इन दिनों देश में चल रहे भ्रष्टाचार के खिलाफ मीडिया बेहद चौकस है। चाहे अन्ना हजारे का भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन हो, अरविंद केजरीवाल की मुहिम हो या फिर बाबा रामदेव की देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराने की अलख। मीडिया में इन सारी बातों का जबरदस्त कवरेज हो रहा है। इन तमाम खबरों और कवरेज के माध्यम से आम दर्शक और पाठक को ये संदेश देने की कोशिश की जा रही है कि इस देश का मीडिया भ्रष्टाचार के पूरी तरह से खिलाफ है पर जानने वाले समझते हैं कि ऐसे आन्दोलनों को कवरेज देना मीडिया की मजबूरी है क्योंकि जिन लोगों के पीछे लाखों लोग बिना किसी स्वार्थ के आ रहे हों, उनसे स्वयंस्फूर्त जुड़ रहे हों, उसकी अनदेखी करना मीडिया के लिये मुश्किल का काम है।
वैसे मीडिया को एक मुद्दा चाहिये होता है जो उन्हें दिन भर का मसाला दे दे. मीडिया जिस तरह से भ्रष्टाचार के खिलाफ खबरें देता है उससे मीडिया के भ्रष्टाचार मुक्त होने की तस्वीर बनती है पर क्या यह सचाई है? यदि मीडिया वाले दिल पर हाथ रखकर सच कहें तो इसका उत्तर न में ही होगा. भ्रष्टाचार क्या सिर्फ किसी से रुपया लेना है? भ्रष्टाचार के तो हजारों रंग हैं। आप पत्रकार हैं और किसी बिना लायसेंस में पकड़े गये व्यक्ति को अपने प्रभाव से यातायात पुलिस की गिरफ्त से छुड़वा देते हैं तो ये भी एक तरह का भ्रष्टाचार ही है। अपने अखबार का भय दिखाकर सरकारों से कौड़ियों के दाम जमीन ले लेना फिर उसका कमर्शियल उपयोग कर उससे करोड़ों रुपये बनाना, ये भी भ्रष्टाचार की श्रेणी में ही आता है। चनुावों के दौरान पैसे लेकर किसी एक पार्टी या प्रत्याशी के पक्ष में खबरें छापना और मतदाताओं को भरमाना भी भ्रष्टाचार है। अखबारों की आड़ में सरकारों को धमकाना और उनसे अपने धंधे के लिये सुविधायें लेना, ये भी तो भ्रष्टाचार ही है। अपने पत्रकारों को बंधुआ मजदूर बनाकर उन्हें कभी भी सेवा से पृथक कर देना, यह भी किसी व्यक्ति के साथ किया गया मानसिक भ्रष्टाचार है। विज्ञापन न देने वाले संस्थानों के खिलाफ समाचारों की सीरीज छापना और सौदा तय होने के बाद उसकी तारीफों के पुल बांधना, ये भी भ्रष्टाचार का एक रूप ही तो है।
मीडिया देश की जनता को एक दिशा देता है। उसका काम ‘‘वॉच डाग’’ का है। वह समाज में फैली बुराईयों असमानताओं को उजागर कर मजलूम और पीड़ित व्यक्ति की आवाज को बुलंद करे। पर कितने चैनल या अखबार है जो अपने इस पत्रकारीय धर्म को निभा रहे हैं। शायद उंगलियों पर इनकी संख्या गिनी जा सकती है। अखबारों की आड़ में दूसरे धंधे चलाना यह तो एक परिपाटी बन चुकी है। अब पत्रकार, पत्रकार नहीं होता वह एक नौकर के रूप में अखबारों में काम करता है क्योंकि उसके हाथ में कलम तो होती है पर उसे लिखना क्या है, यह अखबार का मलिक तय करता है। जो पत्रकार या संपादक मालिकों की इस तानाशाही के खिलाफ आवाज उठाते हैं या अपनी मतभिन्नता प्रकट करते हैं, वे दूसरे ही दिन अखबार या चैनल के दफ्तर के बाहर खड़े नजर आते हैं।
दूसरों के भ्रष्टाचार को बड़े बड़े हरफों में छापने और दिखाने वाले मीडिया को पहले अपने गरेबां में झांकना होगा कि वे भी उसी थैली के चट्टे बट्टे हैं। यदि लोकपाल बिल के घेरे में अधिकारी, नेता, न्यायपालिका, सांसद, मंत्री सब आ रहे हैं तो मीडिया को उससे छूट क्यों? होना तो ये चाहिये कि यदि सरकर लोकपाल बिल को बना देती है या फिर अन्ना हजारे के जनलोकपाल बिल को अस्तित्व में ले आती है तो इसके घेरे में मीडिया भी आये क्योंकि अभी मीडिया की शिकायतों के लिये जो भी मंच बने हैं वे बिना नाखूनों वाले बूढ़े शेर हैं जिसकी चिन्ता कोई मीडिया वाला नहीं करता, चाहे वो प्रेस कौंसिल आफ इंडिया हो या फिर कोई दूसरी संस्था. यदि मीडिया वास्तव में भ्रष्टाचार के खिलाफ है, उसे लगता है कि भ्रष्टाचार देश को खोखला कर रहा है तो उसे सबसे पहले अपने घर में ही झाड़ू लगाने की शुरुआत करना होगी और ये दिखाना होगा कि उसकी कथनी और करनी में कोइ फर्क नहीं है।
लेखक चैतन्य भट्ट वरिष्ठ पत्रकार हैं और कई अखबारों में संपादक रह चुके हैं. इन दिनों वे 'समाचार-विचार डॅाट कॅाम' के संपादक के रूप में सक्रिय हैं. उनसे संपर्क 09424959520 के जरिए किया जा सकता है.






