पटना के स्काडा सेंटर में सोमवार 8 जुलाई को मीडिया प्रतिनिधियों को लेकर कार्यशाला का आयोजन किया गया। इसे आप सेमिनार भी कह सकते हैं। विषय परंपरा से हटकर था। विषय था: बिहार में टिकाऊ खेती और मीडिया का नजरिया। इसका आयोजक ग्रीनपीस था। ग्रीनपीस जैव विविधता और पर्यावरण से जुड़े खतरों को लेकर जन जागरूकता की दिशा में काम कर रहा है।
वह जैविक खेती को बढ़ावा भी दे रहा है और इससे जुड़ी संभावना और खतरों को लेकर भी सचेत कर रहा है। कार्यशाला उसी की एक कड़ी थी। ग्रीनपीस इंडिया के सस्टेनेबुल एग्रीकल्चर कैम्पेनर इश्तियाक अहमद और मीडिया समन्वयक निवेदिता ने दावा किया है कि राज्य सरकार मानती है कि बिहार के विकास में खेती की महत्वपूर्ण भूमिका है। कृषि रोडमैप उसी भूमिका का विस्तार है।
करीब चार घंटे चले इस कार्यशाला में सभी वक्ताओं ने कृषि के विकास में मीडिया की भूमिका को महत्वपूर्ण माना। लेकिन सबने इस बात को भी स्वीकार किया कि खेती-किसानी को मीडिया में जगह नहीं मिल पा रही है। किसानों की समस्याएं बाजार पैदा नहीं करती हैं। उनकी समस्याएं ग्राहक पैदा नहीं करती है तो फिर उन पर जगह क्यों बर्बाद किया जाए। इस परिचर्चा में प्रभात खबर के स्थानीय संपादक प्रमोद मुकेश ने स्वीकार किया कि किसानों की समस्याएं हमारे लिए गौण हो गई हैं। उनको हम जगह नहीं दे पाते हैं।
अमरनाथ तिवारी ने कहा कि किसानों की समस्या की जगह ‘किसानी का पाखंड’ ज्यादा जगह पा रही हैं। श्रीकांत ने कहा कि भूमि सुधार के बिना टिकाऊ खेती संभव नहीं है। हिंदुस्तान के कमलेश ने भी किसानों की समस्याओं की अनदेखी पर चिंता जतायी। इस मौके पर रजनी शंकर, विकास कुमार झा, एसए शाद, गोपी कृष्ण, मणिकांत ठाकुर, माधुरी कुमार, निराला, दीपक मिश्रा, पुष्पराज, रंजनी शंकर आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किए।
करीब चार घंटे तक चले वैचारिक विमर्श ने कई सवाल खडे किए। सबसे बड़ा सवाल यह है कि अपने को संपादक, मुख्य उपसंपादक, विशेष संवाददाता आदि कहने वाले व्यक्तियों को अपनी कार्य प्रक्रिया में इतनी छूट है कि किसानों के सवालों को मुख्यधारा में शामिल कर लें? दूसरा बड़ा सवाल यह है कि संपादकीय मीटिंग में किसानों की समस्याओं पर चर्चा कितने अखबारों में होती है। सवाल बहुत सारे हो सकते हैं। हम बस मीडिया विमर्श से शामिल लोगों से इतना ही जानना चाहते हैं कि क्या प्रबंधन किसानों की समस्याओं को अखबारों में जगह देने का अधिकार देगा या प्रबंधन से यह अधिकार हासिल करने की कूबत संपादकीय टीम को है?
खेती को लेकर ग्रीनपीस का आयोजन एक सार्थक प्रयास था, विमर्श था और साथ में एक मीडिया प्रलाप भी। हर वीआईपी आयोजन की तरह- भाषण, भोजन और भूल जाओ। संभव है कि इस आयोजन को अखबारों में बेहतर जगह मिल जाए। मिलना भी चाहिए, क्योंकि आयोजक ने वक्ताओं का चयन ही इस आधार पर किया था कि खबरों के छपने में कोई परेशानी नहीं हो। आखिर आयोजक को भी तो अपना प्रोफाइल मोटा करना है।
आयोजन से हटकर हम इस बात की ओर ध्यान आकृष्ट करना चाहते हैं कि राज्य सरकार ने बैल को राज्य पशु घोषित किया है। यह घोषणा वैसे में वक्त में की गई है जब बैल कृषि कार्यों से बिल्कुल अलग हो गए हैं। बैलों के कार्य मशीनों से होने लगे है। गांवों में भांथी, हाल, फार, मेंह, दवाहीं, रेहट जैसे शब्द विलोपित होने लगे हैं। वैसे में ऐसे कार्यशाला, सेमिनार, परिचर्चा की उपयोगिता भी बढ़ जाती है। देखना है कि इस आयोजन के बाद कितने पत्रकार किसान और उनकी जरूरतों को मुख्यधारा से जोड़ पाते हैं।
लेखक वीरेन्द्र यादव पटना में पदस्थ वरिष्ठ पत्रकार हैं .






