कोई हाशिए की चीज़ किस तरह किसी राष्ट्र की समस्त चिंताओं, समस्याओं को दरकिनार करके और उसके वास्तविक एजेंडे का हरण करके सबसे मह्तवपूर्ण विषय के रूप में जनमानस की चेतना पर काबिज़ हो सकती है, इसका सबसे बढ़िया उदाहरण है आईपीएल। मैच फिक्सिंग के नए रहस्योद्घाटन के बाद से तो पूरा मीडिया इसी विवाद पर केंद्रित हो गया है कि हज़ारों करोड़ों का ये मनोरंजनी कारोबार कितना बड़ा धोखा है और खिलाड़ियों से लेकर अधिकारियों तक इसकी आड़ में क्या-क्या गुल खिला रहे हैं।
मीडिया बता रहा है कि हमाम में लगभग सब नंगे हैं। दिन रात उसका एक ही राग है कि सबको पता है क्या हो रहा है, सब आपराधिक षड़यंत्र में शामिल हैं, मगर सब चुप हैं, क्योंकि करोड़ों लोगों को बेवकूफ़ बनाकर अरबों कमाने का ये सबसे आसान रास्ता कोई क्यों बंद करना चाहेगा। लेकिन आईपीएल के नाम पर चल रही इस धोखाधड़ी की परतें खोलने के नाम पर मीडिया जो कुछ कर रहा है क्या वही पूरा सच है? मैच फिक्सिंग की ख़बर को हफ़्तों तक रबर की तरह खींचने के पीछे क्या उसका अपना एजेंडा नहीं है?
लोकप्रियता की होड़ में फँसे मीडिया को आईपीएल से जमकर खुराक़ मिलती है। अगर टीआरपी के आँकड़े देखे जाएंगे तो न्यूज़ चैनलों पर छाए आईपीएल के जलवा की वजह साफ़ हो जाएगी। ये मीडिया में चलने वाली अपवित्र प्रतिस्पर्धा ही है जो पत्र-पत्रिकाओं और चैनलों को आईपीएल की हर छोटी-बड़ी घटना को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने के लिए प्रेरित करती है। दूसरों से आगे निकलने के लिए वे आईपीएल की घटनाओं को सनसनीखेज़ बनाने लगते हैं, उन्हें उससे अधिक समय देने लगते हैं जितने की वे हक़दार हैं।
मैच फिक्सिंग के अपराधियों को बेहिसाब कवरेज देकर उनका महिमामंडन भी इसी सनसनीकरण का नतीजा है। ये अनायास नहीं है कि श्रीसंत, चंदीला और चव्हाण के चेहरे बार-बार दिखाए जाते हैं और उन्हीं के साथ दिखते हैं आईपीएल की चकाचौंध से भरे दृश्य। एक नो बॉल फेंकने पर तीस-चालीस लाख और खूबसूरत लड़कियाँ मिलने के प्रलोभन भरे जाल में खिलाड़ी ही नहीं फँसते, दर्शक भी उलझ जाते हैं। दिल्ली, मुंबई से लेकर दुबई तक फैले आपराधिक संसार की चर्चाओं में नामी-गिरामी लोग शामिल होते हैं और अपराधियों को अनावश्यक महत्व देकर महिमामंडित करते हैं। बड़े लोग, बड़े अपराध, बड़ी स्पर्धाएं और बड़े पैमाने की विलासी भव्यता सब मिलकर एक ऐसा मायावी संसार रचते हैं कि लगता है यही दुनिया असली है, बाक़ी सब झूठ।
वैसे भी अपराध मीडिया का प्रिय और बिकाऊ विषय रहा है और जब आईपीएल के मनोरंजन में अपराध मिक्स हो जाता है तो उसका आनंद कई गुना बढ़ जाता है। उसे पता है कि दर्शकों के लिए इससे बढ़िया उपभोग की सामग्री दूसरी नहीं हो सकती। वह इसके कवरेज में अपने सारे संसाधन और क्राइम रिपोर्टिंग का सारा अनुभव एवं कौशल झोंक देता है। इसीलिए हफ़्तों स्क्रीन पर वकील, पुलिस वाले और क्रिकेट के खलनायक छाए रहते हैं। बाज़ार संचालित मीडिया के चरित्र की ये एक महत्वपूर्ण प्रवृत्ति है कि पहले नायक बनाओ और फिर उन्हें ध्वस्त करो। मध्यवर्गीय दर्शकों की मानसिकता दोनों ही स्थितियों में आनंदित होती है। हाँ, मीडिया इतनी सावधानी ज़रूर बरतता है कि दर्शकों की उन चीज़ों में आस्था बनी रहे जिनसे बाज़ार की शक्तियों को मज़बूती मिलती है।
