ऐसा पहली बार नहीं हुआ है, जब मीडिया की भूमिका, सरोकार और प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल उठाए गए हैं। देश के प्रधान न्यायाधीश ने भी इन सवालों पर चिंता व्यक्त की है। पहले भी यह सवाल उठते रहे हैं कि मीडिया किसका है, किसके लिए है, इसके सरोकार और देश के मुद्दे क्या हैं? न्यायमूर्ति अल्तमस कबीर ने कोलकाता हाईकोर्ट के कार्यक्रम में मीडिया की भूमिका पर जो कुछ कहा, वह मीडिया के लिए आत्मचिंतन और आत्ममंथन का विषय होना ही चाहिए।
जस्टिस कबीर का यह कथन तथ्यों पर आधारित है कि 16 दिसंबर की गैंगरेप की घटना कोई अलग मामला नहीं है। यह ऐसे कई मामलों में से एक है। कुछ मायनों में यह प्रकरण असाधारण अवश्य था, किंतु अनूठा नहीं। फिर भी इस घटना ने पूरे देश को हिला दिया, झकझोर दिया। चीफ जस्टिस की यह सामान्य-सी चिंता तब मीडिया के लिए ओर भी गंभीर बनती है और बननी भी चाहिए, जब वह कहते हैं, ‘अगले दिन के अखबारों में यह वारदात पहले पृष्ठ पर थी, लेकिन 10 साल उम्र की दलित लड़की से गैंगरेप और उसे जलाने की घटना अखबारों के भीतरी पृष्ठों पर मात्र पांच-दस लाइनों में सिमट कर रह गई। ‘निर्भया’ के परिवार को सरकार और दूसरों से आर्थिक मदद मिली, लेकिन उस दलित लड़की या उसके परिवार की सुध लेने वाला कोई नहीं।’ प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से मीडिया के लिए उनका यह कथन सामयिक और विचारणीय है कि समाज या मीडिया ‘बड़े लोग’ या ‘आइकॉन’ बनाने का आदी हो चुका है।
‘दामिनी’ या ‘निर्भया’ के गैंगरेप मामले ने समाज में जो हलचल पैदा की, उसके परिणाम सामने आने लगे हैं। जब प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इस दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की सच्चाई बयान करते हैं कि ‘निर्भया’ मामले ने भारत में नया कानून बनाने के लिए हमें तैयार या विवश कर दिया, तब मीडिया के संबंध में चीफ जस्टिस के वक्तव्य की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। उस घटना को किसने मुद्दा बनाया? इस सवाल का सीधा-सा उत्तर है- मीडिया। इस विकासशील देश के जागृत मीडिया की इसमें अहम भूमिका थी। मीडिया के सरोकार क्या हों? इन्हें कौन तय करता है और किसे तय करना चाहिए? राष्ट्र के मुद्दे क्या हों, क्या न हों? इसे मीडिया के ‘विवेक’ पर छोड़ देने के खतरों से सतर्क रहना भी जरूरी है। मीडिया के विवेक के प्रश्न से रूबरू होते ही मीडिया-कर्म से जुड़े उत्तरदायित्व के सवाल कौंधते हैं।
अपने विचारों-वक्तव्यों के लिए चर्चित भारतीय प्रेस परिषद (प्रेस कौंसिल) के चेयरमैन जस्टिस मार्कण्डेय काटजू का हाल का वक्तव्य मीडिया-कर्म के ‘विवेक पक्ष’ के सामने अनेक सवाल खड़े करता है। जस्टिस काटजू मानते हैं कि मीडिया के क्षेत्र में आजकल बहुत से ओछे पत्रकार पहुंच गए हैं और इससे पत्रकारिता का स्तर बहुत गिर गया है। इनका स्तर सुधारना वह जरूरी मानते हैं। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर प्रेस काउंसिल ने अपने वरिष्ठ सदस्य श्रवण कुमार गर्ग की अध्यक्षता में स्वाधीन भारत में पहली बार एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया है, जो पत्रकारों की योग्यताओं-अर्हताओं के संबंध में सुझाव देगी। ताकि आज बदलती परिस्थितियों में पत्रकारिता या मीडिया कर्म में विशेषज्ञता के जो नए-नए विशेषीकृत क्षेत्र हैं, उनके लिए पत्रकारों की न्यूनतम योग्यताओं का आवश्यक रूप से निर्धारण हो सके।
