुनावी राजनीति और खेल पर इस चुनाव के दौरान चर्चा होगी, लेकिन लखनऊ का यह चर्चित अंबेडकर पार्क चीख-चीखकर यही संदेश दे रहा है कि सूबे का यह चुनाव महासमर 25 बनाम 75 के बीच है। सूबे में 25 फीसदी दलितों की आबादी है और बाकी के 75 फीसदी में अगड़ी-पिछड़ी और मुस्लिम समाज। तो क्या मान लिया जाए कि 25 फीसदी आबादी के बल पर सत्ता पर काबिज मायावती को 75 फीसदी का समाज कुर्सी लेने के लिए बेचैन है? क्या कांग्रेस, सपा और भाजपा ऐसा ही सोच रही हैं? सामाजिक चिंतक अश्विनी त्रिपाठी कहते हैं कि मायावती के कुशासन से जनता परेशान है। सूबे में विकास का माहौल तभी बनेगा, जब बसपा की सरकार समाप्त होगी।

अगर इस चुनव में बसपा के वोटरों के विलग कोई भी राजनीतिक पार्टी कई जमात के वोटरों को इकट्ठा कर 25-30 फीसदी वोट इकट्ठा कर लेती है, तो माया से सूबे को छुटकारा मिल सकता है, लेकिन ऐसा दिख नहीं रहा है। जो भी पार्टियां चुनाव में शामिल हैं, उसके पास माया की तरह इकट्ठा वोट बैंक नहीं है। ऐसे में फिर मिली-जुली सरकार बनने की संभावना दिख रही है। उधर, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रीता बहुगुणा इन बातों से अलग विचार रखती हैं। वह कहती हैं कि हमें सूबे को आगे ले जाना है और हम सरकार बनाने जा रहे हैं। भ्रष्टाचार में डूबी सरकार से जनता तबाही के कगार पर है। ऐसे में कांग्रेस की तरफ जनता देख रही है। इस बार यहां सत्ता बदलेगी और एक जागरूक सरकार बनेगी। आप देखते जाइए, क्या-क्या होने जा रहा है।

राजनीति के इस पूरे खेल में युवा वोटरों की निर्णायक भूमिका होगी। वही तय करेगा सूबे की अगली राजनीति का भविष्य। चाहें कांग्रेस के राहुल गांधी युवाओं को आगे लाने में लगे हों या फिर सपा के अखिलेश यादव युवाओं को गोलबंद करने में सफल रहे हों, युवा ही इस सूबे की राजनीति तय करने जा रहे हैं। इस पर हम बहस करेंगे, लेकिन सबसे पहले सूबे की जातीय गणित पर एक नजर डालते हैं। यह जातीय गणित इसलिए देखने की जरूरत है, क्योंकि वक्त के साथ इस गणित में टूट-फूट हो रही है अब तक आज जो जातियां एक के पाले में थीं, आज दूसरे के साथ चिपकती नजर आ रही हैं या फिर कई दलों में बंटती दिख रही हैं।

सूबे में अति पिछड़ी जातियां सबसे ज्यादा हैं और इन जातियों पर कई दलों की राजनीति चल रही है। आंकड़ों में देखें, तो सूबे में यादव 19.4 फीसदी, कुर्मी 7.46 फीसदी, लोध 4.9, गड़रिया 4.43, केवट 4.33, मोमिन 4.15, तेली 4.03, जाट 3.60 और अन्य ओबीसी 47.7 फीसदी हैं। इसके अलावा अगड़ी जातियों में ठाकुर नौ फीसदी, वैश्य चार फीसदी, ब्राह्मण 11 फीसदी और कायस्थ एक फीसदी हैं। 16 फीसदी मुस्लिम और 25 फीसदी दलित आबादी को इस पूरे आंकड़ों में जोड़ दें, तो कुल 100 फीसदी जातीय गणित आपके सामने है।

