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मीडिया पर अंकुश लगाने का प्रयास समाज के लिए घातक साबित होगा : एनके सिंह

: आत्मनियमन ही मीडिया को जनोपादेय बना सकता है : अपनी तीन साल पहले लिखी गयी मशहूर पुस्तक 'द आइडिया आफ जस्टिस' में नोबल पुरस्कार विजेता और जानेमाने अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने श्रीकृष्ण के परिणाम निरपेक्ष भाव और अर्जुन के परिणाम सापेक्ष तर्कवाक्यों की तुलना की और कहा कि अर्जुन कतई गलत नहीं थे। उन्होंने आगे कहा कि अर्जुन का तर्क श्रीकृष्ण के तर्क से ज्यादा उचित था, क्योंकि उसमें व्यापक मानव जीवन का दृष्टिकोण था। श्रीकृष्ण जब उसे खारिज नहीं कर पा रहे थे तो उन्होने अपने बौद्धिक तर्कों के साथ ही सुपर नेचुरल शक्ति का प्रदर्शन कर अपने देवत्व को स्थापित किया और तब जाकर अर्जुन को अपनी बात मनवा पाये।

: आत्मनियमन ही मीडिया को जनोपादेय बना सकता है : अपनी तीन साल पहले लिखी गयी मशहूर पुस्तक 'द आइडिया आफ जस्टिस' में नोबल पुरस्कार विजेता और जानेमाने अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने श्रीकृष्ण के परिणाम निरपेक्ष भाव और अर्जुन के परिणाम सापेक्ष तर्कवाक्यों की तुलना की और कहा कि अर्जुन कतई गलत नहीं थे। उन्होंने आगे कहा कि अर्जुन का तर्क श्रीकृष्ण के तर्क से ज्यादा उचित था, क्योंकि उसमें व्यापक मानव जीवन का दृष्टिकोण था। श्रीकृष्ण जब उसे खारिज नहीं कर पा रहे थे तो उन्होने अपने बौद्धिक तर्कों के साथ ही सुपर नेचुरल शक्ति का प्रदर्शन कर अपने देवत्व को स्थापित किया और तब जाकर अर्जुन को अपनी बात मनवा पाये।

आज देश के सर्वोच्च न्यायालय और संसद में इस बात पर चर्चा हो रही है कि मीडिया के तथाकथित निर्बाध प्रभाव को कैसे नियंत्रित किया जाय। मुद्दा यह भी है कि संविधान के अनुच्छेद 21 में वर्णित व्यक्ति के जीवन के अधिकार और इसकी विस्तारित अदालती व्याख्या (गरिमामय जीवन का अधिकार) और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता में बड़ा कौन है?

इस प्रयास में कई बार ऐसे तर्क दिये जा रहे हैं जो परिणाम निरपेक्ष हैं। मीडिया पर किसी भी अंकुश का सीधा मतलब है कि धीरे-धीरे वह अपने को समाज के प्रति उपादेय बनाने से हटकर राखी सावंत के डांस और सलमान-कैटरीना की तरफ उन्मुख हो जाये। कहना न होगा कि यह प्रक्रिया जनता की नजरों में पहले ही मीडिया को गिरा चुकी है। ऐसे समय में जब मीडिया का एक बड़ा वर्ग यह कोशिश कर रहा है कि इसे ज्यादा जनोपादेय बनाया जाये, अंकुश लगाने का प्रयास समाज के लिए घातक साबित हो सकता है। शक्तिसंपन्न संस्थाएं श्रीकृष्ण का 'विराट भाव' दिखा तो सकती है, लेकिन इससे होनेवाले दूरगामी क्षति को शायद ही रोक पाये।

मीडिया आलोचना के दो पहलू हैं- एक कानूनी और दूसरा नैतिक। पूरे विश्व में माना जाता है कि नैतिकता के प्रश्नों को कानून के माध्यम से हल नहीं किया जा सकता। आज कोशिश की जा रही है कि नैतिकता के सवाल को भी कानून के जरिये हल किया जाये। उदाहरण के तौर पर पेड न्यूज एक नैतिक दोष है और दुनिया का कोई भी कानून इसे तबतक नहीं रोक सकता, जबतक कि मीडिया में अपना नैतिक आधार बेहतर न किया जाये। लेकिन, अगर मीडिया किसी एक व्यक्ति के मौलिक अधिकारों का हनन कर रहा है तो वह शुद्ध रूप से कानून का मुद्दा है और इसके लिए वे सारे उपक्रम जायज हैं जो अदालतें, संसद या राज्य विधायिकाएं करना चाहती हैं।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष आज दो मुद्दों पर बहस हो रही है- पहला यह कि  क्या आरोपी के अधिकार, जो कि संविधान के अनुच्छेद 21 में मूल रूप से तो नहीं हैं, लेकिन न्यायिक व्याख्या द्वारा कालांतर में लाये गये हैं, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता से ऊपर हैं? दूसरा मुद्दा यह है कि अदालतों मे विचाराधीन मामलों की रिपोर्टिंग की जानी चाहिए या नहीं? और, अगर की जानी चाहिए तो कैसे? पहले प्रश्न के संदर्भ में ही एक और मुद्दा उठा है, और वह है कि क्या किसी प्रकाशन को इस आधार पर रोका जा सकता है कि वह किसी व्यक्ति के गरिमामय जीवन को बाधित करता है। दरअसल इन दोनों प्रश्नों का पहले से ही संविधान निर्माताओं ने संज्ञान ले रखा है। संविधान के अनुच्छेद 19-2 में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर जो आठ प्रतिबंध लगाये गये हैं उनमें एक अदालत की अवमानना को लेकर है और दूसरा व्यक्ति के निरादर को लेकर है।