इस समिति के अध्यक्ष और भी आगे की सोच रखते हैं कि यह समिति प्रेस काउंसिल की ओर से इस बात की भी तहकीकात करेगी कि वर्तमान में पत्रकारिता प्रशिक्षण के जो भी संस्थान हैं, उनकी गुणवत्ता की परख हो क्योंकि अब तक उन पर भी कोई प्रभावी नियंत्रण या नियंत्रक निकाय देश में नहीं है। यद्यपि प्रेस काउंसिल के इस कदम पर मीडिया संस्थानों और मीडिया कर्मियों में तीखी प्रतिक्रिया हुई है और यह माना जा रहा है कि यह मीडिया के दमन का एक तरीका है। इसके विपरीत प्रेस परिषद अध्यक्ष जस्टिस काटजू कहते हैं कि यह केवल पत्रकारिता के स्तर में सुधार का एक प्रयास मात्र है। यह कदापि किसी प्रकार का दमनकारी कदम नहीं है। पढ़े-लिखे यानी डिग्री-डिप्लोमाधारी पत्रकारों की तादाद पिछले तीन-चार दशकों में काफी बढ़ी है किंतु पत्रकारिता के क्षेत्र में गुणात्मक सुधार या जिस मीडिया विवेक के प्रश्न उठाए जा रहे हैं, उन पर चिंतन और सार्थक निर्णय की कमी सचमुच चिंतित करती है। सवाल सतही और गैर मुद्दे को मुद्दा बनाने की मीडिया की होड़ का है।
‘जल्दबाजी में लिखे गए साहित्य’ को मीडिया की सामग्री माना जाता रहा है पर यह जल्दबाजी या ‘डेडलाइन की लटकती तलवार’ मीडियाकर्म के लिए हमेशा चुनौती रही है। इस आपाधापी या शीघ्रता में ही संपादकीय विवेक की परख होती रही है और जब बहुतेरे कथित पढ़े-लिखे पत्रकार संपादक नहीं होते थे, तब भी मीडिया ने धर्म और देश-काल, समाज के मार्गदर्शन (एजेंडा सेटिंग) की अपनी भूमिका का सार्थक निर्वाह किया है। कम से कम भारतीय पत्रकारिता में गांधी, पराड़कर से आज की नई पीढ़ी के संपादकों-पत्रकारों में भी ऐसे विवेकशील संपादक तो हैं ही। फिर भी हमें इस चूक के लिए आत्मनिरीक्षण करना ही होगा कि ‘निर्भया’ की तुलना में उस गरीब दलित 10 साल की बच्ची के साथ हुए सेक्स अपराध और उसकी मौत का राष्ट्रीय स्तर पर मुद्दा न बन पाना सिर्फ हमारी यानी मीडिया की भूल थी या और कुछ।
वैसे हमें चीफ जस्टिस अल्मतस कबीर साहब का शुक्रगुजार होना चाहिए कि उन्होंने मीडिया कर्म की इस भयंकर भूल की ओर देश का ध्यान आकृष्ट किया। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर संपादक और संपादकीय विवेक को जिम्मेदार ठहराते हुए गुजराती दैनिक ‘संदेश’ के संपादक की यह अपील खारिज कर भारतीय पत्रकारिता के सामने एक नया यक्ष-प्रश्न खड़ा कर दिया है कि कोई भी संपादक सिर्फ इस आधार पर ‘अदालत की कार्रवाई से नहीं बच सकता कि कोई खबर बगैर उसकी इजाजत के ही प्रकाशित हो गई।’ न्यायमूर्ति सी के प्रसाद और वी जी गौड़ा की पीठ ने कहा कि संपादक ही उस सामग्री को नियंत्रित करता है, जो प्रकाशित होती है।
यह फैसला मीडिया की आत्मशुद्धि के लिए एक दिशानिर्देश जैसा है। ‘निर्भया’ या ‘दामिनी’ जैसी बड़ी समाचार-कथाओं की भीड़ में लीड या बैनर का विवेकपूर्ण चुनाव संपादक पर ही निर्भर है। बड़े-बड़े शीर्षकों के नीचे छपी छोटी या कम महत्वपूर्ण खबरों में भी जान फूंकने का काम यानी उन्हें मुद्दा बनाने का काम जहां संपादक का है, वहीं प्रश्न यह भी है कि असली मुद्दे कहीं गौण न हो जाएं। यह चुनौती आज की पत्रकारिता की असली चुनौती बन गई है।
लेखक राम मोहन पाठक महामना मदन मोहन पत्रकारिता संस्थान, काशी विद्यापीठ के पूर्व निदेशक हैं. उनका यह लेख हिंदुस्तान में प्रकाशित हो चुका है.






