Connect with us

Hi, what are you looking for?

No. 1 Indian Media News PortalNo. 1 Indian Media News Portal
Local News Community

सुख-दुख...

मीडिया की सामूहिक सदाशयता का गलत आकलन ना करें

: संस्थाएं काम न करतीं तो राजा, सुखराम, कलमाड़ी तिहाड़ में ना होते : 86 वर्ष के भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री सुखराम एक अन्य केंद्रीय मंत्री ए.राजा के साथ तिहाड़ जेल के एक सेल में। क्या इस खबर के बाद भी हमे तंत्र की क्षमता, सदाशयता और सार्थकता पर भरोसा न करने का कोई कारण हो सकता है? एक हज़ार साल के विदेशी शासन ने हमें सोच के स्तर पर निराशावादी बना दिया है। संस्थाओं को तो छोड़िए हमें अपने पर भी विश्वास नहीं होता।

: संस्थाएं काम न करतीं तो राजा, सुखराम, कलमाड़ी तिहाड़ में ना होते : 86 वर्ष के भूतपूर्व केंद्रीय मंत्री सुखराम एक अन्य केंद्रीय मंत्री ए.राजा के साथ तिहाड़ जेल के एक सेल में। क्या इस खबर के बाद भी हमे तंत्र की क्षमता, सदाशयता और सार्थकता पर भरोसा न करने का कोई कारण हो सकता है? एक हज़ार साल के विदेशी शासन ने हमें सोच के स्तर पर निराशावादी बना दिया है। संस्थाओं को तो छोड़िए हमें अपने पर भी विश्वास नहीं होता।

हमें यह नहीं लगता है कि व्यक्ति के अंदर सद्गुण का एक शाश्वत भाव रहता है और तब हमें यह भी विश्वास नहीं होता कि इसी भाव से अभिभूत होकर सामूहिक सदाशयता का भाव पनपता है। जो कभी देश को आज़ाद करा देता है, कभी आपातकाल के खिलाफ खड़े होने के मजबूर करता है और कभी भ्रष्टाचार के समूल नाश के लिए उद्धत हो जाता है।

यह सही है कि इस तरह की सामूहिक सदाशयता 64 साल में दो ही बार देखने को मिली। लेकिन राष्ट्र के जीवन में इसे “…आते-आते बहुत देर कर दी” के भाव में नहीं देखा जाना चाहिए। मुश्किल तब होती है जब इस अंतराल में हमारे विश्वास का पारा बहुत तेजी से चढ़ने-उतरने लगता है और तब हम सामूहिक सदाशयता को ही नहीं बल्कि व्यक्ति के अंदर सद्गुण के स्थायी भाव को भी खारिज कर देते हैं। यह सही है कि शासक वर्ग टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले की अनदेखी कर रहा था। यह भी सही है कि भ्रष्टाचार पर राजनीतिक वर्ग जनचेतना को नहीं उभार पाया लेकिन यह भी उतना ही सही है कि नियंत्रक-महालेखा परीक्षक जैसी संस्था, देश का सर्वोच्च न्यायालय तथा मीडिया ने अपना कर्तव्य बखूबी निभाया और जनचेतना अप्रत्याशित रूप से जगी।

नोबल पुरुस्कार विजेता और अमेरिका के पूर्व उपराष्ट्रपति अल गोर जिन्होंने पर्यावरण संरक्षण के लिए एक आंदोलन छेड़ रखा है, उन्होंने अपनी किताब ‘ए प्लान टू सॉल्व क्लाइमेटिक प्रॉब्लम’(जलवायु संकट समाधान की एक योजना) नामक पुस्तक में लिखा है “ज़्यादा दिन नहीं लगेंगे जब नई पीढ़ी पीछे मुड़कर देखेगी और हमसे दो में से कोई एक सवाल पूछेगी। या तो वह ये पूछेगी कि जब पूरे उत्तरी ध्रुव की बर्फ की सतह तुम्हारे आंखों के सामने पिघल रही थी तब तुम क्यों हाथ पर हाथ धरे बैठे थे? या दूसरा सवाल यह हो सकता है कि आखिर तुम्हारे अंदर इतना नैतिक साहस कैसे आया कि तुमने एक ऐसे संकट का समाधान निकाला जिसके बारे में कहा जाता था कि इसका समाधान असंभव है”?

भारतीय मीडिया खासकर इलेक्ट्रॉनिक न्यूज़ मीडिया के आलोचकों को शायद ज्यादा दिन नहीं रुकना पड़ेगा। आज से दो साल पहले तक मीडिया से तीन सवाल पूछे जाते थे। पहला यह कि जब बाज़ारी ताकतें खबर की मूल अवधारणा को बदल रही थी तब तुम क्या कर रहे थे? क्यों तुम एक मूकदर्शक बने बैठे रहे जब खबरों के सिद्धान्त का चीरहरण होता रहा? और क्या तुम बौद्धिक व नैतिक रूप से इतने कमज़र्फ़ हो गए थे कि समाज को उनकी उपादेयता(न कि अभिरुचि) की खबरें नहीं दे सकते थे? भारतीय इलेक्ट्रॉनिक न्यूज़ चैनलों के संपादकों ने दो साल पहले समाज के इन तीनों प्रश्नों पर गहरा चिंतन किया और आत्मालोचना के बाद ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन नाम की संस्था बनायी, जिसका मूल उद्देश्य था न्यूज़ की विषय-सामग्री को जनोपादेय बनाना, बगैर नैतिक धरातल को छोड़े हुए।

