: उत्तर प्रदेश में सरकारी मशीनरी की माफियागर्दी : उत्तर प्रदेश में मौजूदा सरकार और उसके प्यादे यूं तो रात दिन लूटपाट में जुटे हैं लेकिन कब किस शरीफ आदमी की इज्ज़त को तार तार कर दें ये कोई नहीं जानता। रिश्वतखोरी और निर्माण कार्यों से उगाही के दम पर लूट में जुटी उत्तर प्रदेश की सरकारी मशीनरी के खिलाफ जब जब किसी ने आवाज़ उठाई तब तब सरकारी मशीनरी ने माफिया की तर्ज पर करप्शन को उजागर करने वालों के साथ बर्ताव किया है।
चाहे स्वास्थ विभाग हो या फिर निर्माण विभाग, यहां के डाक्टरों से लेकर सचिव तक को हत्या या आत्म हत्या के दर्दनाक दौर से गुजरते हुए पूरे देश ने देखा है। स्वास्थ विभाग में मची लूट के दौरान तो कई कई डॉक्टरों की हत्या से बौखलाई माया सरकार से खास सिपहसालार शंशाक शेखर तक को मानना पड़ गया था, कि उत्तर प्रदेश के कई सरकारी विभागों में माफिया पनप चुका है।
उत्तर प्रदेश के हालात इतने बदतर हो चुके हैं कि शरीफ आदमी महज अपनी इज्जत बचाने के लिए खामोश है। जहां तक विपक्ष का सवाल है राहुल हो या मुलायम या फिर बीजेपी लखनऊ से लेकर सूबे के सड़को तक पर सपाइयो, काग्रेसियों और भाजपाईयों को मायावी पुलिस के डंडों ने दौड़ा दौड़ा कर इतना पीटा कि अब ये तमाम सियासी जमाते सिर्फ जुबानी बयान बाजी से आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं कर पा रही है। काग्रेसी युवराज आने वाले चुनावों की तैयारी के नाम पर सिर्फ जबानी जमा खर्च से ही काम चलाते दिख रहे हैं। चाहे भट्टा पारसोल हो या फिर कोई और मामला केद्र के दब्बुपने का ही नतीजा है कि उत्तर प्रदेश में सरकारी मशीनरी बेकाबू है, और अघोषिततौर पर इमरजेंसी जैसे हालात बन चुके है।
उत्तर प्रदेश सरकार के कई घोटालो को उजागर करने की सजा के तौर पर मई माह 2011 में खुद मेरे खिलाफ एक ही दिन में कई कई मुकदमे कई थानो में दर्ज करा कर उत्तर प्रदेश सरकार ने ये भी साबित कर दिया है मायवती के राज में प्रेस की आजादी की हकीकत क्या है। फिलहाल मेरे साथ हुए तमामा मामले जांच के दौर से गुजर रहे हैं और माननीय उच्च न्यायालाय इलाहाबद ने उत्तर सरकार की मनमानी पर अंकुश लगा कर हमे राहत दी है।
उत्तर प्रदेश में जो जिलाधिकारी, पुलिस कप्तान या अधिकारी जितना करप्ट, वो उतना ही बहन जी का चहेता है। बहरहाल फिलहाल मैं अपने साथ हुए अन्याय का जिक्र करने की बजाय देश के जाने माने पत्रकार भाई यशवंत के परिवार के साथ उत्तर प्रदेश सरकार के कुछ अधिकारियों की बदसलूकी और अपमान जनक रवय्ये की चर्चा रना चाहूंगां। ये सुनकर कि भाई यशवंत के भाई रविकातं को बदले की भावना से उत्तर प्रदेश पुलिस ने एक गंभीर आरोप में फंसा दिया है लगा कि अब शायद पानी सिर से ऊपर जा रहा है।
पिछले दिनो इसी परिवार को लगभग बर्बाद करने की नीयत से उत्तर प्रदेश पुलिस ने घर की महिलाओं तक को थाने में बैठा लिया था। उस घटना को याद करके आज भी शर्म से सिर झुक जाता है। क्या इसी दिन के लिए पत्रकारिता के लिए कलम उठाया था। जिस उत्तर प्रदेश पुलिस को अपराधी और शरीफ इंसान में भी फर्क ना रह जाए भला उसकी आत्मा को क्या कहें।
मेरे पास मौजूद दस्तावजों के आधार पर कहा जा सकता है कि उत्तर प्रदेश में फिलहाल ना आरटीआई की कोई अहमियत है, ना ही किसी जांच की और ना ही किसी शिकायत की। इतना ही नही करप्ट और रिश्वतखोर अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्यावाई करने के बजाए खुद सरकारी मशीनरी ही उनको बचाने में जुट जाती है। निर्माण कार्यो में लगातार घोटलों को बेनकाब करने के दौरान करप्ट तो सुरक्षित रहे जबकि करप्शन के खिलाफ आवाज उठाने वालों को ही झूठे मामलों में फ्सा दिया गया।
