Mayank Saxena : पत्रकारिता के पिछले 8 साल के अनुभव में न जाने कितने लोग मिले जो चिरौरी करते थे कि कहीं से एक फ़र्ज़ी प्रेस कार्ड बनवा दो…कई ऐसे लोग मिले जो चैनल का स्टीकर चाहते थे, गाड़ी पर लगाने के लिए…कई ऐसे लोग मिले, जिन्होंने क्रेडिट कार्ड और इंश्योरेंस बेचते हुए भी गाड़ी पर प्रेस लिखवा रखा था…ऐसे तमाम लोग मिले जो कहते रहे, "यार तुम्हारे साथ के लोगों ने फ्लैट बुक करवा लिया…गाड़ी ले ली…कैसे पत्रकार हो.."
ऐसे लोग भी मिले जो नेताओं से काम करवाने के एवज में मोटी धनराशि का प्रस्ताव देते रहे… मज़े की बात ये है कि आज इनमें से लगभग सभी मिल कर मीडिया को बेईमान कहते हैं…हर बात पर मीडिया के चरित्र की बात करते हैं… जाने दो भाई, कभी लाइन में लग कर रेल का टिकट तो लिया नहीं…मीडिया को सिखाने निकले हो…सबकी असलियत जानते हैं हम!
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Nitin Thakur : कारपोरेट के दबाव में मीडिया कुछ दिखाने और कुछ छिपाने की कोशिश करता ही होगा… मगर इस मुल्क में संत कौन है ये भी बता दीजिए… मीडिया पर दलाल होने का इल्ज़ाम लगाने वाले उन पार्टियों के लोग या समर्थक हैं जो फोर्ड, अड़ानी, अंबानी, 2जी, जीजाजी की फंडिंग पर जीती हैं। ये नेता भी तो देशसेवा के नाम पर मुटिया रहे हैं फिर मीडिया तो विशुद्ध व्यापार है ही और वो भी डंके की चोट पर। जाइए पहले अपने नेताजी को "दलाल" कहिए..उसके बाद कूदफांद मचाइएगा देशभक्तजी!
पत्रकार मयंक सक्सेना और नितिन ठाकुर के फेसबुक वॉल से.






