"दिल में फफोले पड़ गए सीने की आग से, इस घर को आग को लग गयी घर के चिराग से" उक्त पंक्तियाँ फिलहाल राष्ट्रीय सहारा दैनिक समाचार पत्र को तो चरितार्थ करती ही हैं। बताता चलूँ कि मैं नियमित रूप से लगभग पांच अखबार मंगाता एवं पढ़ता भी हूँ। बाकी बचे अखबारों को इ-पेपर के माध्यम से जरुर पढ़ता हूँ, जिनमे मेरा प्रथम फोकस गोरखपुर संस्करण पर होता है (वहीँ का होने के कारण). पिछले बहुत दिनों से ऐसा देखने को मिल रहा है कि जन समस्याओं एवं जन सरोकार से जुडी तमाम खबरों पर राष्ट्रीय सहारा चुप्पी मार कर बैठ जाता है है।
हाल ही में २४ अप्रैल की एक प्रमुख खबर महाराजगंज फरेंदा की खबर, (संभवत: आनंद नगर बेयोरो) जहां गैस सिलिंडर की किल्लत से जूझ रहे आम आदमी को गैस सिलिंडर के बदले पुलिस की लाठियां खाने को मिली और दर्ज़नों लोग पुलिस की मार से घायल हुए, को दैनिक जागरण, उजाला आदि ने प्रकाशित किया और सहारा ब्यूरो पता नहीं किन मजबूरियों में इस खबर का गला घोंट दिया। इस खबर के नाम पर सहारा में एक शब्द भी नहीं दिखा। ये तो सिर्फ एक उदाहरण था जो हाल ही में घटा है। आये दिन

सिलेण्डर लेने वालों पर पुलिस का लाठीचार्ज
जनसरोकारी पत्रकारिता से जुड़े होने के नाते इस सन्दर्भ में जब मैंने वहां के क्षेत्रीय लोगों से संपर्क किया तो मैं अखबार प्रबंधन नीति को लेकर भौचक्का रह गया। लोगों की माने तो राष्ट्रीय सहारा की प्रबंधन नीति बड़ी ही दयनीय होती जा रही है। अखबार में सम्पादक पद गौण होता जा रहा है। ब्यूरो प्रभारी अखबार पर हावी होते जा रहे हैं और सिर्फ सालाना एक दो विज्ञापन देकर पूरे साल दलाली का मलाईदार माल खा रहे हैं। गोरखपुर में दैनिक जागरण के बाद सबसे पुराने अखबार के तौर पर जाना जाने वाला यह अखबार अब चौथे-पांचवें पायदान पर पहुंच चुका है और मीडिया की सभी नीतियों को ताक पर रख कर इसके कलमकार अपनी जेबें भरने पर आमादा हैं।
इसका एक मात्र कारण है कि पुराने समय से अपना चौपाल जमा कर बैठे इन प्रभारियों का न तो कभी तबादला होता है और ना ही तबादले का दबाव होता है। परिणामत: सभी खुद को इस अखबार का बादशाह समझ बैठे हैं। देवरिया, गोरखपुर, सिद्धार्थगर हर ब्यूरो में ऐसे दलालों की पकड़ मजबूत होती जा रही है। मेरे मत से प्रबंधन द्वारा उक्त ब्यूरो प्रभारी से यह सवाल पूछना चाहिए कि आखिर किन कारणों से यह खबर आप नहीं भेज सके। क्योंकि ब्यूरो प्रभारी का काम खबर भेजना होता है। प्रकाशन एवं अप्रकाशन का अधिकार सम्पादकीय के लोगों का है/होता है। लेकिन जैसा कि पहले भी कहा कि राष्ट्रीय सहारा में सम्पादक की नहीं चलती है। इसका उदाहरण हाल ही में एक संपादक और एक ब्यूरो प्रभारी के बीच की मारपीट की खबर से मिल चुका है। कुछ लोगों का यहाँ तक कहना है कि प्रबंधन के नियंत्रण से बेलगाम होते इन प्रभारियों पर अगर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया तो वह दिन दूर नहीं जब ये लामबंद होकर इस अखबार की अर्थी भी निकलवा देंगे।
खैर, मै इस बावत नोएडा अखबार प्रबंधन से सीधा हस्तक्षेप करने की उम्मीद करता हूँ और ऐसे खबर दबाने वाले पत्रकारों से राष्ट्रीय सहारा को बचने की सलाह देता हूँ। मै उम्मीद करता हूँ कि जो लोग ऐसी खबरों को दबा कर बैठने में महारत हासिल किये हैं, वो पत्रकारिता के मूल्यों को पहचाने और अपने स्तर में सुधार लायें। अंत में एक बार फिर मैं उपेन्द्र राय, स्वतंत्र मिश्र से अपेक्षा करूंगा कि वो गोरखपुर मामले में सीधा हस्तक्षेप कर अखबार को दलाल मीडियाकर्मियों के चंगुल से मुक्त कराएं, नहीं तो बोरिया बिस्तर बांधने की भी तैयारी करते रहें, क्योंकि ऐसा मुश्किल नहीं लगता। अब यही होना है? सहारा ने कैसे लोग भर दिए हैं? ..अख़बार का स्तर लगातार गिरता जा रहा है.. दिल्ली से भारी भरकम अख़बार निकाल के क्या करोगे सुब्रत साहब.. क्रिकेट में पैसा बहाने से भी कुछ नहीं होगा, आपकी लुटिया देगा ये संस्करण… कूड़ा साफ़ करिए।
शिवानन्द द्विवेदी "सहर"