पिछले चुनाव में मायावती ने दलित, ब्राह्मण और मुस्लिम के गठजोड़ से सत्ता में आकर एक नई सोशल इंजीनियरिंग का खेल दिखाया था, लेकिन इस बार ऐसा कुछ भी नहीं है। ब्राह्मण, मायावती से विलग हैं और सभी राजनीतिक पार्टियों को शक की निगाह से निहार रहे हैं। ब्राह्मणों की यही चुप्पी न सिर्फ मायावती बल्कि तमाम राजनीतिक दलों को परेशान कर रही है। कांग्रेस ब्राह्मणों को जोड़ने के प्रयास में लगी है, लेकिन अभी ब्राह्मणों का जुड़ाव वहां नहीं हो पाया है। याद रखिए, अगर ब्राह्मण कांग्रेस के साथ चलेगा, तो सूबे की राजनीति में खेल हो जाएगा। मुस्लिम मतदाता का भी मायावती से मोहभंग हुआ है। मुस्लिम नेता सादिक कहते हैं कि मायावती ने मुस्लिम को यूज किया है। सपा और कांग्रेस को हम देख रहे हैं, लेकिन इस पूरे वातावरण में ब्राह्मणों, मुस्लिमों और पिछड़ी जाति से जुड़े युवाओं का रुझान कांग्रेस और सपा की तरफ ज्यादा बढ़ा है। आप कह सकते हैं कि दलितों में भी पढ़े-लिखे युवा अखिलेश यादव और राहुल से प्रभावित हैं।

प्रख्यात दलित चिंतक राजाराम कहते हैं कि दलितों पर मायावती कोई ‘उपकार’ नहीं कर रही हैं। दलितों ने ही उन्हें कुर्सी पर बैठाया है, लेकिन दलितों का शोषण आज भी सबसे ज्यादा है। यही वजह है कि आज के युवा दलित मायावती के प्रभाव में नहीं हैं। संभव है, इस चुनाव में वे अन्य दलों को वोट दे दें। लखनऊ इंजीनियरिंग कॉलेज के छात्र ददेश, सुकांत और मोहन प्रकाश, अखिलेश यादव की राजनीति के समर्थक हैं। मोहन कहते हैं कि अनपढ़ लोग जातीय राजनीति कर लें, लेकिन हमें ऐसी राजनीति नहीं चाहिए। भ्रष्टाचार में लिप्त चाहे जो भी सरकार हो, हम युवा उसका समर्थन नहीं कर सकते।

तो क्या मान लें कि बसपा की परेशानी बढ़ गई है। ऐसा कहा जा सकता है। लेकिन सबसे बड़ी बात है कि 16 फीसदी मुसलमानों में से जिस आठ फीसदी मुस्लिम और 11 फीसदी ब्राह्मण वोट के दम पर मायावती ने 206 सीटें पाकर सरकार बनाई थी, अब ऐसा नहीं है। हां, इतना जरूर है कि बसपा दलितों के 25 फीसदी वोट पर अभी भी कायम है और यही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। पिछले चुनाव में 30.43 फीसदी वोट पाकर बसपा को 206 सीटें मिली थीं, 8.61 फीसदी पाकर कांग्रेस को 22 सीटें मिलीं थी, 16.97 फीसदी वोट पाकर भाजपा ने 51 सीटें पाई थीं और 3.70 फीसदी वोट पर रालोद को 10 सीटें मिली थीं। लेकिन दो साल के बाद 2009 में लोकसभा चुनाव में पार्टियों के मिले मत प्रतिशत में भारी बदलाव देखे गए।

कांग्रेस को 18.25 फीसदी वोट के साथ 21 सीटें मिलीं, भाजपा को 17.50 फीसदी वोट पर 10 सीटें, बसपा को 27.42 फीसदी वोट पर 20 सीटें, सपा को 23.26 फीसदी वोट के साथ 23 सीटें और रालोद को पांच सीटें मिलीं। आप कह सकते हैं कि 2007 की तुलना में 2009 में सभी दलों के वोट प्रतिशत में बदलाव आ गए। बदलाव का यह सिलसिला अभी भी जारी है।


