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मीडिया जगत की काली सच्‍चाई को उजागर करने का सिला मिला है यशवंत को

यशवंत को पकड़कर पुलिस वालों ने जो काम किया है उसके लिए उन्हें परमवीर चक्र देकर सम्मानित करना चाहिए। आखिर यशवंत सिंह किसी दुर्दांत वांटेड अपराधी या आतंकवादी से कम खतरनाक थोड़े ही हैं। यशवंत सिंह तो एक बहुत ही खतरनाक व्यक्ति है जिनके नाम का खौफ तो तमाम तथाकथित मीडिया हाउसों के मालिकों व मैनेजमेंट में है। और हो भी क्यों न, खुद को कॉरपोरेट कहने वाले इन सफेदपोशों की दुकानों के अंदर की काली सच्चाई को यशवंत दुनिया के सामने जो लाते आये हैं। न रुपयों से इन्हें खरीदा जा सका और न ही धमकियों से डराया जा सका। यशवंत तो बस धुन में प्रबंधन के सताए कमजोर पत्रकारों का एक मजबूत सहारा बनकर हमेशा उनके साथ खड़े रहे और मीडिया जगत की काली सच्चाई को उजागर करने में ही लगे रहे और इसी का सिला आज उन्हें मिला।

यशवंत को पकड़कर पुलिस वालों ने जो काम किया है उसके लिए उन्हें परमवीर चक्र देकर सम्मानित करना चाहिए। आखिर यशवंत सिंह किसी दुर्दांत वांटेड अपराधी या आतंकवादी से कम खतरनाक थोड़े ही हैं। यशवंत सिंह तो एक बहुत ही खतरनाक व्यक्ति है जिनके नाम का खौफ तो तमाम तथाकथित मीडिया हाउसों के मालिकों व मैनेजमेंट में है। और हो भी क्यों न, खुद को कॉरपोरेट कहने वाले इन सफेदपोशों की दुकानों के अंदर की काली सच्चाई को यशवंत दुनिया के सामने जो लाते आये हैं। न रुपयों से इन्हें खरीदा जा सका और न ही धमकियों से डराया जा सका। यशवंत तो बस धुन में प्रबंधन के सताए कमजोर पत्रकारों का एक मजबूत सहारा बनकर हमेशा उनके साथ खड़े रहे और मीडिया जगत की काली सच्चाई को उजागर करने में ही लगे रहे और इसी का सिला आज उन्हें मिला।

मीडिया समूह के मालिकों और उच्च प्रबंधन के दवाब में आकर पुलिस और एस.ओ.जी. द्वारा जिस तरह से यशवंत को गिरफ्तार किया गया उससे तो लगा जैसे पुलिस किसी बहुत बड़े आतंकवादी को पकड़ने के मिशन पर लगी थी, तभी तो एक व्यक्ति को पकड़ने के लिए दो गाडियों में भरकर पुलिस और एस.ओ.जी. के जवान पहुंचे और यशवंत की गाड़ी को घेर लिया गया कि मानो भागने की कोशिश की तो मौके पर ही एनकाउंटर कर दिया जाये। अगर इतनी मेहनत पुलिस विभाग किसी अपराधी को पकड़ने में करे तो शायद प्रदेश का क्राइम रेट थोड़ा कम हो जाये और जनता में भी पुलिस की एक अच्छी छवि स्थापित हो जाये, लेकिन नहीं, हर बार की तरह यहाँ भी इन्होंने अपनी पूंजीपतियों के एजेंट वाली भूमिका को ही बरक़रार रखा। गिरफ्तारी का दिन भी चुना शनिवार का जिससे कि रविवार को यशवंत की जमानत न हो पाए और उन्हें प्रताड़ित किया जा सके।

यशवंत को गिरफ्तार करने के बाद शनिवार रात को न तो उनसे किसी को मिलने दिया गया और न ही कोई फोन करने दिया गया इसका बात का क्या मतलब निकाला जाये? इस मामले में अब चाहिए कि तमाम पत्रकार एकजुट होकर पुलिस के इस घिनौने कृत्य का विरोध करें और न्याय की लड़ाई में यशवंत जी के कंधे से कंधे मिलकर उनका साथ दें। इस मामले की उच्चस्तरीय जांच किसी निष्पक्ष जांच एजेंसी द्वारा कराई जानी चाहिए जिससे कि सच्चाई सामने आ सके।

लेखक शिवम भारद्वाज पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं.


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