ऐश्वर्या राय बच्चन का प्रसव व बच्चा लड़का होगा या लड़की, किस दिन होगा, कितना प्रतापी होगा, यह मीडिया का भटकाव था। पहले भी ऐसे भटकाव रहे हैं, आगे भी होंगे लेकिन ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन ने अपने इन भटकावों को पहचानना शुरू किया है और मीडिया को पटरी पर लाने के सार्थक प्रयास किए हैं। यह बी.ई.ए का ऐलान था कि ऐश्वर्या की प्रसूति जनसमाचार नहीं है, लिहाज़ा इस खबर को देने में क्या-क्या सतर्कता बरतनी चाहिए इसकी सूचना सभी संपादकों ने अपने फील्ड स्टाफ को दी और सभी ने देखा कि पूरी की पूरी राष्ट्रीय मीडिया इस पर कायम रही। मीडिया के आलोचक इसे आधा खाली गिलास के भाव से देख सकते हैं और कह सकते हैं कि मीडिया के एडीटरों का मानसिक दीवालियापन है कि ऐश्वर्या के प्रसव पर भी एडवाइज़री जारी करनी पड़ती है। सकारात्मक ढंग से आधा भरे गिलास के भाव में सोचेंगे तो पाएंगे कि कोई व्यक्तिगत गुण के शाश्वत भाव से उभरी सामूहिक सदाशयता इतनी प्रखर है कि बाज़ारी प्रतियोगिता को धता बताते हुए एक फैसले पर अमल रहने का एक छोटा लेकिन सार्थक कदम था।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के जो आठ प्रतिबंध संविधान की धारा 19(2) में वर्णित हैं और जिनके लिए दर्जनों कानून हैं, उसके इतर कोई नियमन असंवैधानिक होगा। चैनलों का कंटेंट(विषय-सामग्री) ज्यादा से ज्यादा जनोपयोगी बनाना केवल आत्मनियमन से ही किया जा सकता है डंडा चला कर नहीं। क्योंकि डंडा चलाने की शक्ति जितनी कानून में प्रदत्त है उतनी आज भी है और कोई भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता उससे ऊपर नहीं हो सकती। फिर ऐसे में किसी भी सरकारी तंत्र या सरकार द्वारा परोक्ष रूप से बनाए गए तंत्र से डंडा चलवाना प्रजातंत्र के मूल सिद्धान्तों पर कुठाराघात होगा। 

“आत्मनियमन कोई नियमन नहीं होता” या आत्मनियमन विरोधाभासी है अर्थात इस भाव का पोषक है कि आत्म को बाहर से ही नियमित किया जा सकता है। ऐसा सोचने वाले नितांत निराशावादी हैं और खासकर के ये वह लोग होते हैं जिन्हे सत्ता की सर्वग्राही क्षमता के अलावा कुछ दिखायी नहीं देता या वह लोग होते हैं जो कि सत्ता के गोद में दशकों रहने के बाद सत्ता के बाहर की आत्मजनित सामूहिक सदाशयता पर जानबूझकर अविश्वास पैदा करते हैं। उन्हे न तो गांधी के आजीवन प्रयोग की समझ है और न ही गीता के उस श्लोक की-

उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मनमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन: ।।  [अध्याय-6 (5)]

“आप अपने से ही अपने को ऊपर उठाएं, आप अपने से ही अपने को न गिरने दें। आप ही अपने मित्र हैं और आप ही अपने शत्रु है”।

लेखक एनके सिंह वरिष्‍ठ पत्रकार, ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज चैनल के एडिटर इन चीफ हैं. उनका यह लेख उनके ब्‍लॉग पोस्‍टकार्ड से साभार लेकर प्रकाशित किया जा रहा है.

Pahad Ki Dada: Hill Mail Uttarakhand
CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

… अपनी भड़ास [email protected] पर मेल करें … भड़ास को चंदा देकर इसके संचालन में मदद करने के लिए यहां पढ़ें-  Donate Bhadasमोबाइल पर भड़ासी खबरें पाने के लिए प्ले स्टोर से Telegram एप्प इंस्टाल करने के बाद यहां क्लिक करें : https://t.me/BhadasMedia 

Advertisement

You May Also Like

विविध

Arvind Kumar Singh : सुल्ताना डाकू…बीती सदी के शुरूआती सालों का देश का सबसे खतरनाक डाकू, जिससे अंग्रेजी सरकार हिल गयी थी…

विविध

: काशी की नामचीन डाक्टर की दिल दहला देने वाली शैतानी करतूत : पिछले दिनों 17 जून की शाम टीवी चैनल IBN7 पर सिटिजन...

विविध

पहली बार चुनाव हमने 1967 में देखा था. तेरह साल की उम्र में. और अब पहली बार ऐसा चुनाव देख रहे हैं, जो इससे...

विविध

राजस्थान, कांग्रेस और सेक्स. ये तीन शब्द लगता है आपस में अच्छे से घुल मिल गए हैं. भंवरी कांड में ये तीनों शब्द जुड़े...