Om Thanvi : सिद्धार्थ वरदराजन मेरे अजीज मित्र हैं। वे बहुत जिंदादिल हैं: नीचे मूंछों वाली तसवीर देखिए, जो मैंने आठ साल पहले इटली की रमणीक कोमो झील के किनारे बसे बेलाजो कस्बे में खींची थी। वे नितांत पेशेवर भी हैं। बहुत थोड़े पत्रकारों में हैं जो निरंतर पढ़ते हैं; उनके घर में किताबों का जखीरा है। 'द हिंदू' का संपादन परिवार के घेरे से बाहर निकालकर एन. राम ने सिद्धार्थ को सौंपा और एक मिसाल कायम की।
दूसरी मिसाल राम ने 'द हिंदू' में फिर से परिवारवाद की स्थापना के कुचक्र में शरीक होकर कायम की है। उनके घर का अखबार है, घरेलू ढंग से चलाएं चाहे पेशेवर ढंग से, उनकी मरजी है। पर इसके लिए उन्होंने फिर पेशेवरी का छोटे-से वक्फे का नाटक क्यों किया? और अपने ही करीबी पत्रकार का अपमान? खुद 'द हिंदू' प्रतिष्ठान का अध्यक्ष बनने भर के लिए? सच्चाई यह है कि इसके लिए उन्होंने सिद्धार्थ की नहीं, संपादक नाम की निष्पक्ष-निरपेक्ष संस्था की अपने संगठन में बलि चढ़ा दी है।
सुनते हैं, 'द हिंदू' का कुनबा इसलिए सिद्धार्थ से खफा था कि उन्होंने विकीलीक्स की लंबी पोलखोल श्रृंखला छापी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आड़े हाथों लिया, नरेंद्र मोदी की सभाओं में टोपी-बुरके के प्रपंच को पकड़ा और 'द हिंदू' के दरवाजे उत्तर भारत के लेखकों के लिए भी खोल दिए। इससे 'द हिंदू' को वह पेशेवराना प्रतिष्ठा हासिल हुई, जो अखबार पहले इस स्तर पर अजिर्त नहीं कर पाया था।

दुर्भाग्य से देश में ज्यादातर अखबारों के संपादक मालिक ही हैं। 'द हिंदू' ने उससे निकलने की किंचित कोशिश की। लेकिन अब वह वापस अपने खोल में घुस गया है। यह भारतीय पत्रकारिता की विडंबना है। इस घटना से एन. राम का कद छोटा हुआ है। सिद्धार्थ के साथ लंबी दूरी तय करने के बाद अचानक मुड़कर और सामंती परिवारवाद का वरण कर उन्होंने दरअसल अपनी हुज्जत करवाई है। मैं उन्हें प्रतिबद्ध वामपंथी मानता था। कैसे वामपंथी हैं, खुदा जाने!
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Om Thanvi : मेरे मित्र सिद्धार्थ वरदराजन, अपने संपादन के अल्पकाल में जिन्होंने 'द हिंदू' को खांटी दक्षिण भारतीय छवि से सचमुच की राष्ट्रीय छवि अर्जित करवाई। उस 'द हिंदू' का संपादन अब फिर से मालिक लोग ही करेंगे। प्रबंधन के इस अप्रत्याशित फैसले पर सिद्धार्थ ने उन्हें अलविदा कह दिया है। सिद्धार्थ की चिर-परिचित निश्छल हंसी में यह तस्वीर मैंने दिसंबर 2005 में बेलाजो (इटली) में ली थी, जहां हम दोनों पत्रकारिता पर एक संगोष्ठी में शिरकत के लिए गए थे। हमने नेपाल, तुर्की, बेल्जियम आदि देशों में भी एक साथ यात्राएं और गलबतियां कीं। तुर्की (इस्तांबुल) में एन. राम भी हमारे साथ थे। बहरहाल, सिद्धार्थ अब भी दोस्ती निभाते हैं, जिसका मुझे गर्व है। संपादन में उनके बेहतर पड़ाव के लिए आपकी-हमारी शुभाशंसा उनके साथ है।
वरिष्ठ पत्रकार और जनसत्ता अखबार के संपादक ओम थानवी के फेसबुक वॉल से.





