Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

सुख-दुख...

मीडिया की ‘लक्ष्मण रेखा’ से बंध सकती है अदालती फैसलों की रफ़्तार भी

 

देश के सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात से इंकार कर दिया है कि अदालतों की रिपोर्टिंग के लिए कोई खास दिशानिर्देश बनाने की आवश्यकता है। न्यायालय ने कहा है कि अगर किसी को लगता है कि मीडिया में दिखाई जाने वाली खबर से उसके मामले पर कोई असर पड़ सकता है, तो वो अदालत का दरवाजा खटखटा सकता है। हालांकि कुछ कानूनी जानकार सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को मीडिया की आज़ादी का हनन करार दे रहे हैं और इससे पहले से ही धीमी चल रही न्यायिक व्यवस्था की रफ़्तार भी थमने की आशंका है।

यह फैसला मंगलवार को मुख्य न्यायाधीश एसएच कपाड़िया की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय पीठ ने सहारा इंडिया रीयल एस्टेट और प्रतिभूति और एक्सचेंज बोर्ड यानी सेबी की अर्जियों पर सुनवाई करते हुए सुनाया है। दरअसल सहारा और सेबी ने प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की रिपोर्टिंग के बारे में दिशा निर्देश तय करने की मांग की थी। उनका कहना है कि मीडिया अदालती फैसलों से पहले ही किसी भी पार्टी को दोषी या निर्दोष ठहरा देता है जिसका असर न्यायिक व्यवस्था पर पड़ता है।

सुप्रीम कोर्ट ने कोर्ट रिपोर्टिंग पर दिशा-निर्देश बनाने पर सभी पक्षों से राय मांगी थी। पांच जजों की पीठ ने 17 दिनों तक चली सुनवाई के बाद 11 सितंबर को अपना फैसला सुनाया। कोर्ट ने एक मुश्त दिशा निर्देश तय करने से मना करते हुए कहा कि अगर पीड़ित पक्ष या अभियुक्त चाहे तो निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार की दुहाई देकर रिपोर्टिग पर कुछ समय रोक के लिए सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट में याचिका दाखिल कर सकता है। कोर्ट उस याचिका पर सभी पक्षों को सुनकर अगर तर्क संगत पाती है तो कुछ समय के लिए रिपोर्टिंग टालने का आदेश दे सकती है, लेकिन इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक सभी समाचारों के लिए कोई एक गाइडलाइन नहीं बनाई जा सकती। अगर किसी पक्ष को किसी खबर से आपत्ति हो तो वो हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर सकता है। याचिका के आधार पर कोर्ट चाहे तो खबरों को कुछ दिनों तक ना दिखाने का आदेश दे सकता है। लेकिन ये आदेश सिर्फ कुछ दिनों के लिए होगा और खबर में क्या लिखा जाए, इस पर कोर्ट की कोई राय नहीं होगी।
हालांकि कोर्ट ने कहा कि इससे आरोपियों के आधिकार और मीडिया की आजादी को संतुलित किया जा सकेगा। कोर्ट ने हिदायत देते हुए कहा कि पत्रकारों को अपनी 'लक्ष्मण रेखा' समझनी चाहिए। अगर वो इसे पार करेंगे तो इससे कोर्ट की अवमानना हो सकती है। अभिव्यक्ति की आज़ादी, परम आधिकार नहीं है।
उधर पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जेएस वर्मा का मानना है कि इस फैसले से मीडिया को सबक लेने की ज़रुरत है। कुछ कानूनी जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद मीडिया में दिखाई जाने वाली खबरों पर असर पड़ सकता है। अगर किसी आरोपी को लगता है कि मीडिया की वजह से उसके केस पर असर पड़ रहा है तो वो हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करेगा। 
और जब तक हाईकोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट उसकी मीडिया वाली याचिका पर फैसला नहीं करता तब तक निचली अदालत में मुकदमे की कार्यवाही रुक सकती है। इस तरह हर बड़े मामले को लंबा खींचा जा सकता है। कोर्ट किसी भी मामले में मीडिया को आदेश जारी कर सकता है।
 
सुप्रीम कोर्ट के पूरे फैसले को डाउनलोड करने के लिए यहां क्लिक करें- SC on Media Coverage
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...