टीवी18 में 300 मीडियाकर्मी इस्तेमाल के बाद ठीक उसी तरह सड़क पर फेंक दिए गए जैसे काम करने के बाद कंडोम (निरोध) फेंक दिया जाता है। चर्चा है कि आजतक में भी 250 लोगों की लिस्ट तैयार की गई है। यानि आज नहीं तो कल वहां भी कत्लेआम मचेगा। दरअसल मीडिया घराने, पॉलटिशियन, पूंजीपती, सरकार आदि पत्रकारों का इस्तेमाल कंडोम की तरह ही कर रहे हैं और हम इस्तेमाल हो रहे हैं। लेकिन जब तक पत्रकार इस्तेमाल होना बंद नहीं होंगे तब तक कुछ नहीं हो सकता। टीवी18 से जिनकी नौकरी गई आज वे बिलबिलाते घूम रहे हैं और बिरादरी के लोगों से अपील कर रहे हैं कि संकट में घड़ी में वे साथ खड़े हों। लेकिन जब अन्य संस्थानों से पत्रकार हटाए गए तब इन्हें बिरादरी का ख्याल नहीं आया था।
हिंदुस्तान टाइम्स ने जब 450 पत्रकारों-गैरपत्रकारों को एक झटके में हटा दिया गया था तो उस समय हर चैनल ने यह खबर दिखाने से यह कहते हुए मना कर दिया था कि यह मीडिया से जुड़ा मामला है, हम नहीं दिखा सकते। लेकिन अब चैनलवालों पर संकट आया है तो इन्हें बिरादरी नजर आ रही है। खैर देर आए दुरूस्त आए। प्रिंट मीडिया ने टीवी 18 में हुई छंटनी की घटना को तबज्जो दी भी है। भगवान करे कि टीवी 18 के कुछ स्टाफ द्वारा मीडियाकर्मियों को इकट्ठा करने का प्रयास सफल हो। लेकिन अनुभव की कसौटी पर यदि देंखे तो माडियावालों को इकट्ठा करना और मेढक को तराजू पर तौलना असंभव है। क्योंकि यदि आप मेढक को तराजू पर तौलने का प्रयास करेंगे तो एक मेढक उछल कर इधर भाग जाएगा तो दूसरा उधर। मीडियावालों के साथ भी ऐसा ही कुछ है। जिनकी नौकरी गई है उनमें से जैसै-जैसे लोगों को नौकरी मिलती जाएगी वैसे-वैसे वे विरोध प्रदर्शन की मुहिम से अलग होते जाएंगे।
मीडियावालों की नौकरी यदि आज जा रही है तो उसकी एक मात्र वजह है पत्रकारों व गैर पत्रकारों में एकता का अभाव। ज्वंलत उदाहरण हैं आशुतोष और राजदीप सरदेशाई सरीखे पत्रकार,जो आज भी चैनल में बैठे हैं। इनकी सलाह से उनके साथ काम करने वाले 300 लोग निकाल दिए गए। ये चुप हैं और चुप ही रहेंगे। क्यों? क्योंकि ये पत्रकार कम सत्ता के गलियारों में दलाली करने वाले दलाल अधिक हैं। यदि आज नीरा राडिया जैसे किसी भी संकट आ जाए तो ये जरूर चैनलों पर चीखे-चिल्लाएंगे। देश के ज्वंलत मुद्दों पर चैनलों पर पंचायत बैठाने वाले ये पत्रकार,पत्रकारों पर आए संकट पर पंचायत बिठाते नहीं मिलेंगे। आपको ये राष्टÑपति भवन के एट-होम में बड़े-बड़े नेताओं के साथ चाय पीते जरूर मिलेंगे,लेकिन अपनी विरादरी पर संकट की घड़ी में ये आपको हरगिज दिखाई नहीं देंगे। दिखाई दें भी क्यों? संकटग्रस्त पत्रकारों का साथ देने से इन्हें क्या मिलेगा? मुकेश अंबानी (टीवी 18 में 58 प्रतिशत शेयर के मालिक) जैसे पूंजीपतियों के साथ रहेंगे तो मलाई खाते रहेंगे। मीडियावालों एक हो.. तभी कुछ मिलेगा।
संदीप ठाकुर
नेशनल ब्यूरो चीफ
हमवतन