रोमांच, सेक्स, अपराध, विलासिता और कारोबार का कॉकटेल आईपीएल लगातार हिट है तो इसीलिए की मीडिया तरह-तरह के कार्यक्रमों के ज़रिए महीनों उसके बारे में उत्सुकता बनाए रखता है। खिलाड़ियों की नीलामी से लेकर टूर्नामेंट ख़त्म होने के बाद तक ये सिलसिला चला रहता है। यही वजह है कि विज्ञापनदाताओं के लिए वह हॉट प्रापर्टी बना हुआ है। ये आईपीएल का कारोबारी जादू है कि मीडिया अपनी बुनियादी भूमिका को भूल जाता है और उसका एकमात्र मक़सद आईपीएल का अधिकाधिक कवरेज सबसे बड़ी प्राथमिकता हो जाती है। राष्ट्रीय महत्व की ख़बरें और मुद्दे हाशिए पर धकेलकर वह इस खेल के महिमागान में जुट जाता है।
आईपीएल में मैच फिक्सिंग के ख़िलाफ़ जिहाद छेड़ने वाले मीडिया की ये चिंता हास्यास्पद है क्योंकि देश की प्राथमिकता सूची में ढेरों ऐसी समस्याएं हैं जिनसे लड़ाई लड़ने की ज़रूरत है मगर वह उनकी कोई बात नहीं करता। उसकी ये चुप्पी बहुत ख़तरनाक़ तो है पर आश्चर्यजनक कतई नहीं। बाज़ार संचालित मीडिया की दिलचस्पी केवल उन्हीं चीज़ों में रहती है जो बाज़ार के लिए फ़ायदेमंद हैं। वह बाज़ार की चिंता से चिंतित होता है और उसी के एजेंडे पर काम करता है। उसका देश की समस्याओं से कोई सरोकार नहीं है। कहा जा सकता है कि एक तरह से इस बाज़ार में मीडिया फिक्स हो चुका है। ये फिक्सिंग बेशक स्पॉट या मैच फिक्सिंग की तरह नहीं है मगर उसका कुछ ख़ास उद्देश्यों के लिए खुद को प्रतिबद्ध कर लेना फिक्स हो जाना नहीं है तो क्या है? मीडिया का निगमीकरण (कार्पोरेटीकरण) मीडिया की मुश्कें कसकर इस प्रक्रिया को और भी पुख़्ता कर रहा है।
दरअसल, आईपीएल को खेल से मनोरंजन का बाप बनाने के खेल में क्रिकेट के प्रबंधकों की जितनी बड़ी भूमिका रही है उससे कम मीडिया की नहीं है। ये ग़लत धारणा है कि ललित मोदी ने आईपीएल का आविष्कार किया। असली आविष्कारक तो बाज़ार है, जिसे अपने विस्तार के लिए इस तरह के मनोरंजन वाली प्रतियोगिताओं की ज़रूरत थी। इसीलिए जब बाज़ार समाचार चैनलों और मीडिया का मनोरंजनीकरण करता है तो बॉलीवुड के बाद क्रिकेट और उसमें भी आईपीएल मनोरंजन की सबसे बड़ी सामग्री का स्रोत बनता है। बाज़ार ने ही क्रिकेट तथा मीडिया को अपने स्वार्थों के लिए औज़ार बनाया। इसमें मीडिया उसका बहुत बड़ा सहयोगी है, बल्कि ये कहा जाना चाहिए कि आईपीएल का कारोबारी ढाँचा मीडिया के बल पर ही खड़ा है। आईपीएल जितनी बड़ी क्रिकेट-घटना है उतनी ही बड़ी मीडिया इवेंट भी, क्योंकि टीवी पर प्रसारण के अधिकार एवं विज्ञापनों की बरसात दोनों की अर्थव्यवस्था के केंद्र में है। यानी दोनों एक दूसरे की ज़रूरत हैं, एक दूसरे पर निर्भर हैं।
माँग उठ रही है कि आईपीएल बंद कर दिया जाना चाहिए। वास्तव में आईपीएल के छह संस्करणों ने भद्रजनों के खेल कहे जाने वाले क्रिकेट के अंधाधुंध व्यावसायीकरण के ज़रिए जो गंद फैलाई है उसके बाद उसे जारी रखने का कोई वाज़िब तर्क नहीं रह जाता। अब इसमें बिल्कुल भी संदेह नहीं रह गया है कि आईपीएल धन एवं अधिकार संपन्न जनों के लिए रंगरेलियाँ मनाने का अड्डा बनकर रह गई है और इसका ज़बर्दस्त तरीके से अपराधीकरण हो चुका है। भारत जैसे भाँति-भाँति की विपन्नताओं वाले देश में तो ये विलासिता का अश्लील प्रदर्शन है ही, साथ ही एक तरह का नशा और उन्माद पैदा करने का ज़रिया भी। आईपीएल के बंद होने से देश और क्रिकेट दोनों का फायदा होगा। मगर शायद मीडिया इसके लिए कोई जिहाद नहीं छेड़ेगा, क्योंकि यह बाज़ार के खिलाफ़ भी होगा और उसके अपने स्वार्थों के भी। दोनों का पक्का गँठजोड़ है और इससे फ़ायदा उठाने वाले तमाम लोग इसके हिस्से हैं। वह सुधार और सफाई की बात करेगा, जो कि संभव नहीं है। ये कथा बार-बार दोहराई गई है और इस बार भी दोहराई जाएगी। इसलिए बदलाव के बजाय प्रतीक्षा कीजिए आईपीएल के अंदर किसी नए घोटाले के भंडाफोड़ की।
वरिष्ठ पत्रकार मुकेश कुमार के एफबी वॉल से साभार.