ऐसे में जुझारु पत्रकार यशवंत के परिवार के साथ हो रहे अन्याय को उत्तर प्रदेश सरकार की मनमानी के सबूत के तौर पर ही देखा जाएगा। दूसरों की आवाज बनने वाला यशवंत जिसकी नजर में आम आदमी हो या पत्रकार उसकी पीड़ा अपनी पीड़ा से बड़ी है। अगर किसी मीडिया हाउस ने किसी पत्रकार की सैलरी नहीं दी या किसी पत्रकार के साथ कोई अन्याय हुआ है तो यशवंत की आवाज़ सबसे पहले बुंलद होती देखी गई है।
जिन मीडिया हाउसों के सामने हर पत्रकार नौकरी की भीख की कतार में खड़ा नज़र आता है उन्ही मीडिया हाउसों को यशंवत अपने पत्रकार साथियों के हित के लिए गरियाता हुआ अक्सर देखा गया है। आज वही यशवंत अपने चचेरे भाई रविकांत सिंह और परिवार के सम्मान व अस्तित्व के लिए चौराहे पर खड़ा है।
एक कलम का सिपाही होने के नाते हम सभी पत्रकारो को चाहिए कि चचेरे भाई रविकांत सिंह पर गैंगस्टर लगाए जाने के जरिए यशवंत के साथ हो रहे अन्याय का विरोध करते हुए उनका साथ दें। अगर किसी भी साथी को यशंवत के परिवार की बेगुनाही या उत्तर प्रदेश सरकार की मनमानी पर शक हो तो अपने स्तर से अपने दिल की तसल्ली कर लें, अगर यशवंत का परिवार क्रिमनल हो, या उनका कोई अपराधिक इतिहास हो तो यशंवत का साथ देने के बजाए उत्तर प्रदेश पुलिस के साथ जाने को से कोई नहीं रोकेगा। लेकिन एक खामोश तमाशाई की तरह एक पत्रकार को बेबस होते देखना पत्रकारिता का सबसे बड़ा गुनाह है।
यशंवत के साथ जो कुछ हो रहा है उसके लिए ना सिर्फ पत्रकार बल्कि वकीलों, आरटीआई कार्यकर्ताओं, और समाज के हर तबके को खड़ा होना चाहिए। ताकि समाज में हर किसी को सम्मान से जीने का हक मिल सके। यशंवत के परिवार के ही नहीं बल्कि सभी पत्रकारों के आत्मसम्मान की रक्षा के लिए सभी पत्रकारो से अपील है कि उत्तर प्रदेश सरकार मनमाने रवय्ये के खिलाफ आवाज बुंलद करन के लिए उत्तर प्रदेश और दिल्ली की सीमा से लखनऊ तक मार्च के बाद मायावती निवास के सामने धरना दिया जाए। या फिर जो भी सभी साथियों की राय हो। लेकिन अब खामोश नहीं रहना चाहिए।
आखिर में एक बात मायावती से कहना चाहूंगा. आप चाहें जिस भी तरह की सियासी चाल चल लें, इस बार आपको बहुत मुश्किल पेश आने वाली है विधानसभा चुनाव में। आप चाहें एक राज्य का चार राज्य कर दें या सवर्णों को आरक्षण देने की बात कहें या जो भी बोलें बताएं, कहीं कोई असर नहीं होने वाला। वजह ये कि आपकी मशीनरी ने आम लोगों के गर्दन को लात रखकर इस कदर दबाया हुआ है कि सबसे पहले आम आदमी आपके शासन से मुक्ति चाहेगा और आंख बंद करके बसपा को हराने वाली पार्टी को वोट दे देगा। सत्ता विरोधी जिस लहर पर सवार होकर आप शासक बनीं, वही लहर आपको डुबो देगी, यह यकीन मानिए।
यह संभव था कि आपकी मशीनरी अगर इमानदार होती तो आप जरूर फिर बहुमत से जीतकर आ जातीं क्योंकि आपमें लोग एक संभावना देख रहे थे। लेकिन आपकी मशीनरी के भ्रष्टाचार और अत्याचार ने आम जनता के सपनों-भावनाओं को तोड़ डाला है। और, भ्रष्ट सिस्टम को जीने-संरक्षित करने का जो काम आप कर रही हैं, उसकी सजा आपको मिलनी ही चाहिए और आपके लिए यही सबसे बड़ी सजा है कि आपको अब पांच साल के लिए यूपी के शासन से बाहर कर दिया जाए। उलटी गिनती शुरू हो चुकी है मायावती जी। कुछ दिन तक लोगों को और परेशान कर लो, करवा लो। खासकर उन भ्रष्ट अफसरों की तो बहुत दुर्गति होने वाली है जो आपके नाम के सहारे अत्याचार और अन्याय की हदें पार कर चुके हैं।
लेखक आजाद खालिद दिल्ली-एनसीआर के जर्नलिस्ट हैं. कई चैनलों अखबारों में काम कर चुके हैं. पिछले दिनों आजाद खालिद व उनके परिजनों का उत्पीड़न गाजियाबाद प्रशासन ने किया और अपना सम्मान व हक पाने के लिए आजाद खालिद को लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी.