आजादी के पिछले चौंसठ सालों में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दर्जनों फैसले किये गये हैं जिनमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जिसमें प्रेस की स्वतंत्रता भी शामिल है, अन्य सभी अधिकारों से ऊपर है। 1962 में शकील बनाम भारत सरकार के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा "संसद ने ऐसा कोई भी कानून पास नहीं किया जिसके तहत मीडिया द्वारा की जानेवाली रिपोर्टिंग को नियंत्रित या नियमित किया जाय। इस अदालत को भी यह अधिकार नहीं है कि रिपोर्टिंग को लेकर कोई दिशा-निर्देश बनाये, व्यक्ति के अधिकार अगर किसी मीडिया रिपोर्ट से प्रभावित होते हैं तो उसके लिए पर्याप्त उपचार की व्यवस्था पहले से ही उपलब्ध हैं।"

न्यूयार्क टाइम्स बनाम अमेरिकी सरकार, जिसे पेंटागन दस्तावेज केस के नाम से जाना जाता है, में अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि प्रकाशन के पहले किसी तरह का प्रतिबंध गलत होगा। आटोशंकर केस में भी सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा- ‘प्रेस की आजादी को संविधान के अनुच्छेद 19-(1) अ के तहत स्वीकार किया गया है और यह आजादी केवल अनुच्छेद-2 में वर्णित कारणों से हो सकती है, अन्य कारणों से नहीं।’

संवैधानिक व्याख्या को अगर छोड़ भी दिया जाये तो प्रकाशन के पहले प्रतिबंध व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है, क्योंकि इसको अमल में लाने के लिए ‘काज आफ एक्शन’ उत्पन्न नहीं होता, जबतक प्रकाशन नहीं हो जाता। आखिर अदालत को या किसी नियामक संस्था को यह कैसे पता चलेगा कि होनेवाला प्रकाशन व्यक्ति की अवमानना कर रहा है। इसके अलावा अगर व्यक्ति के अधिकार की या अदालत की अवमानना हुई है, तो इन दोनों के लिए आइपीसी में अवमानना कानून में पहले से ही सजा के प्रावधान विद्यमान हैं।

जैसे-जैसे समाज प्रजातांत्रिक अनुभव में परिपक्व होता है, वैसे-वैसे संस्थाएं व व्यक्ति आलोचना को लेकर ज्यादा सहिष्णु बनता है और एक औदार्य का भाव ज्यादा प्रबल होने लगता है। आज के दौर में जहां एक ओर विश्व के तमाम देशों में मानहानि को लेकर आपराधिक कानून खत्म किये जा रहे हैं और भारत में भी एक बड़ा वर्ग इस बात की मांग कर रहा है कि धारा 499 आइपीसी से हटाया जाये, वहां पर इस प्रकाशन के पहले खबरों को रोकना प्रजातंत्र के चूलों को हिला देनेवाला साबित हो सकता है।

अदालत के विचाराधीन मामलों के बारे में ऐसी अवधारणा बन रही है कि मीडिया घटना होने के तत्काल बाद से अपना ट्रायल शुरु कर देता है, जिसका नतीजा यह होता है कि केस को सुननेवाले न्यायाधीशों का दिमाग भी इस तरह की रिपोर्टिंग से प्रभावित होने लगता है, जिससे न्याय की प्रक्रिया दूषित हो जाती है। यहां भी वही प्रश्न उठता है कि क्या न्यायाधीशों का मानसिक तंतु, प्रोफेशनल क्षमता व तर्कशक्ति इतनी कमजोर है कि मीडिया की रिपोर्ट इसें प्रभावित कर सकती है। भारतीय न्यायपालिका की योग्यता आज विश्व में कई मामलों में उदाहरण के रूप में उभरी हैं। ऐसे में यह मानना कि न्यायाधीश, जिनकी ट्रेनिंग ही नीर-क्षीर विवेक की होती है, क्या इतनी आसानी से प्रभावित हो सकते हैं?

इस मामले का दूसरा पहलू यह है कि अगर मीडिया तात्कालिक रूप से इंगित आरोपित को लेकर खबर दिखाता है तो उससे सिस्टम पर दबाव पड़ता है। हम जानते हैं कि देश में कानून को अमल में लानेवाली मशीनरी कितनी लचर है और कितनी आसानी से एक संपन्न आरोपी बड़े-से-बड़ा अपराध करके बच निकलता है। 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाला इसका गवाह है। सबकुछ जानते हुए भी मीडिया के हाथ कानून से बंधे हुए थे। 2007 में कुछ गिने-चुने अखबारों ने इस मुद्दे को उठाया तो वह प्रयास नक्कारखाने में तूती साबित हुआ। भला हो फौलादी एनके सिंहतंतुवाले लेखा एवं महापरीक्षक नियंत्रक (सीएजी) के साथ ही एक सजग सर्वोच्च न्यायालय का, जिसकी वजह से इतना बड़ा घोटाला सामने आ पाया।

लेखक एन.के सिंह ब्रॉडकास्ट एडीटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज के प्रधान संपादक हैं. उनसे संपर्क [email protected] के जरिए किया जा सकता है.


इसको भी पढ़ सकते हैं- Time for all institutions to launch self-corrective steps

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