सपा के साथ यादवों और मुस्लिमों के वोट बैंक के साथ ही कुछ अगड़ी और कुछ अन्य पिछड़ी जातियों के भी वोट हैं। यह पहले भी था। मुलायम का यह वोट बैंक पहले की तुलना में और ज्यादा मजबूत दिख रहा है, लेकिन मुलायम को सबसे ज्यादा फायदा उनके पुत्र अखिलेश यादव के चेहरे का मिल रहा है। सपा ने अखिलेश यादव के चुने गए 75 उन युवाओं पर दांव खेला है, जिनकी उम्र 35 साल से नीचे है। इसके अलावा 80 युवा मुस्लिम चेहरों को टिकट देकर एक नई राजनीति की शुरुआत की है। सपा विधायक दीपनारायण यादव कहते हैं कि समाज को जिस तरह से जोड़ने का काम अखिलेश कर रहे हैं, उसके परिणाम व्यापक होंगे। उनके साथ ब्राह्मणों, दलितों, पिछड़ों और मुस्लिम युवाओं की फौज खड़ी हो गई है, यही फौज पार्टी की ताकत है। हम अभी सरकार बनाने में नहीं हैं। चुनाव जीतने में लगे हैं और देखिएगा, सपा की एक नई पहचान शुरू होगी।

गोमतीनगर, हजरतगंज से लेकर अन्य चौक, चौराहों पर गटागट कोक पीते युवाओं, युवतियों को आप टटोलें, तो उनके जेहन में एक नई राजनीति की गंध आती है। मनोहर शशांक सवाल करते हैं कि कौन देश के लिए सोच रहा है? अब तक तो किसी पार्टी ने नहीं सोचा। दो युवा राजनीति में दिख रहे हैं। राहुल और अखिलेश। इस पूरे खेल में भाजपा और बसपा कहीं नहीं दिखती। लोकतंत्र में हार-जीत किसी की भी हो सकती है, लेकिन हम युवा राजनीति करने वाले राहुल गांधी और अखिलेश पर यकीन कर रहे हैं।

उधर, राहुल गांधी की पूरी राजनीति युवाओं पर केंद्रित हो गई है। अगड़ी जातियों के वोट, मुस्लिम वोट, कुछ दलित वोट और यादव को छोड़कर अन्य पिछड़ी जातियों के वोट बैंक पर कांग्रेस की नजर है। कांग्रेस को कितनी सीटें मिलेंगी, इस पर बहस अभी बेमानी होगी, लेकिन जरूर इतना कहा जा सकता है कि चुनावी रेस में कांग्रेस, भाजपा से आगे बढ़ गई है और भाजपा से आगे है, तो आप इतना मान सकते हैं कि वह सरकार बनाने और बिगाड़ने की भूमिका निभाने जा रही है।

फिर यह सवाल कि क्या दलित बनाम अन्य जातियों की लड़ाई चल रही है? कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि दलितों का वोट तो अभी भी मायावती के पास है, लेकिन बसपा के साथ जो अन्य वोट बैंक थे, वह अब नहीं हैं। लेकिन सपा की राजनीति हो या कांग्रेस की या भाजपा की, इस चुनाव में मायावती का जाना तय है। केवल दलित वोट पाकर बसपा, सरकार नहीं बनाने जा रही है। तो फिर सरकार किसकी बनेगी? यह बड़ा सवाल अंबेडकर पार्क में उमड़-घुमड़ रहा है। सूबे की राजनीति को देखकर कहा जा सकता है कि जिस पार्टी के प्रति युवाओं का रुझान बढ़ेगा, वही सत्ता में आएगी। युवा ही प्रदेश की राजनीति तय करेंगे और यही वर्ग किसी की सरकार गिरा सकेंगे। इतना साफ है कि यहां न कोई अन्ना प्रभाव होगा, न मायावती का चार राज्य बनाने का खेल, न ही भ्रष्टाचार का मुद्दा।

वरिष्ठ पत्रकार अखिलेश अखिल का विश्लेषण.

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